राज-काज: नेतृत्व को पसंद नहीं आया गोपाल भार्गव का यह कड़वा सच….

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राज-काज: नेतृत्व को पसंद नहीं आया गोपाल भार्गव का यह कड़वा सच….

* दिनेश निगम ‘त्यागी’

नेतृत्व को पसंद नहीं आया गोपाल भार्गव का यह कड़वा सच….

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– विधानसभा के लगातार 9 चुनाव जीत चुके पूर्व मंत्री गोपाल भार्गव ऐसे नेता हैं, जिनकी अपनी पार्टी भाजपा के प्रति निष्ठा पर कोई सवाल नहीं उठा सकता। पर उनकी खूबी यह भी है कि समय-समय पर सच बोलने में वे पार्टी की परवाह नहीं करते। हाल में बोला गया उनका एक कड़वा सच भी पार्टी नेतृत्व काे पसंद नहीं आया। ब्राह्मण समाज के एक सार्वजनिक कार्यक्रम में उन्होंने कह दिया कि जब जाति की बात आती है तो पार्टी पीछे छूट जाती है। अर्थात जाति के सामने पार्टी कुछ नहीं होती। उन्होंने कहा कि मैंने कई समाजों में देखा है कि उनके नेता पार्टियों में बड़े पदों पर रहेंगे, लेकिन जब उनकी जाति, समाज का आदमी खड़ा होगा तो वह कितना ही निष्ठावान क्यों न हो अपनी जाति, समाज के व्यक्ति की तरफ ही जाएगा। भले वह खुल कर प्रचार ना करे, लेकिन अंदर-अंदर प्रचार करके उसको जिताने का काम करेगा। तब जाति के सामने पार्टी कुछ नहीं रह जाती। उन्होंने कहा कि भारत में आजादी के बाद 1947 में ब्राह्मणों की जो हैसियत थी, अब नहीं रही। उन्होंने कहा कि इसका मतलब यह नहीं कि हम वर्ग संघर्ष की पैरवी कर रहे हैं, बल्कि हम अपने जीवन को ऊंचा उठाने के प्रति संघर्ष की बात कर रहे हैं। इसमें कोई बुराई नहीं है। भार्गव का यह बयान पार्टी नेतृत्व को पसंद नहीं आया लेकिन वे तो ऐसे कड़वे सच बोलने के आदी हैं।

अपनों ने ही लगा दिया ‘संगठन सृजन’ पर पलीता….

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– कांग्रेस को नीचे से ऊपर तक मजबूत करने के उद्देश्य से राहुल के निर्देश पर ‘संगठन सृजन अभियान’ चलाया गया था। इससे निकले ऐसे नेताओं को पार्टी का जिलाध्यक्ष बनाया गया था, जो किसी बड़े नेता के पट्ठे नहीं थे। कांग्रेस नेतृत्व द्वारा नियुक्त पर्यवेक्षकों ने आम कार्यकर्ताओं की राय लेकर इनकी नियुक्ति करने का दावा किया था, लेकिन जिलाध्यक्ष बने राहुल के इन सिपाहियों ने ही संगठन सृजन को पलीता लगाने का काम कर डाला। इनके कामों की मानीटरिंग के आधार पर जो परफारमेंस रिपोर्ट सामने आई, उसके आधार पर ऐसे एक दर्जन से ज्यादा जिलाध्यक्षों को घर बैठाने की नौबत आ गई। कुछ ने तो खुद ही इस्तीफे की पेशकश कर दी। नेतृत्व का मानना था कि इन जिलाध्यक्षों के जरिए संगठन नीचे से ऊपर तक मजबूत होगा और अगले चुनाव में भाजपा को कड़ी चुनौती दी जा सकेगी, लेकिन अब इन नकारा जिलाध्यक्षों के जिलों में कांग्रेस के सामने फिर संगठन सृजन की चुनौती है। मजेदार बात यह है कि राहुल गांधी कैम्प के डिंडोरी जिला अध्यक्ष ओमकार सिंह मरकाम, सतना ग्रामीण के सिद्धार्थ कुशवाहा और मंडला के अशोक मर्सकोले जैसे नेता तक डेंजर जोन में है। साफ है कि कांग्रेस दो कदम आगे चलने की कोशिश करती है तो पार्टी के ही नेता उसे चार कदम पीछे खींच लाते हैं। कांग्रेस ऐसे कैसे करेगी भाजपा का मुकाबला?

फिर खुल जाएगा करोड़ों की वसूली का यह दरवाजा….!

