
Valentine’s Day; अब न संभव गीत कोई

शब्द से होता नहीं है अब समन्वय भावना का
रागिनी फिर गुनगुनाये, है न संभव गीत कोई
बुझ गईं सुलगी प्रतीक्षा, की सभी चिंगारियाँ भी
चिन्ह पांवों के न बनते, अश्रु ने आँखें भिंगोई
खो चुकी है मुस्कुराहट, पथ अधर की वीथिका का
नैन नभ से सावनी बादल विदा लेते नहीं हैं
कंठ से डाले हुए हैं सात फ़ेरे सिसकियों ने
पल दिवस के एक क्षण विश्रांति का देते नहीं है
टूट बिखरी डोरियों के, हाथ में टुकड़े उठा कर
बिम्ब से अपने अपरिचित, हो हृदय की प्रीत रोई
हो गईं वर्तुल सभी जो, हाथ में रेखा खिंची जो
लौट कर आईं वहीं पर, थीं चलीं इक दिन जहाँ से
ज़िन्दगी के पंथ की सब, राह भूली हैं दिशाऐं
है अनिश्चित जायेंगी किस, ओर आईं हैं कहाँ से
दीप तो अनुभूतियों के, टिमटिमा कर बुझ रहे हैं
आस सूनी, इक शलभ को, कर सकेगी मीत कोई
धुन न गूँजे बांसुरी की, शुश्क कालिन्दी हुई है
और गगरी रिक्त संचय, का गँवा नवनीत रोई
बुझ गईं सुलगी प्रतीक्षा, की सभी चिंगारियाँ भी
चिन्ह पांवों के न बनते, अश्रु ने आँखें भिंगोई
मधु सोनी मधुकुंज
Valentine’s Day: एक कहानी रोज की
साहित्यकार डॉ. मनीष दवे की दो पुस्तकों का विमोचन हुआ





