मध्यप्रदेश में जलता सिस्टम: आखिर कब जागेगी सरकार?

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मध्यप्रदेश में जलता सिस्टम: आखिर कब जागेगी सरकार?

पुष्पेंद्र वैद्य टीवी पत्रकार 

मध्यप्रदेश में एक बार फिर सड़क परिवहन व्यवस्था की भयावह लापरवाही ने एक मासूम की जिंदगी निगल ली। कल रात इंटरसिटी बस में लगी भीषण आग में सिर्फ़ चार साल का एक बच्चा जिंदा जल गया। उसके माता-पिता अपनी आँखों के सामने बेटे को बचाने के लिए चीखते-बिलखते रह गए, लेकिन सिस्टम की संवेदनहीनता उस आग से भी ज्यादा भयावह साबित हुई।

प्रारंभिक जानकारी के अनुसार यात्रियों ने रास्ते में ही खतरे की आशंका जताई थी। बस से असामान्य गंध और तकनीकी गड़बड़ी की शिकायतें भी सामने आईं, लेकिन न बस रोकी गई और न ही समय रहते उसकी जांच हुई। सवाल सिर्फ हादसे का नहीं है, सवाल उस मानसिकता का है जहाँ यात्रियों की जान से ज्यादा चिंता बस के “समय” और “कमाई” की होती है।

सबसे शर्मनाक तथ्य यह सामने आया कि बस में आपातकालीन निकास (Emergency Exit) तक नहीं था, या यदि था भी तो वह उपयोग की स्थिति में नहीं था। यह सीधे-सीधे नियमों की हत्या है।

दरअसल, यह पहली बार नहीं है जब मध्यप्रदेश में बस सुरक्षा को लेकर सवाल उठे हों। सैंधवा बस हादसे के बाद राज्य सरकार ने बड़े-बड़े दावे किए थे। उस दर्दनाक हादसे में कई लोगों की मौत हुई थी, जिसके बाद परिवहन विभाग ने सभी यात्री बसों में आपातकालीन द्वार अनिवार्य करने, फिटनेस जांच सख्त करने और सुरक्षा मानकों का पालन सुनिश्चित कराने की घोषणाएँ की थीं। कागज़ों में आदेश निकले, बैठकों में निर्देश दिए गए, लेकिन जमीनी हकीकत आज फिर उसी राख में दबी दिखाई दे रही है।

सवाल यह है कि यदि नियम लागू हुए थे तो फिर बिना सुरक्षा इंतज़ामों वाली बस सड़क पर कैसे दौड़ रही थी? फिटनेस प्रमाणपत्र किस आधार पर जारी हुआ? क्या परिवहन विभाग ने कभी वास्तविक जांच की या सिर्फ फाइलों में खानापूर्ति होती रही?

सच्चाई यह है कि प्रदेश में बड़ी संख्या में यात्री बसें मौत बनकर सड़कों पर दौड़ रही हैं। कहीं ओवरलोडिंग, कहीं जर्जर वाहन, कहीं फर्जी फिटनेस और कहीं सुरक्षा उपकरणों का पूरी तरह अभाव— लेकिन कार्रवाई तब होती है जब कोई हादसा सुर्खियाँ बन जाता है। कुछ दिन सख्ती दिखाई जाती है, फिर सब पहले जैसा हो जाता है।

सबसे दुखद यह है कि हर हादसे के बाद वही घिसे-पिटे बयान सामने आते हैं— “जांच के आदेश दे दिए गए हैं”, “दोषियों पर कार्रवाई होगी”, “मृतकों के परिजनों को मुआवजा दिया जाएगा।” लेकिन क्या चार साल के उस मासूम की जिंदगी की कीमत सिर्फ मुआवजा है? क्या हर बार मौत के बाद ही सिस्टम जागेगा?

यह हादसा सिर्फ एक बस में लगी आग नहीं है, यह प्रशासनिक लापरवाही, भ्रष्ट व्यवस्था और संवेदनहीन सिस्टम की जलती हुई तस्वीर है। सरकार को समझना होगा कि परिवहन सिर्फ परमिट और टैक्स का मामला नहीं, बल्कि हजारों यात्रियों की जिंदगी का सवाल है।

अब वक्त सिर्फ बयानबाजी का नहीं, जवाबदेही तय करने का है। क्योंकि जनता अब यह पूछ रही है— आखिर कब तक लापरवाही की आग में बेगुनाह जलते रहेंगे?