Monday, October 22, 2018
भारत के ईर्दगिर्द चीन की “मोतियों की लड़ी”

भारत के ईर्दगिर्द चीन की “मोतियों की लड़ी”

चीन एशिया का एक बडा देश है. क्षेत्रफल में यह भारत से तीन गुना बडा है और उसकी अर्थव्यवस्था हम से ढाई गुना बडी है. भारत की सैन्य शक्ति (संख्याबल) चीन से कम है (सैन्य शक्ति कम होना और सैन्य कमजोर होना अलग अलग बाते है, संख्याबल का सेनाओं की गुणवत्ता से सीधा संबध नही है). चीन की जमीनी सीमा भारत की सभी पड़ौसियों के साथ की सीमा से डेढ गुना और समुद्री सीमा दो गुना ज्यादा है. कुल मिला कर चीन कम से कम आंकड़ों के आधार पर ज्यादा बड़ा और शक्तिशाली है.

फिर चीन भारत के इर्द गिर्द के देशों से विशेष दोस्ती तथा उन देशो में अपने कब्जे और अधिकार के बंदरगाह क्यों बना रहा है? क्या चीन भारत को सामरिक रूप से घेरने के लिए” यह सब कर रहा है? चीन की इस कोशिश को पहिली बार अमरिकी रक्षा विभाग ने अपनी 2005 की “एशिया में उर्जा का भविष्य” नामक रिपोर्ट में “स्ट्रिंग आफ पर्लस्” याने की “मोतियों की लड़ी" कहा था तभी से यह विचार प्रचलन में है. चीन ने हिंद महासागर क्षेत्र में बनाए विभिन्न बंदरगाहों आदि के नक्शे को देखने पर ऐसा महसूस भी होता है.

 

 

आज से कुछ सदियों पूर्व के ऐतिहासिक परिपेक्ष को यदि हम देखें तो चीनी साम्राज्य और भारतीय भूभाग के बीच कोई सीधा और सरल भौगोलिक संबंध नही था क्योंकि इनके बीच दो भौगोलिक बाधाएं थी. ये बाधाएं स्वतंत्र तिब्बत और विशाल हिमालय थी. चीन और भारत अपने अपने क्षेत्र में बने रहे और इतिहास में इनके बीच किसी संघर्ष का कोई प्रमाण नही मिलता.

परंतु अब स्थिती बदली हुई है. भारत को 1947 में आजादी मिली और चीन में कम्युनिस्ट शासन 1949 से आया. नेहेरूजी विश्व ऱाजनीति में अपना और भारत का स्थान बनाने के लिए प्रयत्नशील थे और चीन का कम्युनिस्ट शासन अपनी सैन्य शक्ति बढाने के काम में लगा था. एशिया की मुख्य भूमी पर यही दो बड़े देश हैं क्योंकि रशिया, जिसका 75 % भूभाग एशिया में है, अपने आप को युरोपियन शक्ति मानता है. किसी भी भूभाग में हमेशा बड़े और शक्तिशाली देशों में प्रतिस्पर्धा हमेशा होती रही है और यही चीन और भारत के बीच विगत कुछ दशकों से होता रहा है.

चीन और भारत के बीच 1962 में युध्द हुवा था जिसमें भारत की हार हुई थी. उस हार से उबरने में भारत को  करीब तीन दशक लगे. अब भारत आर्थिक रूप से सशक्त है और भारतीय सेनाएं भी सशक्त और सक्षम हैं. इससे चीन को एशिया में सर्वोच्च शक्ति बनने के सपने में बाधा पडती दिख रही है क्योंकि चीन 2025 में क्षेत्रीय शक्ति और 2050 तक विश्व शक्ति बनने का लक्ष लिए चल रहा है. इसके अलावा सार्क देशों में भारत सर्वोपरी है और वह चीन को रास नहीं आता क्योंकि क्षेत्रीय शक्ति बनने की चाह में चीन मानता है कि सार्क देशों पर भी उसका प्रभाव भारत से अधिक हो.

भारत और चीन की सैन्य तथा स्ट्रेटेजिक प्रतीस्पर्धा जारी है और रहेगी पर चीन यह कहता है की बंदरगाहों और अन्य ठिकानों को बनाना भारत से संम्बधित नही है. इन्हे बनाने के लिए उसके पास पर्याप्त आर्थिक एवं अन्य कारण हैं. चीन के इन कारणों पर नजर डालना जरूरी है.

चीन और भारत औद्योगिक रूप से उन्नत देश हैं. दोनों देशों कों अपने उद्योगों के लिए कच्चे माल और उर्जा (तेल और कोयला) की जरूरत है. दोनो देश अपना आयात समुद्र के रास्ते करते हैं. फर्क यह है की इनका आयात करना भारत के लिए सहज और सुरक्षित है क्योंकि हिंद महासागर में भारतीय नौसेना शक्तिशाली है और राह मे कहीं भी चोक पाइंट नही हैं और चीन को हिंद महासागर से होते हुवे अपने दक्षिण चीनी सागर के बंदरगाहों तक जाना होता है.

