
Delhi Restaurant Fire Accident: देश के हर शहर में हैं मालवीय नगर
राकेश अचल का कॉलम
भारत में नगर नियोजन की लचर नीति के कारण दिल्ली के मालवीय नगर का अग्निकांड हुआ ये शायद ही कोई माने. लेकिन हकीकत यही है कि देश भर मे, हर शहर में सरकार की अनदेखी से असंख्य मालवीय नगर बन गए हैं.
दिल्ली के मालवीय नगर के जिस होटल में अग्निकांड में दो दर्जन देशी-विदेशी मारे गए, वो जगह पूरी तरह आवासीय होने के बाद व्यावसायिक क्षेत्र में बदल गया है. नामी अस्पताल करीब होने की वजह से हर घर में होटल. रेस्टोरेंट या पैथलैब खुल गई हैं. आखिर कैसे? किसने इसकी इजाजत दी? नहीं दी तो लेंडयूज बदला कैसे? अगर इन चंद सवालों के जबाब यदि कोई दे दे तो अग्निकांड के लिए जो भी जिम्मेदार है सामने आ जाएगा.
बिहार के मुजफ्फरपुर में शहर के सबसे बड़े अस्पताल प्रसाद हॉस्पिटल के आईसीयू वार्ड में गुरुवार सुबह आग लग गई, इसमें भर्ती कई लोगों की मौत होने की आशंका है। तीन मरीज के शव अस्पताल में मिलने से उनकी मौत की पुष्टि हो गई है. ऐसे हादसे देश के अलग-अलग हिस्सों में आए दिन हो रहे हैं लेकिन समस्या की असली जड खोजनने की फुर्सत किसी के पास नहीं है, .
देश की सरकार सर्वे करा ले कि हर शहर में किसी सरकारी अथवा निजी अस्पताल के आसपास की रहवासी बस्तियों में रातों रात होटल, गेस्ट हाउस, रेस्टोरेंट, पैथलेब और अस्पताल कैसे खुल गए? जिन भूखंडों पर एक मंजिल मकान और एक परिवार के इस्तेमाल की पेयजल, सीवेज की सुविधाएं थीं, वहाँ बहुमंजिला भवन कैसे बन गए? सबका उत्तर एक है कि आदमी के लालच और भ्रष्ट सिस्टम ने हर शहर में दिल्ली के मालवीय नगर जैसे मौत के नगर बसा दिए हैं.
मैं अपने शहर ग्वालियर में देखता हूँ तो पाता हूँ कि पूरी की पूरी आवासीय बस्तियां व्यावसायिक केंद्रों में बदल गई हैं. दुर्भाग्य ये कि इन अवैध संस्थानों में खुले होटलों, रेस्टोरेंट, और अस्पतालों का उदघाटन मुख्यमंत्री से लेकर छुटभैये नेता रोज करते हैं ग्वालियर की ललितपुर कालोनी, गीता कालोनी, खेडापति कालोनी, बसंत विहार, विकास नगर, जवाहर कालोनी एक तरह से दिल्ली के मालवीय नगर ही हैं.
पैसों के लालच में स्थानीय निकाय आंख बंद कर निर्माण की इजाज़त दे रहे हैं. कोई सुरक्षा प्रबंधों की जांच नहीं करना चाहता. लेकिन जब कोई बडा हादसा हो जाता है तो सब भागदौड करते दिखाई देते हैं. सवाल ये है कि आवासीय उपयोग के भवनों को आखिर व्यावसायिक इस्तेमाल के लिए क्यों बदला जा रहा है?
भारत में सरकारी अस्पताल लगभग 26,000 और निजी अस्पताल लगभग 44,000 हैं. ये आंकडे भी आधे अधूरे हैं भारत में कितने होटल, गेस्ट हाऊस और रेस्टोरेंट हैं ये भी कोई नहीं जानता, क्योंकि हमारे यहाँ किसी भी स्तर पर इन चीजों का आधिकारिक रिकार्ड रखा ही नहीं जाता.
दर असल ये मालवीय नगर संस्कृति एक भयानक राष्ट्रीय समस्या है. जैसे शहरों, कस्बों मे संचालित होने वाली दूध डेयरी और उनमें रहने वाले पशु,उनका गोबर ट्रैफिक और सीवेज सिस्टम को पंगु बना देती हैं ठीक उसी तरह अस्पताल, पैथोलॉजी, रेस्टोरेंट, होटल, गेस्टहाउस भी नागरिक सुरक्षा के साथ सीवेज, सडक और यातायात में बाधक हैं. इन्हें तत्काल बंद किया जाना चाहिए. लेकिन किसी सरकार में ऐसा साहस नहीं. न दिल्ली सरकार में, न राज्य सरकारों में.
सरकारें हादसों के बाद राहतें तो बांट सकती हैं लेकिन उन्हे रोकने के स्थाई इंतजाम नहीं कर सकती. सरकारों को वोट का लालच है. ग्वालियर जैसा महानगर आज भी सडकों पर विचरण करती भैंसों की वजह से गांव ही लगता है. मप्र सरकार भैंस डेयरियों को शहर से बाहर खदेडने में नाकाम साबित हुई है. ग्वाला नगर बसाने की योजनाएं फाइलों में ही दम तोड चुकी हैं. कोई उन्हे अमल में नहीं ला सका.इसलिए हत्यारे हम सब हैं सिस्टम के साथ -साथ.





