
Film Review: कारा- सस्पेंस से भरी 1990 के दशक की कहानी,जब STD PCO का दौर था
कीर्ति कापसे
नेटफ़्लिक्स पर हाल ही साउथ की फ़िल्म (कारा)जिसे हिन्दी में डब किया गया है, एक अच्छी फ़िल्म है । यदि आप साउथ की फ़िल्में देखने के शौकीन है और फ़िल्मों में सस्पेंस आपको पसंद है तो ये फ़िल्म आपको ज़रूर अच्छी लगेगी ।
यह कहानी 1990 के दशक के उस दौर को जीती है जहाँ अपराध, लालच और तिकड़मबाज़ी है।
फ़िल्म आपको 90 के दशक में ले जाती है जब STD PCO का दौर था ,कोई आधुनिक उपकरण नहीं थे पुराने घूल भरे घर ,ग्रामीण परिवेश ,अपनों को बचाने की जद्दोजहद एक साथ चलती है।
मुख्य किरदार कारा (धनुष) कोई चमकता हुआ हीरो नहीं है, बल्कि एक ऐसा आम इंसान है जो अपने अतीत के दलदल से निकलकर अपने परिवार (माता-पिता, पत्नी), के साथ एक शांत ज़िंदगी जीना चाहता है। लेकिन जब आपकी पुश्तैनी ज़मीन, आत्मसम्मान और आर्थिक तंगी आपको दीवार से सटा दे, तो इंसान क्या करता है?
फिल्म का टर्निंग पॉइंट एक बड़े बैंक की डकैती (Heist) बनता है, जिसमें परिस्थितियाँ उसे झोंक देती हैं। यह डकैती सिर्फ पैसों के लिए नहीं, बल्कि वजूद की लड़ाई है। कहानी सिर्फ अपराध की नहीं है, यह अपनों के बीच बदलते रिश्तों, धोखे, लालच और खुद को साबित करने काम शुरू करने की जद्दोजहद को लेकर है (Redemption) जो कारा के बेहद सच्चे और यथार्थवादी दर्द को दिखाती है।
*धनुष की आँखों का अभिनय -*
धनुष जब स्क्रीन पर आते हैं, तो वह डायलॉग्स से ज़्यादा अपनी खामोशी और आँखों से बोलते हैं। एक ज़िम्मेदार बेटे, एक पक्के दोस्त और पत्नी के सामने अपनी बेबसी छुपाने वाले मर्द का किरदार है सब कुछ इतना रीयलिस्टिक है कि आपको लगता ही नहीं कि आप एक्टिंग देख रहे हैं।आप ख़ुद को कारा की स्थिति में पाते है।
किरदारों के बीच का जमीनी तनाव मामा और भांजे का किरदार और दोस्त का साथ कहानी में वो रीयलिस्टिक मोड़ लाता है जहाँ पैसों की ज़रूरत और चोरी की मजबूरी के बीच की लकीर धुंधली हो जाती है। किरदारों के बीच का ड्रामा काफी रियल और कड़क है।
*बैंक डकैती वाला पूरा हिस्सा*
हॉलीवुड स्टाइल की ग्लैमराइज्ड डकैती जैसा नहीं है। इसमें वो घबराहट, पसीना, डर और अपनों को खोने का जोखिम साफ दिखता है जो असल जिंदगी के किसी क्राइम में होता होगा।
कुछ सीन बेहद रीयलिस्टिक बन गए है दोस्त का घायल होना और गाव के वैध द्वारा उसका इलाज करना ,यह दृश्य में अभिनय रोंगटे खड़े कर देता है ।
*कहाँ कमी रह गई?*
फ़िल्म की धीमी रफ़्तार कहीं कहीं कम हो जाती है रियलिज्म के चक्कर में डायरेक्टर ने कई जगहों पर स्क्रीनप्ले को बहुत ज्यादा खींच दिया है। खासकर माता-पिता और पत्नी के साथ के कुछ इमोशनल सीन्स और स्लो-बर्न ड्रामा आम दर्शक को थोड़ा सुस्त लग सकता है।
