
रविवारीय गपशप : सुंदरकांड के पाठ ने ऐसे सुलझाई लाउडस्पीकर समस्या
आनंद शर्मा
सरकारी संस्थानों की लोकेशन शानदार होती है , चाहे रखरखाव भले थोड़ा कमजोर हो । आप पाएंगे कि सरकारी गेस्ट हाउस और होटलें हमेशा ऐसे स्थान पर होती हैं जो शहर में सबसे लाजवाब होते हैं । उदाहरण के लिये भोपाल के अशोक लेक व्यू को याद करें , सागर के सर्किट हाउस का ध्यान करें , नीमच के सीआरपी गेस्ट हाउस का ध्यान करें , और ऐसी अनेक बेशुमार जगहें हैं , जहाँ आप ठहर कर हमेशा उसे याद रखते हो । इसलिए प्राइवेट कालोनियों में चाहे जितना पॉम्प एंड शो हो , सरकारी सिविल लाइन्स के मुक़ाबले वे कहीं नहीं लगतीं । यही वजह है कि सरकारी कॉलोनियों के मकानों के लिए हमेशा लाइन लगी रहती है पर हर कोई इनमें रहने का सुख हासिल नहीं कर पाता है । ख़ुशक़िस्मती से मुझे पोस्टिंग में सरकारी आवास मिलने में कभी परेशानी नहीं हुई ।
आज सरकारी मकानों से जुड़ा एक दिलचस्प किस्सा आपको सुनाता हूँ । मेरी पोस्टिंग जब इंदौर में संभाग के अपर आयुक्त के पद पर हुई तो मुझे रेडियो कॉलोनी में बँगला नम्बर बी 1 आबंटित हुआ । इंदौर में सिविल लाइंस को रेडियो कॉलोनी के नाम से जाना जाता है और इसका कारण है कि सिविल लाइंस के ये सारे सरकारी आवास आकाशवाणी के पास बने हुए हैं , तो रेडियो स्टेशन के पास बने होने से ये जगह रेडियो कॉलोनी के नाम से जानी जाती है । जाने क्यों कमिश्नर बँगले का नम्बर भी बी 1 ही हुआ करता था , तो कई बार डाक इस पते की वजह से इधर उधर भी हो जाया करतीं थी , पर नाम अलग थे तो जल्द ही मामला सुलझ भी जाता । मेरे बी 1 बंगले के ठीक सामने एक स्कूल था , इसकी वजह से सुबह सुबह कुछ शोर शराबा भी हुआ करता था ।
एक दिन मैं सुबह बँगले से बाहर निकला ही था कि मैंने देखा उस दिन कुछ कुछ ज़्यादा ही गहमा गहमी थी , तो मेरे मुँह से निकला गया “ यार बड़ा व्यवधान रहता है इससे “ । मेरा ड्राइवर जो पास ही खड़ा सुन रहा था कहने लगा अरे साहब ये तो अब कुछ भी नहीं है , पहले तो ये सुबह से स्कूल की प्रार्थनाएँ भी लाउडस्पीकर पर करते थे , और स्पीकर की आवाज का निशाना सीधे बाहर बँगले की ओर रहा करता लिहाज़ा उसकी आवाज़ से बड़ा व्यवधान हुआ करता था ।
आपके पहले वाले अपर आयुक्त सिंह साहब इसी बँगले में रहा करते थे । रोज़ रोज़ की परेशानी से तंग आकर उन्होंने स्कूल वालों से इस बाबत शिकायत भी की , पर उन्हें कोई असर ही नहीं हुआ । आख़िर इन स्कूल वालों को सबक सिखाने के लिए उन्होंने एक अनोखा उपाय किया । अगले हफ़्ते मंगलवार के दिन स्कूल लगने के समय सिंह साहब ने घर पर सुंदर काण्ड का पाठ रखवा लिया , और पाठ करने का इंतिज़ाम भी लाउडस्पीकर पर रखवाया । और तो और लाउडपीकर के चोंगे के मुँह स्कूल की ओर रखे गये ।
थोड़े ही देर में स्कूल वाले बंगले के दरवाज़े पर आकर खड़े हो गये । सिंह साहब जानबूझकर बड़ी देर से बँगले के दरवाज़े पर आए और उनको बाक़ायदा बंगला ऑफिस में बिठा कर पूछा , क्या बता है ? आप सब एक साथ मिलकर आए हैं । स्कूल के प्रिंसिपल साहब बोले “ सर इतनी ज़ोर ज़ोर से लाउडस्पीकर की आवाज स्कूल में आयेगी तो हम बच्चों की पढ़ाई कैसे कराएँगे “? सिंह साहब बोले यही तो मैं आप लोगों को कई दिनों से समझा रहा था , कि सुबह सुबह जब आप स्कूल असेंबली की पूरी कार्यवाही मय प्रार्थना के हमारे बंगले की ओर अपने स्पीकर लगा कर करते हैं तो हमें कैसा लगता होगा ? स्कूल का प्रबंधन बात के मर्म को तुरत समझ गया , और उस दिन के बाद स्कूल के प्रवेश द्वार से लेकर , सारे आयोजनों का स्वरूप बदल गया । अब जब भी स्कूल में कार्यक्रम होते हैं , उनके लाउडस्पीकर के मुख परली तरफ़ होते हैं । मैंने ये सोच कर राहत की साँस ली कि ऐसी सूझबूझ तो कोई प्रशासनिक अधिकारी ही निकाल सकता और उन्हें मन ही मन नमस्कार किया ।





