क्यों नहीं हो पाता मेल पापा की परियों और माँ के शहजादों में?

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क्यों नहीं हो पाता मेल पापा की परियों और माँ के शहजादों में?

वेद माथुर
हाल ही में भोपाल में एक नवविवाहित युवती की आत्महत्या ने पूरे देश का ध्यान फिर से शादी के रिश्तों, पति-पत्नी के बीच बढ़ते तनाव और कुछ ही महीनों में टूटते विवाह की ओर खींच लिया है। इस मामले में लड़की पक्ष का आरोप है कि लड़का पहले से तलाकशुदा था, वह अपनी पत्नी को मारता-पीटता था और जब वह गर्भवती हुई तो उसने शक जताना शुरू कर दिया कि बच्चा किसका है। लड़के की माँ ने भी अपनी बहू को मानसिक रूप से प्रताड़ित किया। सास बहू से पूछती थी कि “तुम्हारे कितने लोगों से इंटिमेट रिलेशन रहे हैं?” और आरोप है कि बहू इन दबावों में कुछ बातें स्वीकार भी करती थी।
सच्चाई अभी जांच के घेरे में है और पुलिस-कोर्ट में सामने आएगी, लेकिन इस घटना ने एक बड़े सामाजिक मुद्दे को फिर से ज्वलंत कर दिया है।पापा की परियाँ और माँ के शहजादेआजकल कई परिवारों में लड़कियों को “पापा की परियाँ” बनाकर पाला जाता है। इसमें प्यार और स्नेह तो बुरा नहीं है, लेकिन समस्या तब शुरू होती है जब उन्हें हर तरह की सुविधा, आराम और मनमानी में इतना ढाँक दिया जाता है कि वे ससुराल के नये, जिम्मेदारी भरे माहौल में खुद को एडजस्ट ही नहीं कर पातीं। छोटी-छोटी बातों में भी वे टूट जाती हैं।
दूसरी तरफ लड़के “माँ के शहजादे” बनकर बड़े होते हैं। माता-पिता की कमाई, संपत्ति और रुतबे पर जीते हुए वे मेहनत, संघर्ष और जिम्मेदारी से दूर हो जाते हैं। उनके अंदर घमंड और अहंकार घर कर जाता है। जब ऐसी “परियाँ” और “शहजादे” शादी के बंधन में बंधते हैं तो टकराव तय है। इगो क्लैश शुरू हो जाता है। कुछ महीनों में ही बात हत्या, आत्महत्या या तलाक तक पहुँच जाती है।
माता-पिता का दायित्व:
माता-पिता का सबसे बड़ा कर्तव्य केवल बच्चों को प्यार और सुविधाएँ देना नहीं है। उन्हें मेहनत, दुनिया की हकीकत, दूसरों के प्रति संवेदनशीलता और समायोजन भी सिखाना है। अगर बच्चे को सिर्फ मौज-मस्ती और मनमानी सिखाई जाए तो बाद में जब ससुराल या दामाद बनकर नए घर में जाना पड़े तो वह टूट जाता है। भोपाल के इस मामले (समर्थ और तृषा) में भी यही लगता है कि दोनों तरफ से बच्चों को जमीनी हकीकत से दूर रखा गया था। लड़की बिना मेहनत के मौज-मस्ती की आदी थी, गर्भावस्था में बच्चा नहीं चाहती थी और गर्भपात करा लिया। लड़का पहले से तलाकशुदा था और माता-पिता की पोजीशन के नशे में था।परिणाम? एक युवती की जान चली गई, दूसरे की पूरी जिंदगी पुलिस, कोर्ट, जेल और वकीलों के चक्कर में फंस गई। समाधान क्या है?हमें अपने बच्चों का पालन-पोषण भारतीय सभ्यता, संस्कृति और जमीनी हकीकत के आधार पर करना चाहिए। उन्हें सिखाना चाहिए कि:शादी सिर्फ दो लोगों का नहीं, दो परिवारों का मिलन है।
समायोजन और त्याग दोनों पक्षों से चाहिए।
सुविधाएँ कमाने के लिए मेहनत जरूरी है।
अहंकार रिश्तों का सबसे बड़ा दुश्मन है।
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यदि हम बच्चों को धार्मिक और नैतिक शिक्षा भी दें तो कई समस्याओं से बचा जा सकता है। रामायण-महाभारत की कहानियाँ, गुरु-शिष्य परंपरा और भारतीय संस्कार उन्हें संतुलित बना सकते हैं।अंत मेंप्यार जरूरी है, लेकिन लाड़-प्यार में फर्क है।
पापा की परियाँ और माँ के शहजादे बनाना बंद करें। उन्हें जिम्मेदार, संवेदनशील और संस्कारी नागरिक बनाएँ। तभी शादियाँ टिकेंगी, परिवार टिकेंगे और समाज स्वस्थ रहेगा।समय आ गया है कि हम अपनी अगली पीढ़ी को सपनों के महल में नहीं, हकीकत की जमीन पर खड़ा करें।