5 जून विश्व पर्यावरण दिवस- विकास की दौड़ में दम तोड़ती धरती

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5 जून विश्व पर्यावरण दिवस- विकास की दौड़ में दम तोड़ती धरती

राज कुमार सिन्हा

पर्यावरण को समझने के लिए अपने आस-पास के जैविक और अजैविक घटकों जैसे हवा, पानी, मिट्टी, पेड़-पौधे और जीव-जंतुओं के आपसी संबंधों को जानना बहुत जरूरी है।जैविक घटक में सभी सजीव चीजें शामिल हैं, जैसे पेड़-पौधे, सूक्ष्मजीव, जानवर और मनुष्य।अजैविक घटक में सभी निर्जीव लेकिन जीवन के लिए आवश्यक तत्व आते हैं, जैसे हवा, पानी, मिट्टी, धूप, और तापमान।

पर्यावरण को समझने के लिए पारिस्थितिकी तंत्र को जानना आवश्यक है। यह एक ऐसा प्राकृतिक वातावरण है जहां सभी जीव एक-दूसरे पर और अपने आस-पास के निर्जीव वातावरण पर निर्भर रहते हैं जैसे पौधे धूप और मिट्टी से बढ़ते हैं और जीव-जंतु उन पौधों पर निर्भर रहते हैं।

एक प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र मानव हस्तक्षेप के बिना बनता है।जैसे वन और घास के मैदान, रेगिस्तान और पहाड़, झीलें, नदियां और महासागर आदि। ये पर्यावास अपने आप विकसित होते हैं, और विशिष्ट परिस्थितियों के अनुकूल ढलने वाले विविध जीवों को सहारा देते हैं।पर्यावरण हमारे जीवन-रक्षक तंत्र के रूप में कार्य करता है, जो हमें ऑक्सीजन और स्वच्छ हवा, जल संसाधन,खाद्य आपूर्ति और प्रजातियों के लिए आवास विकसित करता है।जिससे एक स्वस्थ वातावरण और जैव विविधता को बढ़ावा मिलता है, जो पारिस्थितिक संतुलन के लिए आवश्यक है।

प्रारंभिक मानव ने स्वयं को प्रकृति के अनुरूप बना लिया था। उनका जीवन सरल था एवं आस-पास की प्रकृति से उनकी आवश्यकताएं पूरी हो जाती थीं। समय के साथ कई प्रकार की आवश्यकताएं बढ़ीं। मानव ने पर्यावरण के उपयोग और उसमें परिवर्तन करने के कई तरीके सीख लिए। उसने फसल उगाना, पशु पालना एवं स्थायी जीवन जीना सीख लिया। पहिए का आविष्कार हुआ, आवश्यकता से अधिक अन्न उपजाया गया, वस्तु-विनिमय पद्धति का विकास हुआ, व्यापार आरंभ हुआ एवं वाणिज्य का विकास हुआ। औद्योगिक क्रांति से बड़े पैमाने पर उत्पादन प्रारंभ हो गया। परिवहन तेज गति से प्रारंभ हुआ। सूचना क्रांति से पूरे विश्व में संचार सहज और द्रुत हो गया है।प्रकृति एवं मानवीय पर्यावरण के बीच सही संतुलन होना आवश्यक है। मानव को पर्यावरण के साथ समरसता से रहने एवं उसका उपयोग सीखना चाहिए। इन तत्वों के सामंजस्यपूर्ण ढंग से कार्य किए बिना, पृथ्वी पर जीवन खतरे में पड़ जाएगा, जो हमारे पर्यावरण को बचाने की आवश्यकता को रेखांकित करता है।

