काशी की गलियों से बुंदेलखंड के जंगलों तक: चीता प्रोजेक्ट से जुड़ी अनोखी कहानी, बच्चों को मिल रहीं चीता-फेस पेंसिलें

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काशी की गलियों से बुंदेलखंड के जंगलों तक: चीता प्रोजेक्ट से जुड़ी अनोखी कहानी, बच्चों को मिल रहीं चीता-फेस पेंसिलें

भोपाल : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 17 सितंबर 2022 को मध्य प्रदेश के कुनो नेशनल पार्क में नामीबिया से लाए गए आठ चीतों को छोड़कर भारत में चीता पुनर्स्थापन परियोजना की शुरुआत की थी। करीब चार साल बाद यह महत्वाकांक्षी परियोजना अब एक नए पड़ाव की ओर बढ़ रही है। मध्य प्रदेश का सबसे बड़ा टाइगर रिजर्व वीरांगना दुर्गावती टाइगर रिजर्व (वीडीटीआर) जल्द ही देश का पहला टाइगर रिजर्व बनने जा रहा है, जहां चीतों को बसाया जाएगा।

लेकिन चीतों के आने से पहले ही एक दिलचस्प रिश्ता बन चुका है। यह रिश्ता है प्रधानमंत्री मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी (काशी) और बुंदेलखंड के जंगलों के बीच।

काशी की संकरी गलियों में लकड़ी के खिलौने बनाने वाले कारीगर इन दिनों चीता-थीम वाली रंग-बिरंगी पेंसिलें तैयार कर रहे हैं। ये पेंसिलें वीरांगना दुर्गावती टाइगर रिजर्व के कोर और बफर क्षेत्र के गांवों में रहने वाले बच्चों तक पहुंच रही हैं, ताकि वे चीतों के आगमन से पहले इस दुर्लभ वन्यजीव को समझ सकें।

31 मई से रिजर्व प्रबंधन द्वारा गांव-गांव में ‘चीता चौपाल’ आयोजित की जा रही हैं। इन चौपालों में बच्चों को चीते के जीवन, उसकी आदतों और पर्यावरण में उसकी भूमिका के बारे में जानकारी दी जा रही है। अब तक 10 से अधिक गांवों में 1,000 से 1,500 बच्चों तक यह अभियान पहुंच चुका है।

बच्चों को उपहार के रूप में दो चीजें सबसे ज्यादा आकर्षित कर रही हैं—काशी के कारीगरों द्वारा बनाई गई चीता-फेस पेंसिलें और भोपाल से मंगाए गए चीता फेस मास्क।

वीडीटीआर के डीएफओ रजनीश कुमार सिंह बताते हैं कि इन चौपालों का उद्देश्य बच्चों और ग्रामीणों के मन में चीतों को लेकर मौजूद आशंकाओं को दूर करना है। शाम 7 से 9 बजे तक चलने वाले कार्यक्रमों में डॉक्यूमेंट्री, चित्रों और संवाद के जरिए बताया जाता है कि चीते इंसानों के लिए खतरा नहीं हैं, बल्कि पर्यावरण संतुलन के लिए महत्वपूर्ण हैं।

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वाराणसी के भुल्लनपुर क्षेत्र के दूसरी पीढ़ी के खिलौना उद्यमी सुनील विश्वकर्मा की टीम इन खास पेंसिलों को तैयार कर रही है। सुनील बताते हैं कि मध्य प्रदेश के जंगलों से उनका जुड़ाव नया नहीं है। इससे पहले पेंच टाइगर रिजर्व के लिए भी उनकी टीम बाघ की आकृति वाली लकड़ी की पेंसिलें और अन्य शिल्प उत्पाद बना चुकी है।

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उनका कहना है, “हमें गर्व है कि काशी के कारीगर अब प्रधानमंत्री मोदी की महत्वाकांक्षी चीता परियोजना से जुड़े हैं।”

चौपालों में बच्चों को यह भी समझाया जा रहा है कि चीतों के आने से क्षेत्र में पर्यटन बढ़ेगा, जिससे स्थानीय लोगों की आय में वृद्धि होगी। साथ ही चीते नीलगाय जैसे फसलों को नुकसान पहुंचाने वाले जानवरों की संख्या नियंत्रित करने में मदद करेंगे, जिससे किसानों को लाभ होगा।

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बच्चों को बाघ, तेंदुआ, भेड़िया और अन्य वन्यजीवों के बारे में भी जानकारी दी जा रही है। साथ ही वीरांगना रानी दुर्गावती के शौर्य की कहानियां सुनाकर स्थानीय विरासत से भी जोड़ा जा रहा है।

सूत्रों के अनुसार, वीरांगना दुर्गावती टाइगर रिजर्व में चीतों के लिए बनाई जा रही अधोसंरचना का लगभग 80 प्रतिशत काम पूरा हो चुका है। नौरादेही वन्यजीव अभयारण्य के मोहली रेंज में पांच बड़े उप-बाड़ों वाला सॉफ्ट रिलीज बोमा अंतिम चरण में है।

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हालांकि अभी यह तय नहीं हुआ है कि कुनो से चीतों को कब यहां लाया जाएगा, लेकिन उनके आने के बाद पहली बार किसी बड़े परिदृश्य में चीते और बाघ एक साथ सह-शिकारी (को-प्रिडेटर) के रूप में रहेंगे।

चीतों के आने में भले अभी कुछ समय बाकी हो, लेकिन बुंदेलखंड के गांवों के बच्चे पहले ही इस नए मेहमान के स्वागत की तैयारी में जुट चुके हैं। और इस स्वागत में काशी की गलियों से निकली छोटी-सी चीता पेंसिलें बड़ी भूमिका निभा रही हैं।