रविवारीय गपशप : जब हाथी खा गया जनगणना का रिकॉर्ड

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रविवारीय गपशप : जब हाथी खा गया जनगणना का रिकॉर्ड

हमारे देश में होने वाली जनगणना की तैयारियाँ अब प्रारम्भ हो गई हैं । प्रत्येक दस वर्षों में होने वाली जनगणना भारत में वर्ष 1872 से प्रारम्भ हुई थी और इसके बाद 1881 से लेकर हर दस वर्षों में भारत में जनगणना होती रही है । हर दशक में होने वाले इस महत्वपूर्ण राष्ट्रीय कार्यक्रम में केवल दो बार व्यवधान आया , एक तो वर्ष 1941 में द्वितीय विश्वयुद्ध के कारण और वर्ष 2021 में कोविड महामारी के कारण जनगणना नहीं हो पायी थी । स्वतंत्रता के बाद जनगणना बकायदा जनगणना अधिनियम 1948 के तहत सांवैधानिक प्रावधानों के अनुसार होती है । आख़िरी बार सन् 2011 में पंद्रहवीं जनगणना हुई थी और वर्ष 2026 में सोलहवीं जनगणना प्रारम्भ हो रही है । पहले चरण में अप्रेल से सितम्बर तक हाउस लिस्टिंग यानों रहवास की गणना और फरवरी 2027 से नागरिकों की वास्तविक गणना प्रारम्भ होगी ।

जैसा की हमारे देश में अक्सर होता है , मानव विकास के लिए अहम सूचकांक इकट्ठा करने का यह कार्य भी राजनीतिक उठापटक का विषय बनता रहा है परन्तु इसमें कोई शक नहीं कि स्वास्थ्य , शिक्षा , आवास , उद्योग और विकास की हर अवधारणा के लिये ये एक बड़ा और महत्वपूर्ण कार्य है । अब नया जमाना एआई का हो गया है , इस बार जनगणना भी डिजिटल होने वाली है । हम ख़ुद ही पोर्टल खोल कर अपने और अपने परिवार से संबंधित जानकारी वांछित स्थान में भर पायेंगे । मध्यप्रदेश में जनगणना के लिए निदेशक के तौर पर संजीव श्रीवास्तव की नियुक्ति हुई है , जो कुछ दिनों पहले भिण्ड जिले के कलेक्टर हुआ करते थे ।

इस बार कम्प्यूटर पर होने वाली जनगणना से मुझे हमारे समय में होने वाली जनगणना की यादें ताज़ा हो गई , जिनमें बड़े लम्बे चौड़े फॉर्मेट में जानकारियाँ भरवाई जाती थीं । वर्ष 1991 में मैं नरसिंहपुर जिले में डिप्टी कलेक्टर के तौर पर पदस्थ हुआ था , तभी जनगणना का कार्य प्रारम्भ हुआ । नरसिंहपुर के कलेक्टर श्री मंडलेकर ने मुझे जिले में जनगणना कार्य का प्रभारी अधिकारी नियुक्त कर दिया । मैं आदेश पढ़कर थोड़ा घबराया , निर्देशों में इस काम के लिए किसी वरिष्ठ अधिकारी को सौंपा जाना था और मेरी तो अभी नौकरी ही चार बरस की हुई थी । मंडलेकर साहब से मिला तो वे बोले , ध्यान से पढ़ कर काम करो , वरिष्ठता अपने आप आ जायेगी ।

मैं कलेक्टर के चेम्बर से निकला तो जिला सांख्यिकी अधिकारी श्री एनएस बाजपेयी जी मिल गए जो निहायत ही शरीफ और काबिल अफसर थे । मिलते ही कहने लगे बधाई हो , अब तो हम दोनों का साथ हो गया , साथ साथ जनगणना करायेंगे । मैंने चिंता जाहिर की तो कहने लगे अरे आप फिक्र ना करो , मैं हूँ ना । बहरहाल काम प्रारम्भ हुआ , ढेरों प्रगणक और सुपरवाइज़र को ट्रेनिंग और जनसामान्य से जानकारी एकत्र करने की कवायद देख लगा , ये तो बड़ा विस्तृत काम था । बाजपेयी जी का साथ सचमुच बहुत काम आया , पर प्रशासनिक जिम्मेदारी बड़ी चीज़ थी ।

हर सप्ताह हम दोनों बैठते और समीक्षा करते कि कौन से प्रगणक समय से पीछे हैं । दो तीन बार की साप्ताहिक समीक्षा में मैंने पाया कि एक सज्जन कुछ ज़्यादा ही पीछे थे , मैंने कड़ी भाषा में नोटिस जारी किया तो अगले दिन प्रगणक सुबह सुबह दफ्तर में उपस्थित हुए । मुझे परिचय दिया तो मैंने थोड़ा डाँट लगाई , बस वो तो रोनी शक्ल बना कर बोले “ सर क्या बतायें , काम में पिछड़ ज़रूर गया था , पर सारी जानकारी मैंने रफ़ कॉपी में बना रखी थी , आज म्युनिस्पल पार्क में बैठ उसे पक्के फ़ार्मेट में भर ही रहा था , कि कहीं से हाथी आ गया और मेरे पूरे कागज़ खा गया । बड़ी मुश्किल से उसके पीछे पीछे घूमा तब कहीं जाकर जब उसने लीद की तब जाकर ये मिला है , और इतना कह उसने एक कपड़े में लीद से लिपटे ढेर सारे जनगणना पत्रक मुझे दिखाये ।

अब कोई क्या कह सकता था , मैं समझ तो गया कि काम पूरा न कर पाने का उसने ये बहाना बनाया है , पर अब कर भी क्या सकते थे । रिजर्व प्रगणकों में से कुछ होशियार बंदे लगाये और काम पूरा कराया , पर अब भी जब कभी जनगणना का नाम आता है , मुझे ये मज़ेदार प्रसंग याद आ जाता है ।