पर्यावरण केवल वैज्ञानिक या तकनीकी मुद्दा नहीं है, बल्कि यह लोकतांत्रिक अधिकारों से जुङा हुआ है।जबकि केंद्रीकृत और कॉर्पोरेट-प्रधान विकास मॉडल पारिस्थितिक असंतुलन और सामाजिक असमानता को बढ़ाता है। यूँ तो विकास प्रकृति का स्वाभाविक नियम है, लेकिन यहां हम विकास के पीछे छिपी पूंजीवादी ताकतों के एजेंडे की बात कर रहे हैं। पूंजीवादी प्रणाली में उत्पादन और वितरण सामाजिक समानता, न्याय और पर्यावरण की सुरक्षा की बजाय निजी मुनाफे से संचालित होती है। प्राकृतिक संसाधनों के दोहन और विनाश पर अधारित विकास के कारण उन समुदायों को विस्थापित होना पङता है जो इन संसाधनों पर निर्भर हैं। अधिकांश जैव विविधता का प्रबंधन स्वदेशी लोगों और स्थानीय समुदायों द्वारा किया जाता है, यही कारण है कि यह सुनिश्चित करना अत्यंत महत्वपूर्ण है कि प्रकृति की रक्षा और पुनर्स्थापना को उचित स्थान मिले।आज भारत में विकास, जलवायु संकट और प्राकृतिक आपदाओं के चौराहे पर खड़ा है, इसलिए प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व ही टिकाऊ भविष्य का एकमात्र रास्ता है।आज आदिवासियों की बदहाली के मूल में तथाकथित विकास की अवधारणा है। विकास की अंधी दौड़ में उन्हें जबरन घसीटकर इस बदहाली तक पहुंचा दिया गया है। अब और विकास हुआ तो शायद वे खत्म ही हो जायेंगे। पूंजी और मुनाफे से दूर उनका जीवन दर्शन जल, जंगल, जमीन के प्रति हमेशा संवेदनशील रहा है। उनके अस्तित्व का संकट, दुनिया का संकट है और उनको बचाने का मतलब है, दुनिया को भी बचाए रखना है।

जीवन का मूल आधार, हवा, पानी और मिट्टी गहरे संकट में है, और यह स्थिति आगे और बदतर होगी। करोड़ों लोगों को बढ़ती असुरक्षा, फसल नुकसान, भीषण गर्मी, जल संकट, प्रदूषण, कुपोषण, बेरोजगारी तथा अलगाव और जीवन के अर्थ खोने जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ेगा।

कृषि ‘ग्रीनहाउस गैसों’ का एक प्रमुख स्रोत है जिससे भविष्य में खाद्य-सुरक्षा के लिए चुनौती उत्पन्न होने की संभावना है। जल के बढ़ते उपयोग और सूखे के कारण उत्पादन के लिए पानी की कमी हो सकती है। कृषि में कीटनाशकों के प्रयोग से भूजल और पर्यावरण में जहर घुल रहा है।’प्राकृतिक’ और ‘जैविक खेती’ ऐसी कृषि पद्धति है जो पर्यावरण को नुकसान पहुंचाए बिना उत्पादन बढ़ा सकती है। ‘प्राकृतिक खेती’ से कार्बन उत्सर्जन में 35% से 50% तक की कमी आ सकती है।

दूसरी ओर ईंधन का जलना (जैसे कोयला, तेल, और गैस), वनों की कटाई, और औद्योगिक प्रक्रियाएं, ये सभी ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन के प्रमुख स्रोत हैं। ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन जलवायु परिवर्तन का एक प्रमुख कारण है, जिसके कारण तापमान में वृद्धि, समुद्र के स्तर में वृद्धि, और चरम मौसमी घटनाओं जैसे प्रभाव होते हैं। तीव्र होती समुद्री ऊष्मा तरंगें मानवजनित जलवायु परिवर्तन की व्यापक और विनाशकारी संकेत हैं। जलवायु परिवर्तन के संकट से निपटने के लिए आर्द्रभूमि (वेटलैंड) हमारा सबसे प्रभावी पारिस्थितिकी तंत्र है। ये कार्बन डाइऑक्साइड अवशोषित कर तापमान कम करने और प्रदूषण घटाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। परन्तु वर्ष 1970 से लेकर अब तक दुनिया की 35 प्रतिशत आर्द्रभूमि विलुप्त हो चुकी है। ‘वेटलैंड इंटरनेशनल’ के अनुसार भारत की करीब 30 प्रतिशत आर्द्रभूमि पिछले तीन दशकों में विलुप्त हो चुकी है।इसी तरह महासागर एक प्रमुख कार्बन सिंक होने के अलावा, महासागर जलवायु नियमन और पोषक चक्रण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह पृथ्वी के वायुमंडलीय ऑक्सीजन का 50% से 85% तक उत्पादन करता है। वैश्विक तापमान वृद्धि के कारण समुद्र का जलस्तर बढ़ रहा है, जिससे तटीय समुदायों और बाढ़ की चपेट में आने वाले शहरों के जीवन और आजीविका को खतरा है।