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– हाईकोर्ट का एक निर्णय सुनकर अचरज हुआ। उसने सरकार को निर्देश दे दिया कि प्रदेश के सभी चेक पोस्ट 30 दिन के अंदर फिर शुरू कर दिए जाएं। मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव की सरकार ने तमाम शिकायतों के बाद इन्हें 1 जुलाई 2024 से बंद कर रखा है। निर्णय से अचरज इसलिए हुआ क्योंकि कोई अनपढ़ भी बता सकता है कि परिवहन विभाग के चेक पोस्ट अवैध कमाई और अवैध वसूली के सबसे बड़े अड्डे होते हैं। कमाई गई यह अवैध रकम अन्य बड़े अवैध कामों का जरिया बनती है। प्रदेश में सौरभ शर्मा का कांड सबसे ज्यादा चर्चित है, जो परिवहन विभाग का छोटा सा कर्मचारी था लेकिन 7 साल की नौकरी में 500 करोड़ का साम्राज्य खड़ा कर लिया था। चेक पोस्टों की अवैध वसूली से मीडिया सहित नेताओं और अफसरों को राशि पहुंचाने के चर्चे किसी से छिपे नहीं हैं। केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी भी चेक पोस्ट को अवैध कमाई का जरिया मानते हैं। इस संदर्भ में उन्होंने राज्य सरकार को एक पत्र लिखा था। हाईकोर्ट ने ओवरलोडिंग को आधार मान कर निर्णय सुना दिया जबकि टोल प्लाजा पर आटोमेटिक वजन कांटे और चार गुना पेनाल्टी की व्यवस्था लागू हो रही है। जब तकनीक के जरिए ओवर लोडिंग रोकी जा सकती है तो भ्रष्टाचार के दरवाजे चेक पोस्टों को फिर शुरू करने का औचित्य क्या है।

 दबंग, बड़बोले नेताओं से नहीं उबर पा रही भाजपा….

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– भाजपा में आमतौर पर जो होता है, वही बड़बोले और दबंग विधायक प्रीतम लोधी के साथ हुआ। भाजपा में यह परंपरा बन गई है कि कोई विधायक, मंत्री अथवा बड़ा नेता अनुशासन तोड़े तो उसे नसीहत देकर माफी दे दो लेकिन मंडल अथवा जिला स्तर का नेता गड़बड़ करे तो उसका इस्तीफा लेकर पार्टी से बाहर कर दो। जहां तक प्रीतम का सवाल है तो उन्होंने थार से लोगों को कुचलने वाले बेटे के मोह में एक पुलिस अधिकारी को धमकी दी थी। आईपीएस एसाेसिएशन के विरोध में उतरने के बाद प्रीतम को पार्टी नेतृत्व ने बुला कर फटकारा और माफी दे दी। प्रीतम को पहले भी पार्टी द्वारा दो बार माफ किया जा चुका है। पहली बार तत्कालीन अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर और दूसरी बार वीडी शर्मा ने इन्हें पार्टी से बाहर किया था, लेकिन बाद में इन्हें माफी देकर टिकट दे दिया गया। एक बार प्रीतम ने कथावाचकों के खिलाफ अभद्र भाषा का प्रयोग किया था और प्रदेश नेतृत्व ने तलब किया तो इन्होंने आने से ही इंकार कर दिया था और बोले थे कि वे सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिलेंगे। अब मंत्री नागर सिंह चौहान के भाई का मामला चर्चा में है। उन्होंने एक महिला अधिकारी प्रिया काक को जिंदा गाड़ने की धमकी दी थी। गैरजमानती केस के बावजूद धमकी देने वाला भाई उसी दिन जमानत पर बाहर आ गया और महिला अधिकारी डर के कारण बाहर नहीं निकल रही। भाजपा के ये अपने ही पार्टी की फजीहत करा रहे हैं।

यह मुख्यमंत्री डॉ यादव का एक और ‘मास्टर स्ट्रोक’….

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– मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव ‘मास्टर स्ट्रोक’ लगाने में उस्ताद दिखते हैं। उनका ताजा ‘मास्टर स्ट्रोक’ है किसानों की जमीन के अधिग्रहण पर चार गुना मुआवजा। उन्होंने यह फैसला लेकर एक तीर से कई निशाने साधे हैं। पहला, इससे विकास परियोजनाओं की राह में आने वाली बाधाओं को दूर किया जा सकेगा। दूसरा, इससे कई ज्वलंत मसलों का समाधान हो सकेगा और तीसरा, किसानों में संदेश चला गया कि मुख्यमंत्री डॉ यादव उनके बारे में सोचते हैं और उनकी तरक्की चाहते हैं। हाल के घटनाक्रमों पर नजर डालें तो छतरपुर और पन्ना जिले के आदिवासी-किसान केन-बेतवा लिंक परियोजना के बांध का निर्माण नहीं होने दे रहे। भूमि अिधग्रहण के मुआवजे को लेकर लंबे समय से आंदोलन कर रहे हैं। उज्जैन के सिंहस्थ से लेकर इंदौर और प्रदेश के तमाम प्रोजेक्ट के लिए जमीनों के अधिग्रहण का विरोध किसान और उनसे जुड़े संगठन कर रहे हैं। यही कारण है कि रेलवे लाइन से लेकर इकोनॉमिक कॉरिडोर , हाईवे, एयरपोर्ट सहित कई अन्य प्रोजेक्ट अटके पड़े हैं। उम्मीद है बाजार दर पर चार गुना मुआवजा देने की घोषणा से विभागों को अपने प्रोजेक्ट समय सीमा में पूरा करने में आसानी होगी। प्रोजेक्ट में विलंब कारण लागत बढ़ने से जो नुकसान होता है, उसमें भी अच्छी खासी बचत होगी।