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कविता :”आज की रात”

“आज की रात”

काश कि आज की रात
इज़राइल से छोड़े गए रॉकेट और मिसाइल
बदल जाएं फायर क्रैकर्स में

गाजा पट्टी के तमाम बच्चे, बूढ़े, जवान
उल्लास से भर निकल आएं
सड़कों पर उन्हें देखने के लिए

किसी ड्रोन शो की तरह
वो आसमान में लिख दे हैप्पी न्यू ईयर
और आसमान में ही बुझ जाएं
आज की रात न ढहाए और स्कूल अस्पताल
अब और न हो गाजा पट्टी का बुरा हाल

आज की रात नेतन्याहू
डूब जाए पश्चाताप के आंसुओं में
और सीज़फ़ायर की तख्ती उठाए
निकल पड़े इज़राइल की सड़कों पर
मुझे माफ़ करो चिल्लाते हुए

काश कि आज की रात से
हमास के सभी मिलिटेंट
रंग जाएं कबीर के रंग में हमेशा के लिए

झूम कर गाते हुए
कबीरा खड़ा बाजार में मांगे सबकी खैर
हाथों में थामे संगीनों की जगह गिटार
किसी कंसर्ट में थिरकते मिले उनके पैर

काश कि
नए साल में प्रवेश करती आज की रात
न रह जाए किसी के लिए भी काली

ठंड से न मरे कोई भिखारी
आज की रात
रोटी से भरी हो हर थाली
आज की रात
नशे में न चढ़ाए कोई अमीरजादा
फुटपाथ पर गाड़ी
आज की रात

और हां
आज की रात
अजमेर से संकमोचन को साथ ले
लुटियंस जोन की किसी इमारत के नीचे
जा बसे संभल के कल्कि हरिहर वाले
और सुबह सुबह इसकी खबर दे
कोई पहुंचा हुआ पुजारी

काश कि आज की रात
कबूल हो जाएं
नए साल के लिए मांगी ये दुआएं सारी
काश कि आज की रात….

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 इरानाथ

लखनऊ