रविवारीय गपशप: सीनियरिटी के साथ IAS – IPS अधिकारियों की सुविधाओं और संसाधनों में आती है कमी

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रविवारीय गपशप: सीनियरिटी के साथ IAS – IPS अधिकारियों की सुविधाओं और संसाधनों में आती है कमी

आनंद शर्मा

अफसर में चाहे वे आईएएस हों या आईपीएस जैसे जैसे उनकी सीनियारिटी बढ़ती है , सुविधाओं और संसाधनों में कमी होती जाती है । कलेक्टर और एसपी जब जिलों में होते हैं , तो गाड़ी बँगला , कामकाज सम्हालने वाले कारकून आँखों के आगे पीछे , जहाँ देखो मौजूद मिलते हैं , पर प्रमोशन होने पर वही संसाधन सीमित रह जाते हैं।

बात पुरानी है , तब मैं ग्वालियर में उपायुक्त परिवहन के पद पर पदस्थ था और मेरे परिवहन आयुक्त रहे रमन कक्कड़ साहब ट्रांसफ़र होकर पीएचक्यू में एडीजी बन चुके थे । मैं उनके पास अपनी सीआर लिखने के अनुरोध के लिए गया था । वे मुझे अपने सामने बैठा कर हालचाल पूछ रहे थे , तभी एक डीआईजी साहब ने कक्ष में प्रवेश किया और उनसे कहने लगे , “सर ये गेराज वाले मुझे नई कार नहीं दे रहे हैं , जबकि आपने अलॉटमेंट जारी कर दिया है “। एडीजी साहब ने पूछा , आपने अपना पुराना वाहन जमा किया या नहीं ? डीआईजी साहब कहने लगे सर एक अतिरिक्त वाहन तो कभी कभी लगता ही है , मैं एसपी था तो तीन-तीन गाड़ियाँ बंगले पर थीं । एडीजी साहब बोले भाई वहाँ की वो जानें यहाँ तो पुराना वाहन जब तक जमा न करोगे , नया न मिलेगा । वे मायूस चेहरा लिए “ठीक है सर” कह कर विदा हो लिए ।

मैं राजगढ़ कलेक्टर के पद से स्थानांतरित होकर जब अपर सचिव सामान्य प्रशासन विभाग बना , तो किस्मत से मेरे दो खैरख्वाह वल्लभ भवन में मौजूद थे । एक तो श्री मुक्तेश वार्ष्णेय, जो समान्य प्रशासन विभाग में ही प्रमुख सचिव थे , और दूसरी श्रीमती सीमा शर्मा जो गृह विभाग में अपर सचिव थीं । सीमा शर्मा मैडम सीहोर जिले में मेरी अपर कलेक्टर भी थीं और मुझ पर छोटे भाई के सदृश स्नेह रखती थीं । मैं सीमा मैडम से ज्वाइन करने के बाद मिलने गया , तो उन्होंने तुरंत मुझे स्टेट गैराज से एक वाहन अलॉट कर दिया , और गैरेज के प्रभारी को निर्देश भी दे दिए , कि आज ही शाम तक वाहन इनको मिल जाना चाहिए । मुक्तेश वार्ष्णेय सर ने मुझे अपने बगल में ही सचिव वाला कक्ष आबंटित कर दिया जिसमे वॉशरूम कमरे के अंदर ही था , जिसकी महत्ता मुझे बाद में समझ आई जब मैंने अपने से कई वरिष्ठ लोगों को वल्लभ भवन में वॉशरूम युक्त चेम्बर तलाशते देखा । मैं जीएडी में अपर सचिव था तो चेम्बर का रखरखाव बेहतर था क्योंकि वल्लभ भवन की साफ़ सफाई का प्रबंध जीएडी के अधीन ही आता था । मेरे बैचमेट जो वल्लभ भवन में पदस्थ थे , वे अक्सर मेरे कक्ष में ही चाय के लिये पधारते और कहते , यार तुम्हारे कमरे में चाय जल्दी आती है , और काफ़ी हाउस का वेटर भी सर पे कलफ़ लगी टोपी लगा के आता है । मैं इस तरह की छोटी छोटी सुविधाओं से ही अभिभूत होता रहता , तभी मुझे जीएडी में अपनी पदस्थी के महत्व का अहसास भी हुआ । हुआ यूँ कि एक दिन वल्लभ भवन में प्रमुख सचिव प्रभांशु कमल साहब के पीए श्री प्रजापति का फ़ोन आया कि साहब आपको याद कर रहे हैं । प्रभांशु कमल मेरी ग्वालियर पदस्थापना के समय वहाँ के कलेक्टर थे , और प्रजापति भी मेरे पूर्व परिचित थे , तो मैं तुरंत ही कमल साहब के कक्ष में पहुँच गया । कमल साहब ने पहले तो हालचाल पूछा , फिर कहा “मेरे टॉयलेट से हमेशा बदबू आती रहती है , और चेम्बर में बैठना बड़ा मुश्किल बना रहता है , पर आपके विभाग वाले सुनते ही नहीं हैं , अब तुम आ गए हो तो भाई इस तकलीफ़ को दूर कराओ । मैंने महसूस किया कि सचमुच तमाम एक्जास्ट फ़ैन के चलने के और रूम फ्रेशनर के इस्तेमाल के बावजूद कमरे में बदबू आ रही थी ।

ग्वालियर के कलेक्टर के रूप में जलवे बिखेरने वाले कमल साहब का इतना सा अनुरोध था , बस मैंने अपने कक्ष में पहुंचते ही अपर सचिव चौहान साहब और नाजिर दोनों को बुलवा लिया । उन्हें पहले से ये समस्या मालूम थी । बोलने लगे “सर नीचे महिलाओं के लिए प्रसाधन बना है , और वहाँ मरम्मत की जरूरत है , पर उसे हम बंद नहीं कर पा रहे हैं , सो बिना उसकी मरम्मत किए ये समस्या दूर न होगी “। मैंने स्थल देखा तो महिलाओं के लिए प्रयुक्त किए जाने वाले टॉयलेट में भी बदबू थी । मैंने कहा इसे बंद कर मरम्मत क्यों नहीं कर सकते ? नाज़िर बोले फिर महिलाओं को प्रसाधन के लिए बहुत दूर जाना होगा । मैंने कहा आप इस टॉयलेट को बंद कर मरम्मत कराइये और महिला कर्मियों में जो थोड़ी सक्रिय हों उन्हें विश्वास में लेकर कहिए कि आपकी बेहतरी के लिए ये सब कर रहे हैं , जरूरत हो तो मैं भी रिक्वेस्ट कर लूँगा कि थोड़े दिन की तकलीफ़ सहन कर लें । बात बन गई और पंद्रह बीस दिन में जब सब दुरुस्त हो गया तो कमल साहब ने मुझे अपने चेम्बर में बुला कर धन्यवाद की चाय पिलाई ।