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लघु कथा: “तीन मयूर”

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लघु कथा: “तीन मयूर”

संध्या पाण्डेय

घने जंगल के किनारे एक सुंदर मोर पक्षी रहता था। बारिश आते ही वह अपने रंग-बिरंगे पंख फैलाकर नाचता और प्रकृति की सुंदरता में खो जाता। न उसे कोई देखने वाला था न पकड़ने वाला।उसी जंगल के राष्ट्रीय उद्यान में एक मानक मयूर (राष्ट्रीय पक्षी ) भी था, जो सबको याद दिलाता था कि उसकी पहचान सिर्फ सुंदरता नहीं, बल्कि सम्मान और संरक्षण से भी जुड़ी है।उसे दूर दूर से लोग देखने आते थे। उसकी बढ़िया देखभाल होती थी।
एक दिन जंगल का मोर राष्ट्रीय उद्यान के पास से गुजरा।दोनों नेआपस में दोस्ती कर ली। दोनों आपस में मिलकर बातें करते। उन दोनों ने देखा कि — जो उद्यान का चौकीदार है वह अक्सर उदास बैठा रहता है। उसके मन में कोई खुशी नहीं दिखती ।जाने किस चिंता में वो डूबा रहता है।तब दोनों ने सलाह करके बरसात कि- एक शाम को बूंदों के साथ अपने पँख फैलाकर नृत्य शुरू कर दिया।यह देखकर चौकीदार के अंदर मन का मयूर प्रकट हुआ—वह दिखाई तो नहीं दे रहा था, लेकिन हर दिल में रहता है। यह अहसास करा रहा था।उसने धीरे सेअपने आप से कहा, —
“जब तक मन में खुशी नहीं, तब तक बाहर की सुंदरता अधूरी है।”

मोर पक्षी ने अपना नृत्य किया, मानक मयूर ने उसे गर्व और जिम्मेदारी का अर्थ समझाया, और मन के मयूर ने चौकीदार के दिल में उम्मीद जगा दी।
धीरे-धीरे वहाँ के सभी चेहरों पर मुस्कान आ गई—जैसे उन सबके भीतर भी एक मयूर नाच उठा हो।
सच्ची सुंदरता तब पूरी होती है, जब प्रकृति, पहचान और मन—तीनों में संतुलन हो।इसलिए मन का मयूर विशेष है।

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