दूसरी ओर सेंटर फॉर सांइस एण्ड एनवायरनमेंट (सीएसई) दिल्ली के अध्ययन अनुसार 2015-16 सेे 2024-25 केे दौरान भारत मेंं 1.76 लााख हेेक्टेेयर वनभूूमि गैैर-वन कार्यों केे लिए दी गई है। इसमें सेे 97,050 हेेक्टेेयर जमीन पिछलेे पांंच वर्षों (2020-21 सेे 2024-25) में डायवर्ट हुई है जो 2015 सेे 2020 की तुुलना में 23 फीसदी अधिक हैै। 24,347 हेेक्टेेयर वन भूमि मध्यप्रदेेश में डायवर्ट किया गया है जो

पिछलेे पांंच वर्षों केे दौरान भारत मेंं गैैर-

वन गतिविधियोंं केे लिए डायवर्ट की गई

कुुल हिस्सा का करीब 25 प्रतिशत है। सीएसई दिल्ली की रिपोर्ट अनुसार 79 लाख लोगोंं की मृृत्युु विश्व में वायुु प्रदूूषण केे कारण हुई है और

20.1 लाख वायुु प्रदूूषण केे कारण मृृत्युु भारत में दर्ज की गई है। हाल केे दशक (2014 सेे 2023) मेंं भारत मेंं परिवेेशीय पीएम 2.5 केे कारण होनेे वाली मृृत्युु मेंं 61.08 प्रतिशत की वृृद्धि हुई हैै। भारत का औसत तापमान पिछले एक दशक (2015–2024) में लगभग 0.9°C बढ़ गया है, जो 20वीं सदी की शुरुआत (1901–1930) की तुलना में अधिक है। इसके अतिरिक्त, पश्चिमी और पूर्वोत्तर भारत में वर्ष के सबसे गर्म दिन का तापमान 1950 के दशक से अब तक 1.5 से 2°C तक बढ़ चुका है। आधुनिक विकास के नाम पर जिन ‘भस्मासुरों’ को बनाया, बढ़ाया जा रहा है, प्लास्टिक उनमें से एक है।

कुल-जमा सौ-सवा सौ साल पहले ईजाद किया गया यह कारनामा आज प्रकृति-पर्यावरण और इंसानों के अस्तित्व के लिए संकट बन गया है। मनुष्य अपनी सुविधाओं और भौतिक इच्छाओं की पूर्ति के लिए जंगल काटता है, खनिजों का अत्यधिक दोहन करता है, नदियों को प्रदूषित करता है। विश्व की आर्थिक तरक्की ने पिछले 50 से 70 वर्षों में उत्पादन, व्यापार, और तकनीकी विकास को तेज़ किया है। लेकिन इस तरक्की की पर्यावरणीय कीमत भारी है।

भारत में प्राकृतिक संसाधनों की बर्बादी केवल पर्यावरणीय समस्या नहीं है, बल्कि यह एक गहरी आजीविका और सामाजिक न्याय की समस्या है। गरीब और निर्भर समुदायों के लिए भूमि, जल और वन केवल संसाधन नहीं, बल्कि जीवन की बुनियाद हैं। जब ये संसाधन अनियंत्रित रूप से नष्ट या निजी हितों के लिए उपयोग किए जाते हैं, तो सबसे पहले और सबसे ज्यादा नुकसान उन्हीं लोगों को होता है जिनकी आवाज सबसे कमजोर होती है। इसलिए प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण वास्तव में गरीबी उन्मूलन और सामाजिक न्याय की भी शर्त है।

 

राज कुमार सिन्हा

बरगी बांध विस्थापित एवं प्रभावित संघ

सादर प्रकाशनार्थ