Monday, October 14, 2019
मस्जिद में नमाज का मामला संविधान पीठ को भेजने से सुप्रीम कोर्ट का इनकार

मस्जिद में नमाज का मामला संविधान पीठ को भेजने से सुप्रीम कोर्ट का इनकार

मीडियावाला.इन। नई दिल्ली। नमाज के लिए मस्जिद इस्लाम का अभिन्न अंग है या नहीं इस पर सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। मुस्लिम समूह द्वारा 1994 में इस्माइल फारुकी मामले में सुनाए गए फैसले के अंश के पुनर्विचार के लिए लगाई गई याचिका पर फैसला सुनाते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने मामले को ऊंची पीठ को भेजने से इनकार कर दिया है।

मुस्लिम समूह ने 1994 में इस्माइल फारुकी मामले में सुनाए गए फैसले के अंश को पुनर्विचार के लिए बड़ी पीठ को सौंपने की मांग की थी।

मामले में फैसले से पहले 1994 के फैसले का जिक्र करते हुए जस्टिस अशोक भूषण ने अपनी और चीफ जस्टिस की तरफ से फैसला पड़ते हुए कहा कि हर फैसला अलग हालात में लिया जाता है। पिछले फैसले का संदर्भ समझना होगा। उसमें कहा गया था कि मस्जिद में नमाज पड़ना जरूरी नहीं।

जस्टिस भूषण ने यह भी साफ किया कि जस्टिस फारुकी के फैसले का अयोध्या से जुड़े मुख्य केस पर नहीं होगा। उन्होंने यह भी कहा कि सभी धर्मों और धार्मिक स्थल समान हैं।

बता दें कि इसके बाद अब कोर्ट 29 अक्टूबर से अयोध्या मामले की सुनवाई आगे बढ़ाएगा।

बता दें कि मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा, जस्टिस अशोक भूषण और जस्टिस एस. अब्दुल नजीर की पीठ ने 20 जुलाई को अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था।

सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने 1994 में अयोध्या में भूमि अधिग्रहण को चुनौती देने वाली इस्माइल फारुकी की याचिका पर फैसला दिया था। उस फैसले में एक जगह कोर्ट ने कहा है कि नमाज पढ़ने के लिए मस्जिद इस्लाम का अभिन्न हिस्सा नहीं है।

वैसे तो वह फैसला बहुत पुराना है, लेकिन अयोध्या में राम जन्मभूमि पर मालिकाना हक से जुड़ी अपीलों पर सुनवाई के दौरान मुस्लिम पक्ष ने फारुकी के फैसले में दी गई व्यवस्था को मुख्य मामले पर असर डालने वाला बताते हुए फैसले के उस अंश को पुनर्विचार के लिए पांच न्यायाधीशों की पीठ के पास भेजने की मांग की थी। याचियों ने यह भी कहा था कि इस फैसले से बाबरी मस्जिद-राम मंदिर भूमि विवाद मामले पर असर पड़ सकता है।

इस्माइल फारुकी का निधन हो चुका है और उनकी ओर से उनके कानूनी उत्तराधिकारी कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं। फारुकी के कानूनी उत्तराधिकारी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव धवन ने कहा था कि जिस पहलू पर बहस ही नहीं सुनी गई, कोर्ट ने उस पर अपना नजरिया प्रकट कर दिया है। धर्म के अभिन्न हिस्से के मुद्दे पर साक्ष्यों को देखे और सुने बगैर कोर्ट यह नहीं कह सकता कि मस्जिद इस्लाम का अभिन्न हिस्सा नहीं है।

हिंदू पक्ष ने बड़ी पीठ को मामला सौंपे जाने की मांग का विरोध किया था और कहा था कि फैसले के इतने वर्षों बाद इस पर पुनर्विचार की मांग कर मुस्लिम पक्ष अयोध्या विवाद के मुख्य मामले की सुनवाई में देरी करना चाहता है। उत्तर प्रदेश सरकार ने भी मांग का विरोध करते हुए इसे देर करने की रणनीति कहा था।

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