रविवारीय गपशप : मुझे सीएस ने डांटा, इसलिए मैंने डांटा, अब तुम तहसीलदार को डांट दो

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रविवारीय गपशप : मुझे सीएस ने डांटा, इसलिए मैंने डांटा, अब तुम तहसीलदार को डांट दो

आनंद शर्मा

इसमें कोई शक नहीं कि अफ़सर का काम है डाँटना और अधीनस्थ का काम है डाँट सुनना । लेकिन कई बार बिना वजह के भी डाँट खाना पड़ जाती है । अफ़सर का मूड कैसा है , घर से दफ्तर कैसे मूड में आया है , ये सब भी डाँट-फटकार की रस्म में निर्भर करता है ।

आपने शायद प्रसिद्ध रूसी लेखक एंटोनी चेखव की वो लोकप्रिय कहानी “ एक सरकारी क्लर्क की मृत्यु” पढ़ी होगी जिसमें एक लिपिक ग़लती से अपने अफ़सर के मुँह पर छींक देता है और अपने अपराध-बोध और भय में इतना उलझ जाता है कि उसे लगता है कि अधिकारी उससे नाराज़ है और अंततः वह इसी मानसिक आघात व चिंता से टूटकर मर जाता है?

दरअसल आदमी के स्वभाव और उसके व्यवहार में बहुत सारे तत्वों का योगदान रहता है और ये सब मिलकर ही उसकी सोच को सकारात्मक और नकारात्मक बनाती हैं । इसी सन्दर्भ में मुझे एक बहुत पुराना किस्सा याद आ रहा है । ये बात वर्ष 1992-93 की रही होगी , जब मैं सीहोर में अनुविभागीय अधिकारी हुआ करता था ।

श्री होशियार सिंह साहब तब राजस्व विभाग के सचिव हुआ करते थे । मेरा उनसे कोई ज्यादा परिचय नहीं था , एक-आध बार की मुलाकात थी और वो भी तब जब वे किसी सरकारी दौरे में जिले में आये थे । एक दिन की बात है , मैं किसी काम से कलेक्टर के स्टेनो कक्ष में फ़ोन करने के लिए गया था । उन दिनों एसटीडी फ़ोन की सुविधा , जिसमें अपने शहर से बाहर फ़ोन काल कर सकते थे , केवल कलेक्टर को उपलब्ध हुआ करती थी । इस वजह से कभी कोई जरूरी बात करनी होती तो हम कलेक्टर ऑफिस के फ़ोन का ही उपयोग कर लिया करते । श्री दुधे उन दिनों कलेक्टर के पीए हुआ करते थे । खुशमिजाज और बन ठन कर रहने के शौकीन , दुधे जी के रहते एसटीडी कॉल के साथ चाय की सुविधा भी हमें मिल जाती थी । सो उस दिन मैं कलेक्टर के पीए के कक्ष में पहुंचा ही था कि दुधे जी मुझे देखते ही बोले “अच्छा हुआ साहब आप आ गए , मैं आपको बुलाने ही वाला था , होशियार सिंह साहब आपसे अर्जेंट में बात करना चाह रहे थे ।

मैंने कहा ठीक है , लगाओ फोन । दुधे जी ने राजस्व सचिव का नंबर मिलाया और फोन मुझे दे दिया , लाइन पर होशियार सिंह साहब की हेल्लो की आवाज सुनते ही मैंने उनसे औपचारिक अभिवादन किया , पर वे तो किसी और ही मूड में थे । मुझे फोन पर उनकी नाराजगी भरी आवाज सुनाई दी “शर्माजी गरीब कब तक भटकते रहेंगे , आप लोग पद के नशे में ये भी भूल जाते हो कि किसी गरीब की गुहार भी आपको सुननी है ?” मैं कुछ हैरान हुआ , क्या सन्दर्भ है ? ये भी नहीं पता था , पर चूँकि मेरे स्वभाव में इस तरह जनसामान्य की समस्याओं के प्रति उपेक्षा का भाव कभी रहा नहीं तो मुझे थोडा गुस्सा भी आया , फिर भी अपने को जब्त करते हुए मैंने पूछा “ सर मुझे बतायें तो सही , मेरी क्या गलती है ? होशियार सिंह साहब बोले मैंने दो तीन महीने पहले एक अनुसूचित जाति के गरीब आवेदक का आवेदन भेजा था , जिसमें उसकी बिलकिसगंज स्थित भू स्वामी स्वत्व की जमीन का सरकारी भूमि से मुबादला (अदला बदली ) होना था , पर वो बेचारा अभी तक भटक रहा है । संयोग से मुझे प्रकरण का ध्यान आ गया , दो-एक सप्ताह पहले ही मैंने आवश्यक औपचारिकता की पूर्ति कर वो प्रकरण कलेक्टर को भेजा था और कलेक्टर ने प्रस्ताव अनुमोदित कर प्रकरण आवश्यक कार्यवाही हेतु मुझे वापस भेज दिया था । मंजूर हो चुके प्रकरण को मैंने रिकार्ड दुरुस्त करने तहसीलदार को भेज भी दिया था दिया था कि वो आवश्यक पूर्तियाँ कर आवेदक को अवगत करावे ।

अब मैंने भी थोडा रोष में उन्हें बताया कि उसका काम तो हुए एक हफ्ता हो गया है , और बजाय आप के पास जाने के ये आवेदक यहीं मेरे पास आ जाता तो इसे पता भी लग जाता । वो थोडा शांत हुए और कहने लगे “ अच्छा काम हो चुका है , वो भी बिना रिमाइंडर के “ ।

मैं और शेर हुआ और कहा जी हाँ और सर आप भी डाटने के पहले पूछ तो लेते की लापरवाही है भी या नहीं , बिना जाने आप ने मुझे क्या क्या सुना डाला । होशियार सिंह जी बोले “ अरे क्या करें यार , थोड़ी देर पहले मुझे सीएस ने कमरे में बुला कर डाँटा है , मैंने तुझे डाट दिया , तू अपने तहसीलदार को बुला के डाट ले ।