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“बच्चा कंटेंट नहीं है”: सुधा मूर्ति ने राज्यसभा में माता पिता को कड़ा संदेश दिया

“बच्चा कंटेंट नहीं है”: सुधा मूर्ति ने राज्यसभा में माता पिता को कड़ा संदेश दिया

नई दिल्ली: सोशल मीडिया की तेज रफ्तार और वायरल होने की होड़ के बीच बच्चों का डिजिटल इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है। इसी गंभीर सामाजिक मुद्दे पर राज्यसभा में सांसद सुधा मूर्ति ने तीखी और संवेदनशील बात रखी। उन्होंने कहा कि आज कुछ माता पिता अपने छोटे बच्चों को ऑनलाइन कंटेंट मशीन की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं, जहां बचपन केवल व्यूज, फॉलोअर्स और कमाई का साधन बनकर रह गया है। उन्होंने चेताया कि इस चलन का सबसे गहरा और स्थायी नुकसान बच्चों को ही झेलना पड़ता है, जिसकी भरपाई बाद में संभव नहीं होती।

▪️क्या कहा सुधा मूर्ति ने

▫️राज्यसभा में शून्यकाल के दौरान बोलते हुए सुधा मूर्ति ने कहा कि कई माता पिता बच्चों को अलग अलग कपड़े पहनाकर, नचाकर या बार बार वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर डाल रहे हैं। यह सब लोकप्रियता और पैसों के लिए किया जा रहा है। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि बच्चा इस प्रक्रिया का स्वीकृत भागीदार नहीं होता, क्योंकि वह न तो अनुमति दे सकता है और न ही यह समझ सकता है कि उसकी निजी जिंदगी सार्वजनिक मंच पर परोसी जा रही है। सुधा मूर्ति ने कहा कि इससे बच्चों की मासूमियत खत्म होती है और उनकी सोच व मानसिकता पर गहरा असर पड़ता है।

▪️बच्चों के विकास पर असर

▫️सुधा मूर्ति ने आगाह किया कि लगातार कैमरे के सामने रहने से बच्चे असली जीवन के जरूरी कौशल सीखने से वंचित हो जाते हैं। खेल, सामाजिक व्यवहार, पढ़ाई और भावनात्मक संतुलन जैसे पहलू पीछे छूट जाते हैं। उन्होंने कहा कि बचपन प्रयोग और सीखने का समय होता है, न कि प्रदर्शन और कमाई का माध्यम।

▪️सरकार से क्या मांग की

▫️सांसद सुधा मूर्ति ने केंद्र सरकार से इस मुद्दे पर तुरंत हस्तक्षेप की मांग की। उन्होंने कहा कि फिल्मों और विज्ञापनों में बच्चों के काम करने को लेकर सख्त नियम हैं, लेकिन सोशल मीडिया के मामले में कोई स्पष्ट कानून नहीं है। उन्होंने सरकार से आग्रह किया कि बच्चों को डिजिटल शोषण से बचाने के लिए ठोस नियम और दिशानिर्देश बनाए जाएं, ताकि उनके अधिकार और भविष्य सुरक्षित रह सकें।

▪️विशेषज्ञों की राय

▫️बाल विकास और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े विशेषज्ञ भी लंबे समय से इस खतरे की ओर ध्यान दिलाते रहे हैं। उनका कहना है कि बिना सहमति और बिना सीमाओं के बच्चों को ऑनलाइन एक्सपोजर देना उनके भावनात्मक विकास, निजता और आत्मविश्वास को नुकसान पहुंचा सकता है। कई मामलों में बच्चे यह समझ ही नहीं पाते कि उनकी हर गतिविधि सार्वजनिक रिकॉर्ड का हिस्सा बन रही है।

▪️अंतरराष्ट्रीय उदाहरण

▫️कुछ देशों ने पहले ही इस दिशा में कड़े कदम उठाए हैं। फ्रांस जैसे देशों में बच्चों को डिजिटल प्लेटफॉर्म पर प्रस्तुत करने को लेकर नियम बनाए गए हैं, ताकि माता पिता बच्चों की छवि और कमाई का दुरुपयोग न कर सकें। सुधा मूर्ति ने संसद में ऐसे अंतरराष्ट्रीय उदाहरणों की ओर संकेत करते हुए कहा कि भारत को भी समय रहते ऐसे कानून अपनाने चाहिए।

▪️आगे क्या बदलाव संभव

▫️सुधा मूर्ति के बयान के बाद यह मुद्दा नीति निर्माण के स्तर पर गंभीर चर्चा का विषय बन गया है। उम्मीद की जा रही है कि सरकार सोशल मीडिया कंपनियों, बाल अधिकार संगठनों और कानूनी विशेषज्ञों के साथ मिलकर बच्चों की डिजिटल सुरक्षा के लिए रूपरेखा तैयार करेगी। इसमें माता पिता की जवाबदेही, बच्चों की निजता और ऑनलाइन कंटेंट पर नियंत्रण जैसे पहलू शामिल हो सकते हैं।

▪️संदेश साफ

▫️राज्यसभा में सुधा मूर्ति का संदेश स्पष्ट और सशक्त था। उन्होंने यह याद दिलाया कि बच्चा कोई कंटेंट नहीं, बल्कि एक संवेदनशील इंसान है, जिसका बचपन सुरक्षित रहना चाहिए। सोशल मीडिया के इस दौर में यह चेतावनी समाज और सरकार दोनों के लिए अहम है। अब नजर इस बात पर है कि इस चेतावनी के बाद बच्चों की सुरक्षा को लेकर कितनी जल्दी और कितनी मजबूती से कदम उठाए जाते हैं।