Saturday, October 19, 2019
बचपन को बचाइए सेक्सुअल हैरेसमेंट का पाश उन्हें ताउम्र जकड़ा रहता है..

बचपन को बचाइए सेक्सुअल हैरेसमेंट का पाश उन्हें ताउम्र जकड़ा रहता है..

मीडियावाला.इन | केके बिड़ला फौन्डेशन से बिहारी पुरस्कार प्राप्त उपन्यास स्वप्नपाश  पर चर्चा 

"कुछ किताबों में जिंदगी खुद शब्द का रूप लेकर मुखर होती है...हंसती-मुस्कुराती ही नहीं डराती है...सहमाती है...फिर धीरे से चाबी दे जाती है, उस बंद ताले की जो बहकती हुई जिंदगी को चहका सकता है, स्वप्नपाश मनीषा कुलश्रेष्ठ दी का ऐसा ही उपन्यास है। जिसे बिरला फाउंडेशन के बिहारी पुरस्कार से नवाजा गया है। "

वो पिछले भगौरिया के दिन थे...टेसू की दहक के बीच मनीषा दी और मैं किस्सागोई में मशगूल थे...तरह-तरह के किस्से हवाओं में तैर रहे थे...मनीषा दी ने इस सरस मुलाकात में मुझे अपनी दो किताबें भेंट दी थी " किरदार और स्वप्नपाष " शिगाफ में पहले पढ़ चुकी थी। किस्सों के बीच किसी एक किस्से में मैंने दी से कहाः- "पता नहीं लोग कैसे अपने दिमाग पर कंट्रोल खो देते हैं, अवसाद में घिर जाते हैं। मुझे तो भीषण दुख और तकलीफ के समय भी काम आ जाए तो दुख को पोस्टपोन करते आता है। पापाजी के निधन के समय भी यही किया था...ना जाने कैसे और क्यों लोग दिमाग पर अपना कंट्रोल खो देते हैं। मुझे तो बचपन से यही सिखाया गया है, दिमाग शरीर का सबसे अहम हिस्सा है। मानसिक विकलांग लोग झेले ही नहीं जाते...."मैं अपनी रो में बक-बक किए जा रही थी वहां दी कुछ सोच रही थीं...फिर एकदम से बोल उठी...यदि यह तुम्हारी सोच है, तो क्या तुम्हें मेरी स्वप्नपाश पंसद आएगी? वो तो ऐसी ही एक लड़की के बारे में हैं जो 
सिक्जोफ्रेनिया से पीढ़ित है...जिसकी अपनी दुनिया ही उसे डराती औऱ हंसाती है...

हम भगोरिया से लौटे ...दी ग्वालियर वापस चली गईं..मनीषा दी की कहानियों के संग्रह 'किरदार' के अलग-अलग किरदारों में उतरने में मुझे महज दो दिन लगे...लेकिन स्वप्नपाश...उसका कवर ही मुझे दो दिन तक बांधे रखा...मैं उसे उठाती कवर को देखती...देखती रहती औऱ लाइब्रेरी में वापस रख देती। शायद कंट्रोल फ्रीक श्रुति इस उपन्यास की गहराई में उतरने से डरी हुई थी...दो दिन के बाद हिम्मत करके मैंने किताब को पढ़ना और उसकी किरादार गुलनाज फरीबा से रूबरू होना शुरू किया। यह उपन्यास नहीं जिंदगी का कड़वा पाठ है...शुरुआत की बानगी देखिए...

