लघुकथा- बुढ़ापा

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लघुकथा- बुढ़ापा

मनोरमा जोशी 

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वह हाँपता काँपता खाँसता झुककर दोहरी झुकी कमर को तनिक सीधा करने का असफल प्रयत्न करता हुआ बुरी तरह से छटपटा रहा था ।अकस्मात मृत्यु ने प्रत्यक्ष होकर कहा “हमारा मिलन तो अटल ही था , फिर तू क्यों भयभीत हो रहा है ?”  मृत्यु ने हल्का सा व्यंग कसते हुए फिर कहा  ‘अगर तू सोचता हैं, झुककर मेरी नजरों से बच जायगा तो यह तेरा भ्रम है ।”

BUDHAPA - An online Hindi story written by Satish Sharma | Pratilipi.com

 

बुढापे ने शांत स्वर में जवाब देते हुए  कहा “मैं तुझसे भयभीत नहीं हूँ मैं तो तेरा स्वागत करने को तैयार बैठा हूँ .मेरे झुकने का कारण भी तेरी नजरों से बचना नहीं बल्कि मेरी कमर तो उम्र के दौर से झुक रही है.  संसार से लिये हुए अपार कर्ज और भार से भी झुक रही है.”
बुढ़ापा तनिक रुका फिर स्मित भाव से जैसे स्वयम को ही बता रहा हो कहने लगा “मुझे  हर समय यह ध्यान रहता है कि संसार से जितना मैने लिया ,उसका एकांश भी चुका नहीं पाया।क्या मैं या कर्ज उतारे बिना ही चला जाउंगा?’अब बुढ़ापा पछतावे की पीड़ा से भर कर बोला “इसलिए मेरी कमर नियति के कर्ज भार से ,और गर्दन ग्लानि से झुकी रहती है ।”

यह सुनकर मृत्यु ने भी अपनी गर्दन झुका ली थी।