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प्रो शरद पगारे की आज दूसरी पुण्यतिथि: एक विरले इतिहास लेखक की स्मृति

प्रो शरद पगारे की आज दूसरी पुण्यतिथि: एक विरले इतिहास लेखक की स्मृति

राजगोपाल सिंह वर्मा की विशेष रिपोर्ट 

इतिहास लेखन एक दुधारी तलवार की तरह है। इसमें सतर्कता और प्रामाणिकता की ऐसी डगर पर चलकर लक्ष्य पर पहुंचना होता है कि एक ओर खाई, दूसरी ओर कुआँ। पर आपने यदि निष्पक्ष लेखकीय प्रतिबद्धता पर चलते हुए इसे निष्कंटक पार कर लिया तो आप एक न एक दिन इस विधा में मानक बनाने में सफल अवश्य होंगे।

इतिहास लेखन में ऐसे मानक देश में कम ही लोग बना पाए हैं। इंदौर को कर्मस्थली बनाकर रहे प्रोफेसर शरद पगारे स्वयं को अमृतलाल नागर और वृंदावनलाल वर्मा की परंपरा का वाहक मानते थे, पर एक ईमानदार मूल्यांकन किया जाए तो वास्तव में वे इन लेखकों से भी आगे और इतिहासलेखन में उच्चतम स्तर पर पहुंचे लेखक थे।

अब से दो वर्ष पूर्व, 28 जून 2024 को वे महाप्रयाण पर निकल गए थे। तब उनकी आयु 93 वर्ष थी। वे उस समय भी रचनाकर्म में लीन थे। उन्होंने इतिहास, समाज और मनुष्य की आंतरिक त्रासदियों को एक साथ कथानक में ढालने की दुर्लभ क्षमता विकसित की। इसलिए उनका साहित्य इतिहास की विस्मृत कहानियाँ कहने का माध्यम होने के साथ एक वैचारिक हस्तक्षेप भी बना।

5 जुलाई 1931 को खंडवा, मध्य प्रदेश में जन्मे शरद पगारे ने इतिहास विषय में एम ए, पीएचडी की। मध्य प्रदेश के उच्च शिक्षा विभाग और विदेशी विश्वविद्यालयों में इतिहास के प्रोफेसर के रूप में कई दशकों तक अध्यापन, शोध के साथ ही ऐतिहासिक एवं साहित्यिक कथाओं व उपन्यासों का नियमित लेखन किया। यह अद्भुत था कि बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में लेखन को माध्यम बनाकर उभरते हुए युवा शरद पगारे ने इक्कीसवीं शताब्दी तक अपनी रचनात्मकता को निरंतर बनाए रखा। उनका लेखन दर्शाता है कि साहित्य समय का दस्तावेज़ होने के साथ उसे समझने और संवाद करने का साधन भी है। उनका कथा-साहित्य जीवंत मानवीय अनुभवों के माध्यम से व्यक्त इतिहास का पुनर्पाठ है जिसे वे वर्तमान के साथ सहजता से जोड़ते हैं। उन्होंने इतिहास को घटनाओं में छिपे मानवीय भावों, संघर्षों और विडंबनाओं के रूप में देखा। यही कारण है कि उनके कथानक पाठकों के लिए ज्ञान और संवेदना का भी माध्यम बनते हैं।

उनके रचनाकर्म में एक स्पष्ट विकासक्रम दिखाई देता है। प्रारम्भिक चरण में उनका लेखन ऐतिहासिक प्रेमकथाओं और इतिहास में अनदेखी घटनाओं के पुनर्सृजन पर केंद्रित रहा। उन्होंने मुगल बादशाह शाहजहाँ की प्रेमिका “गुलारा बेगम” और औरंगजेब की अल्पचर्चित प्रेमिका “बेगम जैनाबादी”; जैसी कृतियों को सामने लाने का उपक्रम किया, जिन पर इतिहास में दो-चार पृष्ठों की सामग्री भी उपलब्ध नहीं है।

इसके बाद उनका लेखन अधिक गहरे ऐतिहासिक विश्लेषण की ओर बढ़ता है, जिसका चरम “पाटलिपुत्र की साम्राज्ञी” में दिखाई देता है। इसकी नायिका थी वह स्त्री जिसने वास्तविक जीवन में पृष्ठभूमि में रहकर महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। वह अशोक महान की माँ धर्मा थी, एक निर्धन दरिद्र ब्राह्मण की अपूर्व, अद्वितीय एवं अनिंद्य सुन्दरी बेटी। बचपन से ही अपनी माँ से प्रियदर्शी पुत्र अशोक को जो शिक्षा मिली उसी के कारण कालान्तर में वह अपनी लोक-कल्याणकारी नीतियों के कारण ‘देवनाम प्रिय’, ‘प्रियदर्शी’ बन सका। इतिहास इस रूपसी धर्मा के अवदान के बारे में चुप है। उसे व्यक्तित्व प्रदान करने का प्रयत्न ऐतिहासिक उपन्यासकार शरद पगारे की कलम ने किया है। यहाँ इतिहास, राजनीति और संस्कृति का एक सुंदर समेकित चित्रण मिलता है।

इसके समानांतर “गन्धर्वसेन” जैसी कृतियाँ प्राचीन इतिहास की पुनर्व्याख्या प्रस्तुत करती हैं। “उजाले की तलाश” जैसी रचनाओं में वे समकालीन सामाजिक यथार्थ की ओर भी मुड़ते हैं, जिससे उनका लेखन इतिहास से वर्तमान तक एक सतत संवाद स्थापित करता रहा है। इस प्रकार उनका उपन्यास-साहित्य सृजन एक क्रमिक वैचारिक यात्रा है, जिसमें इतिहास, प्रेम, समाज और मनोविज्ञान विस्तार पाते हैं।