" मुझे उससे मिले एक साल हो बीत चुका था। उसके साथ या यूं कहें उसे जानते हुए मेरे तीन साल ऐसे बीते थे जैसे कि 'रोलर कोस्टर राइड।' फिर भी मैं यह नहीं कहूंगा कि वह बुरा दिन था जब मैं इससे मिला था। हाँलाकि वह दिन जरूर मनहूस था जब आखरी बार मैं उससे मिला था। मैं स्वीकार करता हूँ, मैंने खुद उससे निजात चाही थी।

उसकी आत्मघाती हरकतों से मुझे थकान होने लगी थी तब तक। फिर उस दिन तेज चाकू से कलाई काट ली थी। क्या मैं हार रहा था? मैं सामान्य जीवन की तरफ लौटकर, चैन माँगने लगा था जीवन से? जबकि मैंने इन बैचेनियों का उत्सव साथ मनाने का वादा किया था उससे।"

एक मनोचिकित्सक का अपनी मरीज के लिए यह सोचना आपको उपन्यास के अंदर के किरदारों को देखने-समझने के लिए विवश करता है...इस हिस्से के बाद यह उपन्यास मैंने उसी रात पढ़कर खत्म किया और अगले कई हफ्तों तक अपने आस-पास फैली बैचेनियों का उत्सव मनाती रही। इस उपन्यास में मनीषा दी ने अपने डॉक्टर से मेरा पसंदीदा वाक्य भी कहलवा दिया 'भाड़ में जाओ....' लेकिन उस डॉक्टर की ही तरह हम इन किरदारों को भाड़ में कहां जाने दे सकते हैं? मनीषा दी, गुलनाज के किरदार में किसी मनोचिकित्सक की ही तरह रची-बसी हैं। ऐसा लगता ही नहीं किसी लेखिका का उपन्यास है...किसी डॉक्टर ने अपनी मरीज का जिंदगीनामा उकेरा है ऐसा लगता है। जब गुलनाज कहती हैः-

डॉक्टर मेरे साथ अनयूजुअल हो रहा है। आवाजें ...मेरा लोगों को मार डालने का मन करता है। मेरा दिमाग शोर करता है...मार डाल, मार डाल...डॉक्टर विल यू हेल्प मी? विल यू अंडरसेंड मी? फिर डॉक्टर उसके बचपन को कुरेदता है और धीरे-धीरे बाहर आती हैं वे सारी बातें...जिनकी कोख से जन्म हुआ था ' सिक्जोफ्रेनिया से पीढ़ित गुलनाज फरीबा का'।

उपन्यास का ही एक हिस्सा है जिसमें फरीबा के साथ किए माँ-पिता-आस-पास की दुनिया का फरेब सामने आता है...

" वो पैंतालीस साल का अधेड़ रहा होगा तब और मैं दस....उसने एक रोज धोती खोलकर एक नजारा दिखाया, जिससे मुझे रात भर उल्टियां होती रहीं। अगले दिन वह फिर हाजिर था और इस बार केवल नजारा नहीं....छुलवाया...फ्राक उठाकर मेरी जांघ से। तीसरी बार उसने मेरे उभरते हुए टीसते छोटे ब्रेस्ट दबोच दिए...मैं उस दिन तो गुस्से में आ गई और गुरु जी के लंबे बाल नोच लिए, मुझे घेरने वाली बांह में दांत गड़ा दिए। गुरु जी ने मेरे गाल पर जोर का थप्पड़ दिया। मैं तबले पर जा गिरी और बेहोश। शाम को हंगामा हुआ...मम्मी को बरगला दिया गया कि गुल को डांस सीखने में जरा दिलचस्पी नहीं बहन जी! देखिए, कितना हमें काटा और बाल खींचे हैं। उस घटना को कई-कई वर्ष बीत गए। वह नाटकीय सा सेल्फ पिटी से भरा अपराधबोध भी कब का मेरे मन से जा चुका है। यहां तक कि वह कमीना कितनी बार मम्मी के डांस कार्यक्रमों में मिला और मुझे उस पल कुछ-कुछ याद तक नहीं आया।

मैंने कमरे के अधखुले ब्लाइंड्स डोर खींचकर बंद कर दिए । कमरे में अब बस आवाजें थीं। निजता का डर नहीं था, गुलनाज अँधेरे से बतियाने लगी।"

