Environmental Concerns: महायज्ञ के समापन पर मां नर्मदा का 11000 लीटर दूध अभिषेक के लिए बहाया

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Environmental Concerns: महायज्ञ के समापन पर मां नर्मदा का 11000 लीटर दूध अभिषेक के लिए बहाया

सीहोर में नर्मदा नदी में 11,000 लीटर दूध बहाने पर विवाद छिड़ गया है. आस्था के इस बड़े आयोजन और मध्य प्रदेश में 10 लाख कुपोषित बच्चों की हकीकत के बीच गंभीर सवाल उठ रहे हैं. 

मध्य प्रदेश की जीवनदायिनी मानी जाने वाली नर्मदा नदी के आंचल में आस्था और संसाधनों के उपयोग को लेकर एक नई बहस छिड़ गई है. सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे एक वीडियो ने लोगों को सोचने पर मजबूर कर दिया है, जिसमें हजारों लीटर दूध सीधे नदी की लहरों में बहाते हुए दिखाया गया है.

सफेद होती चली गई नर्मदा की धार, टैंकर से नदी में 11 हजार लीटर दूध बहाया

 

 

दरअसल, वायरल वीडियो में संत शिवानंद महाराज को मां नर्मदा के तट पर टैंकर के जरिए लगभग 11 हजार लीटर दूध विसर्जित करते हुए देखा जा रहा है।यह दृश्य जहां एक ओर श्रद्धालुओं के लिए अटूट श्रद्धा और एक भव्य अनुष्ठान का हिस्सा है, वहीं दूसरी ओर इसने पर्यावरणविदों और समाज के प्रति जागरूक वर्ग को चिंता में डाल दिया है. सवाल सिर्फ आस्था का नहीं है .यह अब धर्म, जनकल्याण और पारिस्थितिकी तंत्र के बीच एक बड़े विवाद का रूप ले चुका है, जिसने प्रशासन से लेकर आम जनता तक को दो धड़ों में बांट दिया है.

 

सीहोर के पातालेश्वर महादेव मंदिर में हुआ भव्य आयोजन

NDTV की पड़ताल में यह साफ हुआ है कि वायरल वीडियो सीहोर जिले के सतदेव गांव का है, जहां श्री दादाजी दरबार पातालेश्वर महादेव मंदिर में चैत्र नवरात्रि के दौरान एक विशाल धार्मिक अनुष्ठान किया गया. यह आयोजन 18 मार्च से 7 अप्रैल तक पूरे 21 दिनों तक चला. इस दौरान महायज्ञ, शिव महापुराण कथा और दुर्गा पाठ जैसे कई कार्यक्रम हुए. आयोजकों ने बताया कि इस भव्य आयोजन के लिए 5 एकड़ में विशाल पंडाल बनाया गया था और करीब 41 टन पूजन सामग्री, जड़ी-बूटियों और सोने-चांदी तक का उपयोग किया गया.

Sihore Satdev Mahayagna Concludes; 11,000 Liters Milk Offered to Narmada

स्थानीय मान्यताओं के अनुसार यह सप्तऋषियों की प्राचीन तपोभूमि है, जहां भगवान शिव प्रकट हुए थे, इसलिए यहां की महिमा भक्तों के लिए सर्वोपरि है.वहीं, टैंकर से नर्मदा नदी में दूध बहाया जा रहा था। इस कार्यक्रम में शामिल होने आस-पास के गांवों से बड़ी संख्या में लोग आए थे। लोग नदी किनारे खड़े होकर इस कार्यक्रम को देखते रहे। आयोजकों ने बताया कि यह रस्म जन कल्याण, शांति और समृद्धि के लिए एक प्रतिकात्मक कदम के तौर पर तैयार की गई थी।