साहित्य के प्रतिष्ठित ‘व्यास सम्मान’ के साथ अनेक राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित प्रोफेसर शरद पगारे के कथा-साहित्य में प्रेम, पीड़ा और विछोह का गहन स्वर बार-बार उभरता है। उनके अधिकांश पात्र सामाजिक और ऐतिहासिक परिस्थितियों के दुःख, निराशा या अस्तित्वगत संघर्ष के द्वन्द्व को जीते दिखते हैं। इन पात्रों के माध्यम से हमें समझ आता है कि इतिहास मात्र राजाओं और युद्धों का नहीं, वह सामान्य मनुष्यों के जीवन के इर्द-गिर्द भी घटित होता है। प्रामाणिकता उनकी लेखन शैली का एक महत्वपूर्ण पक्ष है। उन्होंने लेखन में ऐतिहासिक तथ्यों के साथ समझौता नहीं किया, व्यापक अध्ययन के आधार पर अपने कथानकों को गढ़ा और फिर उनमें कल्पना का ऐसा संयोजन किया कि वे तथ्य और कल्पना के बीच संतुलन बनाए रख सकें। यह संतुलन ही उनके साहित्य को विश्वसनीय बनाता है। उन्होंने दिखाया कि कल्पना का उपयोग इतिहास को तोड़ने के लिए नहीं, बल्कि उसे जीवंत बनाने के लिए किया जाना चाहिए। कल्पना उनके लिए एक उपकरण थी, जिसके माध्यम से वे इतिहास के भीतर छिपे मानवीय पक्ष को उजागर करते थे।

उनके साहित्य का एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू सामाजिक यथार्थ के लिए प्रतिबद्धता रही। उन्होंने सामाजिक विसंगतियों, कुरीतियों और मानसिक संघर्षों को भी कथानकों में यथोचित स्थान दिया। उनकी भाषा और शैली उल्लेखनीय हैं, जिनमें सरल, सुबोध और प्रभावशाली भाषा का प्रयोग हुआ है। इस भाषा में स्थानीयता और देशज शब्दों का स्पर्श भी है, जिससे उनके पात्र जीवंत हो उठते हैं। यह शैली पाठकों को सीधे कथा के भीतर ले जाती है। उनकी अभिव्यक्ति में न तो अनावश्यक अलंकरण है और न ही जटिलता, बल्कि एक सहज प्रवाह है, जो पाठक को बाँधे रखता है।

प्रो पगारे के कथा-साहित्य के व्यापक मूल्यांकन से समझा जा सकता है कि उन्होंने हिंदी साहित्य को एक नया दृष्टिकोण दिया और स्थापित किया कि इतिहास और साहित्य का संबंध वैचारिक है। उनके लिए इतिहास एक ऐसी जीवंत प्रक्रिया थी, जिसे साहित्य के माध्यम से समझा और प्रस्तुत किया जा सकता है, जहाँ अतीत की झाँकी रोमांचक कथा के साथ वर्तमान को समझने का आधार बनती है। इस दृष्टि से उनका साहित्य समय के तीनों आयामों; अतीत, वर्तमान और भविष्य को जोड़ता है। वह एक क्रमिक वैचारिक यात्रा है, जिसमें इतिहास, प्रेम, समाज और मनोविज्ञान क्रमशः विस्तार पाते हैं। उनके कृतित्व की तुलना अँग्रेजी साहित्य के लेखक सर वाल्टर स्कॉट, कन्नड के के वी अय्यर, सुब्बाराव कृष्णा राव, मलयालम साहित्य के सी वी रमन पिल्ले, तमिल के आर कृष्णामूर्ति, गुजराती के के एम मुंशी, बंगला के बंकिम चंद्र की श्रेष्ठ कृतियों से उचित ही की जाती है।

उनकी दूसरी पुण्यतिथि पर यह विचार करना समीचीन है कि आज के साहित्यिक परिदृश्य में उनकी प्रासंगिकता किन कारणों से बनी हुई है? आज जब साहित्य में तात्कालिकता और त्वरित अभिव्यक्ति का दबाव बढ़ रहा है, तब शरद पगारे का साहित्य हमें धैर्य, गहराई और अध्ययन की महत्ता का स्मरण कराता है। उनका लेखन हमें सिखाता है कि गंभीर साहित्य सृजन के लिए निरंतर अध्ययन और चिंतन आवश्यक है। उनके द्वारा निर्मित कथानक और शैली आज भी अनूठे हैं और हमारी प्रेरणा का स्रोत हैं।

पगारे जी की अनुपस्थिति के दो वर्ष पूरे होने पर यह आत्ममंथन का समय है। हमें उनके द्वारा स्थापित साहित्यिक मूल्यों को आगे बढ़ाना होगा। उनकी स्मृति में सबसे बड़ा सम्मान यही होगा कि हम उनके साहित्य को पढ़ें, समझें और उस पर संवाद करें। क्योंकि किसी भी लेखक की वास्तविक विरासत उसकी रचनाएँ होती हैं, और जब तक वे पढ़ी जाती हैं, वह लेखक जीवित रहता है। शरद पगारे आज हमारे बीच नहीं हैं, पर उनका साहित्य आज भी हमारे साथ है। वह हमें सोचने का अवसर देता है, प्रश्न उठाने के लिए प्रेरित करता है और सबसे महत्वपूर्ण; हमें मनुष्य बने रहने की याद दिलाता है। यही उनकी उपलब्धि है, और यही उनकी अमरता का आधार भी।