अपने आस-पास आँख खोलकर देखेंगे तो ऐसे कई गुलनाज ही नहीं गुल भी मिलेंगे...जिनके बचपन के स्याह अंधेरों ने उन्हें किशोरवय में भी घेरे रखा और जवानी से लेकर बुढ़ापे तक इस घिनौने पाश से मुक्त नहीं किया....तभी तो गुलनाज कहती है...मेरे बचपन में कमरे की दीवारें बहुत गुलाबी थीं, जिन्हें मैंने गंदे चेहरों वाली डूडलिंग से भर रखा था। जबकि उसका डॉक्टर भी मानता था, जब वह हंसती तो उसकी आँखें भी हँसती थी...यही तो गुल का वास्तविक किरदार होना था... लेकिन उपन्यास के अगले कुछ हिस्से गुल की माँ के किस्से बयां करते हैं...

स्मोकर मदर, जन्म के समय सफोकेशन। प्रेगनेंसी के वक्त डिस्ट्रेस, ड्रग्स ....यह जन्मजात पैरानॉइक सिक्जोफेनिया का केस है...मिडिल क्लास औरतों की घुटन, हिस्टीरिया। हताश लड़कियों के भीतर दबे बलात्कार., मॉलस्टेशन, इनसेस्ट। इस सबसे तो हम रोज जूझते हैं....ये उपन्यास में दो मनोचिकित्सक के संवाद हैं लेकिन क्या ये सिर्फ संवाद हैं। यह घट रहा है रोज हमारे आस-पास ...गुल अपने प्रिय मनोचिकित्सक को एक बार बताती है...पापा मुझे अपने चमकते हुए तरतीब से जमे बेडरूम में ले गए। मुझे याद है माँ की मेज महोगनी थी...मम्मी भी अपना मेकअप उतारकर मुलायम कपड़ों में मेरे पास आ बैठीं। मैं उन दोनों के बीच उस रोज खूब गहरी नींद सोई।. यह चमकता संसार था, सुरक्षित। जबकि मैं अनकिए अपराध की फैंस में बिंधी फंसी हुई थी....

तो सच पढ़िए इस उपन्यास को समझिए गुलनाज फरीबा को...उसके साथ ताउम्र जिंदगी ने फरेब किए लेकिन सबसे बड़ा फरेब अपनी दुनिया में खोए माँ-बाप ने किया। यह सच है हम सभी की अपनी लाइफ है लेकिन अपने सपनों को जीने के लिए एक मासूम लाइफ को स्वप्नपाश में मत बांधिए। मनीषा दी, यह उपन्यास दूसरी दुनिया के दरवाजे खोलता है। मनीषा दी उस दिन मैंने कहा था ना आपसे मैं "वान गॉग की कभी नहीं पढ़ पाई। लोलिता भी अधपढ़ी रह गई...आत्महत्या के कारण गुरुदत्त की फिल्में भी ना देख पाई...लेकिन स्वप्नपाश को कई बार पढ़ा क्योंकि जीवन में कई ऐसी लड़कियां-महिलाएं-पुरुष मिले हैं जो बचपन में हुए सेक्सुअल हैरेसमेंट के काले सायो से ताउम्र बाहर नहीं निकल पाए।

उपन्यास में गुल का डॉक्टर उसे बार-बार समझाते रहता है..."माइ डियर कंपोज योर सेल्फ....मैं पैरेंट्स से कहती हूं कंपोज योर सेल्फ फर्स्ट तभी दूसरी लाइफ को इस जीवन में लाइए...मुस्कुराने और गुनगुनाने के लिए। "

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श्रुति अग्रवाल

कई बार जीवन में ऐसे पल आते हैं जो सदियों तक किस्से के रूप में याद रहते हैं... उन्हीं किस्सों की किस्सागोई में गुम श्रुति अग्रवाल पत्रकारिता का चिरपरिचित चेहरा है। वे लम्बे समय तक राजस्थान पत्रिका और सहारा समय में पत्रकार रही है।

ट्वेल्व पाइंट ब्लॉग संचालित करते हुए श्रुति ने कई अनछुए पहलुओं पर कलम चलायी है।