चीन का हर आयात हिंद महासागर से गुजरता है और चीन को शक्तिशाली भारतीय नौसेना से डर है की वह जब चाहे तब चीनी आयात को अस्तव्यस्त कर सकती है. यह काम बहुत कठिन नही है. अरब सागर में पर्शियन गल्फ और रेड सी में तथा बंगाल की खाडी में अंदमान और निकोबार व्दीपसमूह में चोक पाइंट हैं जहां चीनी समुद्री व्यापार काफी संकरे इलाके से जाता है जिसे भारतीय नौसेना कभी भी बंद कर सकती है. चोक पाइंट नीचे दिये नक्शे मे देख सकते हैं.

इस (सिर्फ युद्धकाल में ही हो सकने वाले) खतरे से अपना व्य़ापार बचाने के अलावा इन सुविधाओं के निर्माण का कमर्शियल कारण भी है. ग्वादर (पाकिस्तान) और क्याउकापू (म्यानमार मे, जहां चीन बंदरगाह सुविधा के लिए प्रयत्नशील है) में पेट्रोलियम उतार कर पाईपलाईन के जरिये चीन भेजना तथा आयातित सामान को सड़क मार्ग से चीन भेजना लंम्बे समुद्री मार्ग से भेजने से ज्यादा आसान और किफायती भी है.

दोनो जगहों पर पाईपलाईन अभी बनना शुरू भी नही हुवा है पर प्रोजेक्ट चल रहे है. ग्वादर से चीन जाने वाला “सी पी ई सी” भी अभी प्रोजेक्ट स्टेज में है. पुराने कारकोरम हायवे से पाकिस्तान और चीन के बीच यातायात जारी है पर ये मार्ग दुर्गम और कठिन है और इसी लिए “सी पी ई सी” बनाया जा रहा है.

इस परिस्थिति के चलते चीन यह दलील देता है की ये बंदरगाह और अन्य ठिकानें अपने  आयात को सस्ता बनाए रखने और हर हाल में (याने की भारत से युदध होने की स्थिति में) सुचारू बनाए रखने के लिए जरूरी हैं. वैसे यह बात सरसरी तौर पर ठीक भी लगती है.

चीन यह भी कहता है की जिन देशों मे यह बंदरगाह और अन्य ठिकानें बनाए गए हैं वह सिविलियन प्रयोग हेतु हैं और उन देशों की सरकारों ने इन सुविधाओं के सैन्य उपयोग पर पाबंदी लगा रखी है. यह सच है, पर यह भी उतना ही सच है की चीन के अन्य किसी देश के साथ युद्ध होने की स्थिती में इन देशों की सरकारें क्या इन सुविधाओं के सैन्य उपयोग से चीन को रोक पाएगी?

इन सभी मुद्दों से कुछ बाते उभर के आती हैं. चीन हिंद महासागर में जो बंदरगाह और अन्य ठिकानों को विभिन्न देशों मे बना रहा है उनका सिविलियन और सैन्य उपयोग किया जा सकता है. प्रथम दृष्टी में चीन का ये दावा सही लगता है कि उसे ये बंदरगाह और अन्य ठिकाने आर्थिक कारणों से बना रहा है पर चीन की सैनिक महत्वाकांक्षा छुपी नही है. परंतु इन सुविधाओं की सैन्य उपयोगिता सीमित है और चीन उसका ज्यादा फायदा नहीं उठा सकता क्योंकि यह सभी सुविधाए उनकी मेन लेंड से काफी दूर है और ये जगहें चीनी नौसैनिक जहाजों को सिर्फ लाजिस्टिक ही दे पाएंगे, सैन्य सामग्री नही.

किसी भी देश को अपनी सुरक्षा के लिए चाक चौबंद रहना ही पडता है. भारत इसका कोई अपवाद नही है. परंतु चीन द्वारा इन बंदरगाहों और ठिकानों को बनाना भारत ने दखल लेने लायक विषय है. हम भारतवासियों को यह बात संतोषजनक है कि भारत इन सभी डेवलपमेंटस् पर ना सिर्फ पैनी नजर बनाए हुए है परंतु अपनी सुरक्षा के लिए आवश्यक कदम भी उठा रहा है.

 

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कमोडोर हर्षद दातार

कमोडोर हर्षद दातार भारतीय नौसेना की विद्युत ब्रांच के वरिष्ठ सेवानिवृत अधिकारी हैं. इन्होने इंजिनियरींग कि शिक्षा समाप्त करने के पश्चात 1984 मे नौसेना मे सेवा प्रारंभ की. इन्हे इंजिनियरींग के अलावा रक्षा और सामरिक विज्ञान और मनेजमेंट मे स्नातकोतर उपाधियां प्राप्त है. साथ ही ये मनेजमेंट मे एम फिल भी है. कमोडोर हर्षद नौसेना कि इन हाऊस पत्रिकाओ मे लिखते रहे है. वह सामरिक विषयो के अलावा ट्रेवल और चाईल्डकेयर विषयों पर harshad-datar.blogspot.in इस पते पर ब्लाग लिखते है. सेवानिवृती के पश्चात अब वह पूना मे रहते हैं.

संपर्क : 8800334895