सेकंड हाफ के बाद जब डकैती के परिणाम सामने आते हैं, तो फिल्म जिस तेज़ी से आगे बढ़नी चाहिए थी, वह थोड़ी भटक जाती है।लेकिन
फिल्म का यह पहलू कहानी को असल जिंदगी के बेहद करीब और दर्दनाक बनाता है। फिल्म में विलेन सिर्फ वो गुंडे नहीं हैं जो बंदूक उठाते हैं, बल्कि असली विलेन सफेदपोश (White-collar) अपराधी हैं, जैसे कि वह बदमाश बैंक का रीजनल मैनेजर।
जो सिस्टम का असली और क्रूर चेहरा है ।बैंक मैनेजर का फिल्म में विलेन का किरदार सिर्फ मार-धाड़ तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस कॉर्पोरेट चोरी और बैंकिंग सिस्टम के काले चेहरे को दिखाता है जो गरीब किसानों और सीधे-सादे ग्रामीणों का खून चूसता है। बैंक मैनेजर का किरदार इस फिल्म की सबसे बड़ी कड़वी सच्चाई है।
जो जटिल शर्तों का मायाजाल बिछा कर आम और कम पढ़े-लिखे लोगों की मजबूरी का फायदा उठाता है। जब कारा (धनुष) या उसके जैसे अन्य ग्रामीण आर्थिक संकट में बैंक के पास जाते हैं, तो उन्हें बड़ी-बड़ी और लुभावनी बातें दिखाई जाती हैं। लेकिन असली खेल उन दस्तावेज़ों के ‘नियम और शर्तों’ (Fine Print) में छुपा होता है, जिन्हें कोई गरीब पढ़ या समझ नहीं पाता।
कर्ज का अंतहीन कुचक्र में बैंक वाले जानबूझकर ब्याज दरों और छुपे हुए शुल्कों (Hidden Charges) को छिपाकर रखते हैं। नतीजा यह होता है कि एक बार कर्ज लेने के बाद, किसान या गरीब इंसान सिर्फ ब्याज चुकाते-चुकाते ही अपनी पूरी जिंदगी गंवा देता है।
पुश्तैनी जमीन पर कब्जा इस चक्रव्यूह का सबसे भयावह हिस्सा तब सामने आता है जब बैंक मैनेजर इन जटिल शर्तों का सहारा लेकर सीधे उनकी पुश्तैनी जमीन को जब्त करने की धमकी देता है। बेहद दुखद सीन जब ये सब तब होता है जब कारा के पिता की मृत्यु हो जाती है और उन्हें वो दफ़ना भी नहीं पाता।
जमीन सिर्फ मिट्टी नहीं, बल्कि उस परिवार का वजूद और आत्मसम्मान होती है। जब वह छीनने लगती है, तो कारा जैसा सीधा इंसान भी सिस्टम के इस संस्थागत धोखे (Institutional Fraud) के खिलाफ हथियार उठाने और बैंक डकैती जैसा बड़ा कदम उठाने पर मजबूर हो जाता है।
यदि आप साउथ सिनेमा के ‘लार्जर-दैन-लाइफ’ या हवा में उड़ने वाले एक्शन देखने के आदी हैं, तो यह फिल्म आपके लिए नहीं है। लेकिन अगर आप, यथार्थवादी सिनेमा बेहतरीन अभिनय और स्लो-बर्न थ्रिलर के शौकीन हैं, तो नेटफ्लिक्स (Netflix) पर आपको यह फिल्म एक बार जरूर देखनी चाहिए है।
*एक और दिलचस्प बात:* थिएटर रिलीज़ के समय इसकी धीमी रफ्तार के कारण इसे मिक्स रिव्यूज मिले थे, लेकिन नेटफ्लिक्स (OTT) पर आने के बाद जब दर्शकों ने इसे शांत माहौल में देखा, तो इसकी पारिवारिक और सामाजिक बारीकियों को समझा। यही वजह है कि अब लोग इसकी काफी तारीफ कर रहे हैं। मुझे फ़िल्म बेहद पसंद आई मेरी नज़र में इसे ✡️✡️✡️✡️ दिए जाने चाहिए।





