Big Decision of High court: मकान मालिक–किरायेदार संबंध साबित करना अनिवार्य

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Big Decision of High court: मकान मालिक–किरायेदार संबंध साबित करना अनिवार्य

बिलासपुर: छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि केवल संपत्ति के स्वामित्व या राजस्व रिकॉर्ड में नाम दर्ज होने से कोई व्यक्ति स्वतः मकान मालिक (Landlord) नहीं बन जाता। अदालत ने कहा कि किरायेदारी से जुड़े मामलों में मकान मालिक और किरायेदार के बीच संबंध का ठोस प्रमाण होना जरूरी है।

*क्या है पूरा मामला*

मामला एक दुकान से जुड़ा था, जहां याचिकाकर्ता ने खुद को मालिक बताते हुए किरायेदार को बेदखल करने और बकाया किराया वसूलने की मांग की थी। हालांकि, निचली प्राधिकरणों (Rent Control Authority और Tribunal) ने यह कहते हुए याचिका खारिज कर दी कि दोनों पक्षों के बीच मकान मालिक–किरायेदार संबंध साबित नहीं हुआ।

इसके बाद मामला हाई कोर्ट पहुंचा, जहां कोर्ट ने भी निचली अदालतों के फैसले को सही ठहराया।

केवल मालिकाना हक होने से किरायेदारी संबंध साबित नहीं होता। किरायेदारी सिद्ध करने के लिए जरूरी है:

किराया समझौता (Rent Agreement)

किराया रसीद (Rent Receipt)

किराया भुगतान का प्रमाण

या किरायेदार द्वारा मकान मालिक को मान्यता (Attornment)

यदि ये प्रमाण नहीं हैं, तो बेदखली की कार्रवाई वैध नहीं मानी जाएगी।

राजस्व रिकॉर्ड पर भी स्पष्ट रुख

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि:

राजस्व या नगर निगम रिकॉर्ड में नाम दर्ज होना सिर्फ प्रशासनिक/कर उद्देश्यों के लिए होता है।

इससे किसी व्यक्ति को संपत्ति पर पूर्ण कानूनी अधिकार या मकान मालिक होने का दर्जा नहीं मिल जाता।

*कोर्ट का निष्कर्ष*

हाई कोर्ट ने कहा कि जब तक मकान मालिक और किरायेदार के बीच संबंध स्पष्ट रूप से सिद्ध नहीं होता, तब तक किरायेदारी कानून के तहत बेदखली की कार्रवाई नहीं की जा सकती।

*फैसले का महत्व*

यह फैसला उन मामलों में बेहद अहम माना जा रहा है जहा

परिवारिक विवाद के चलते संपत्ति पर दावा किया जाता है और केवल कागजी नाम के आधार पर किरायेदार को हटाने की कोशिश की जाती है।