
ऐसी तैसी डिप्लोमैसी! कैसी कैसी डिप्लोमैसी!!
~डॉ. प्रकाश हिन्दुस्तानी

कुछ ‘ज्ञानचंद’ बहुत ज्यादा उछल-कूद मचा रहे हैं – भारत को यह करना चाहिए, भारत को वह करना चाहिए : हमारी डिप्लोमेसी फेल हो गई है, अगैरह-वगैरह, आदि-इत्यादि ब्ला – ब्ला….
जहां तक मैं समझता हूं डिप्लोमैसी का एक ही मतलब है – हमारे हित किस में निहित है? डिप्लोमैसी सबकी अपनी – अपनी है. अमेरिका की डिप्लोमैसी अमेरिका के फायदे के लिए है, ईरान की डिप्लोमैसी ईरान के फायदे के लिए, पाकिस्तान की पाकिस्तान के लिए. हमने ठेका नहीं लिया है सांड और गेंडे की लड़ाई रुकवाने का.
भारत सरकार का एक ही काम है कि उसे भारत के लोगों का हित देखना है, भारत का और भारतवंशियों का हित देखना है. यही डिप्लोमैसी है और यही होना चाहिए. डिप्लोमैसी में नैतिकता-अनैतिकता, न्याय- अन्याय, पाप-पुण्य – यह सब नहीं होता. डिप्लोमैसी ख़ालिस डिप्लोमैसी होती है. भारत के लोगों का हित भारत की डिप्लोमैसी ही देखेगी पाकिस्तान की तो देखेगी नहीं.
दुनिया की सबसे बड़ी ताकत क्या नैतिकता के आधार पर चल रही? क्या वह पाप और पुण्य का हिसाब रखने के लिए बैठी है? बड़ी ताकत वह इसीलिए कहलाती है कि उसने हमेशा अपने ही हितों का सबसे ज़्यादा ध्यान रखा है.
जो काम ट्रंप कर रहे हैं वही काम अमेरिका के पुराने राष्ट्रपति भी करते रहे हैं. ना उनके काम में कोई नैतिकता थी और ना वर्तमान अमेरिकी राष्ट्रपति के काम में है.
दूसरे विश्व युद्ध में जब अमेरिका ने हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बम गिराया, तब क्या दुनिया को पता नहीं था कि जापान तो विश्व युद्ध में समर्पण करने के लिए बैठा है? जब अमेरिका ने इराक पर, अफगानिस्तान पर, कंबोडिया पर दादागीरी की, निकारागुआ में विद्रोहियों को हथियार तोहफे में दिये, एंटी बैलिस्टिक मिसाइल ट्रीटी से बाहर हुआ, पेरिस समझौते से बाहर हुआ, क्योटो प्रोटोकॉल तोड़ा और दुनिया के ताऊ की तरह अजीबोगरीब हरकतें की तब अमेरिका ने ज्ञानचंदों की राय नहीं ली. उसने केवल वही किया जो उसके हित में था.
डिप्लोमैसी बड़ी कु*त्ती है. इसमें लोग लड़ते भी हैं और साथ-साथ भी रहते हैं. समझौते की बातें करते हैं, लेकिन समझौता नहीं करते. समझौते नहीं करते लेकिन फिर भी चोरी छिपे समझौते कर लेते हैं. एक नहीं, अनेक उदाहरण मिल जाएंगे. जो है वह दीखता नहीं, जो नज़र आता है वह होता नहीं!
डिप्लोमैसी की औपचारिकता में एक-एक चीज़ तय होती है. किसी समझौते पर हस्ताक्षर करना है या नहीं करना है, समझौते की बातें करनी है और समझौता होता है. उसके पहले ही समझौते को कूड़ेदान में डाल दिया जाता है.
मैं एक प्रेषक की तरह देखता हूं कि हमारे डिप्लोमैट क्या कर रहे हैं. जो कर रहे हैं वह सही कर रहे हैं या ग़लत – इसके बारे में आज कोई फैसला नहीं लिया जा सकता. फैसला तो भविष्य लेता है. और वह इतिहास में दर्ज होता है.
Sileme यानी Are You Dead ? ये सीधे पूछता है – मर गया क्या? जिंदा है कि नहीं?




