सुप्रीम कोर्ट के सख्त रवैये से पद्मश्री जेएस राजपूत आहत… बोले करप्शन पर लिखना जरूरी है…

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सुप्रीम कोर्ट के सख्त रवैये से पद्मश्री जेएस राजपूत आहत… बोले करप्शन पर लिखना जरूरी है…

कौशल किशोर चतुर्वेदी
एनसीईआरटी की 8वीं की किताब में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार के चैप्टर को सुप्रीम कोर्ट ने आड़े हाथों लेते हुए इतना कड़ा रवैया अपनाया था कि न केवल एनसीईआरटी को माफी मांगनी पड़ी थी, बल्कि बिकी हुई किताबों को भी वापस बुलाना पड़ा था। इसके बाद भी सुप्रीम कोर्ट का गुस्सा शांत नहीं हुआ था। सीजेआई सूर्यकांत ने कहा था कि सुप्रीम कोर्ट के सेकेट्री जनरल इस पर जांच करेंगे कि ये कैसे छपी? यह एक साजिश भी हो सकती है। सीजेआई ने एनसीईआरटी को फटकार लगाते हुए कहा था कि उन्होंने गोली चलाई है, आज न्यायपालिका लहूलुहान है। सीजेआई ने कहा था कि हमें ऐसा लगता है कि यह इंस्टीट्यूशनल अथॉरिटी को कमजोर करने और ज्यूडिशियरी की इज्जत को कम करने की एक सोची-समझी चाल है। अगर इसे ऐसे ही चलने दिया गया, तो यह आम लोगों और युवाओं के आसानी से समझ में आने वाले मन में ज्यूडिशियल ऑफिस की पवित्रता को खत्म कर देगा। सुप्रीम कोर्ट के सख्त रवैये के सामने केंद्र सरकार को भी नतमस्तक होना पड़ा था और एनसीईआरटी को तो शाष्टांग दंडवत होने के बाद भी माफी नहीं मिलने जैसी स्थिति बनी थी। लेकिन शायद ही किसी ने सोचा होगा कि सुप्रीम कोर्ट के कड़े रवैये के बाद एनसीईआरटी ज्यादा लहूलुहान है। एनसीईआरटी के पूर्व निदेशक
शिक्षाविद, पद्मश्री जेएस राजपूत इस पूरे घटनाक्रम से इतने ज्यादा आहत हुए कि उन्होंने नपे तुले शब्दों में सुप्रीम कोर्ट के सख्त रवैये पर अपनी पीड़ा जाहिर कर दी है। एएनआई को दी गई अपनी प्रतिक्रिया में राजपूत ने वह सब कहा जो एनसीईआरटी की कार्यप्रणाली को जिम्मेदारी से भरा ठहराता है तो सुप्रीम कोर्ट के सख्त रवैये पर असहमति भी खुलकर प्रकट होती है।
एनसीईआरटी की किताब वाले विवाद पर एनसीईआरटी के पूर्व निदेशक जेएस राजपूत ने एएनआई के एक इंटरव्यू में कहा कि पूरा देश सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया का सम्मान करता है, लेकिन एनसीईआरटी भी कोई छोटा संस्थान नहीं है। यहीं से पढ़कर लोग बड़े-बड़े पदों तक पहुंचे हैं। अगर किताब में कुछ गलती थी, तो बैठकर बात करके ठीक किया जा सकता था। हर साल एनसीईआरटी अपनी किताबें अपडेट करता ही है। इतनी सख्त भाषा जैसे “कॉन्स्परेसी” और “स्कैंडल्स” इस्तेमाल करने की जरूरत नहीं थी।
उन्होंने ये भी कहा कि गलती हर किसी से होती है, कोर्ट से भी। कई बार लोग सालों बाद बेगुनाह साबित होते हैं, लेकिन गलत फैसलों के लिए किसी की जवाबदेही तय नहीं होती। फिर सिर्फ एनसीईआरटी पर ही इतना सख्त रवैया क्यों? और हां , करप्शन पर लिखना जरूरी है, लेकिन उस पर इतनी कड़ी प्रतिक्रिया देना भी सही नहीं था। तो एनसीईआरटी के पूर्व निदेशक और शिक्षाविद पद्मश्री जेएस राजपूत ने हालिया एनसीईआरटी पुस्तक विवादों के संदर्भ में सख्त भाषा (जैसे “साजिश”) के इस्तेमाल पर असहमति जताई है। उन्होंने कहा कि किताबें हर साल अपडेट होती हैं, इसलिए गलतियों को बातचीत से सुधारा जा सकता है। उन्होंने अदालती फैसलों में जवाबदेही की कमी पर भी सवाल उठाया है। एनसीईआरटी विवाद पर राजपूत ने कहा कि गलतियां सुधारी जा सकती हैं, इसके लिए ‘कन्स्पिरेसी’ या ‘स्कैंडल्स’ जैसे शब्दों का प्रयोग अनुचित है।
जगमोहन सिंह राजपूत भारत के एक प्रमुख शिक्षा शास्त्री हैं। राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) के निदेशक रह चुके हैं। राजपूत कई अन्य संस्थाओं में महत्वपूर्ण पदों पर कार्यरत रह चुके हैं। इसके अतिरिक्त वे यूनेस्को सहित कई अन्तर्राष्ट्रीय संस्थाओं से भी जुड़े रहे हैं।यूनेस्को ने उन्हें जॉन एमोस कामेनियस मैडल से सम्मानित किया। मध्य प्रदेश सरकार ने उन्हें वर्ष 2011-12 के लिये महर्षि वेदव्यास सम्मान दिया।भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने 8 अप्रैल 2015 को जगमोहन सिंह राजपूत को पद्मश्री से सम्मानित किया था। वर्ष 2004 में सेवानिवृत्त होने के बाद उन्होंने वियतनाम, ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी आदि अनेक देशों में व्याख्यान देने सहित विशिष्ट स्थापना कार्य किये। राजपूत की हिन्दी व अंग्रेजी में कई पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। इनमें पाठ्यक्रम परिवर्तन के आयाम, शैक्षिक परिवर्तन का यथार्थ, शिक्षा एवं इतिहास, शैक्षिक परिवर्तनों की परख, क्यों तनावग्रस्त है शिक्षा व्यवस्था?, मुस्कान का मदरसा, इनसाइक्लोपीडिया ऑफ इण्डियन एजूकेशन, सिम्फनी ऑफ ह्यूमन वेल्यूज़ और टीचर प्रीपरेशन फॉर नॉलेज सोसायटी शामिल हैं।
खैर, सुप्रीम कोर्ट के अपने अधिकार हैं। पर न्यायपालिका हो, कार्यपालिका हो या विधायिका हो… जेएस राजपूत की इस बात से सभी को सहमत होना पड़ेगा कि करप्शन पर लिखना जरूरी है। और इस बात से भी सभी को सहमत होना पड़ेगा कि जब सामने एनसीईआरटी जैसी जिम्मेदार संस्था हो तो गलतियों को बातचीत से सुधारा जा सकता है, न कि सिर्फ आक्रामक रुख अपनाकर। सुप्रीम कोर्ट के सख्त रवैये से पद्मश्री जेएस राजपूत का आहत होना निश्चित तौर से न्यायसंगत है…।
लेखक के बारे में –
कौशल किशोर चतुर्वेदी मध्यप्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार हैं। प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में पिछले ढ़ाई दशक से सक्रिय हैं। पांच पुस्तकों व्यंग्य संग्रह “मोटे पतरे सबई तो बिकाऊ हैं”, पुस्तक “द बिगेस्ट अचीवर शिवराज”, ” सबका कमल” और काव्य संग्रह “जीवन राग” के लेखक हैं। वहीं काव्य संग्रह “अष्टछाप के अर्वाचीन कवि” में एक कवि के रूप में शामिल हैं। इन्होंने स्तंभकार के बतौर अपनी विशेष पहचान बनाई है।
वर्तमान में भोपाल और इंदौर से प्रकाशित दैनिक समाचार पत्र “एलएन स्टार” में कार्यकारी संपादक हैं। इससे पहले इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में एसीएन भारत न्यूज चैनल में स्टेट हेड, स्वराज एक्सप्रेस नेशनल न्यूज चैनल में मध्यप्रदेश‌ संवाददाता, ईटीवी मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ में संवाददाता रह चुके हैं। प्रिंट मीडिया में दैनिक समाचार पत्र राजस्थान पत्रिका में राजनैतिक एवं प्रशासनिक संवाददाता, भास्कर में प्रशासनिक संवाददाता, दैनिक जागरण में संवाददाता, लोकमत समाचार में इंदौर ब्यूरो चीफ दायित्वों का निर्वहन कर चुके हैं। नई दुनिया, नवभारत, चौथा संसार सहित अन्य अखबारों के लिए स्वतंत्र पत्रकार के तौर पर कार्य कर चुके हैं।