
Upcoming Book Discussion: “पिता मेरे” जज़्बातों की नदी में बहती वालिद की यादों की दास्तान, स्वाति तिवारी के ख़्वाब की ताबीर
आरिफ मिर्जा

कहते हैं कि हर ख़ानदान की बुनियाद में माँ-बाप की दुआएं और उनकी कुर्बानियां छुपी होती हैं। माँ की मोहब्बत पर तो बहुत कुछ लिखा गया, मगर वालिद की ख़ामोश मेहनत, उनकी जद्दोजहद और औलाद की परवरिश में उनके किरदार का ज़िक्र अक्सर पीछे रह जाता है। वालिद वो साया होते हैं जो खुद धूप में खड़े रहकर अपनी औलाद को ठंडी छांव देते हैं। मशहूर अदीबा (साहित्यकार) और अफसानानिगार डॉ. स्वाति तिवारी ने इसी एहसास को आवाज़ दी। स्वाति जी हिंदी अदब का जाना माना नाम हैं। उनकी कलम में रिश्तों की गर्माहट, ज़िंदगी की सच्चाइयों और इंसानी जज़्बातों की गहरी समझ नज़र आती है। उन्होंने हमेशा अपने लिखे से समाज और रिश्तों के उन पहलुओं को सामने रखा है, जो दिल को छू जाते हैं। इसी संवेदनशील दिल में एक दिन ख़याल आया कि क्यों न लोगों से उनके वालिद की यादें लिखवाई जाएं वो यादें जिनमें एक दौर की कहानी भी होगी और एक रिश्ते की मिठास भी। इसी ख़याल से शुरू हुआ सिलसिला “पिता मेरे” का।

स्वाति तिवारी और उनके हमसफ़र वरिष्ठ सहाफी और साबिक डायरेक्टर जनसंपर्क सुरेश तिवारी के न्यूज़ पोर्टल मीडियावाला पर शुरू हुई इस श्रृंखला में मुल्क के मुख़्तलिफ़ शोबों से जुड़े लोगों ने अपने वालिद को याद किया। डॉक्टर, जज, साहित्यकार, पत्रकार और अफसर सभी ने अपने-अपने दिल के पन्नों पर अपने वालिद की यादें दर्ज कीं। अपने वालिद को याद करते हुए औलादों ने जज़्बातों की ऐसी नदी बहा दी कि ये सिलसिला एक यादगार किताब की शक्ल में सामने आ गया। इस किताब को नाम मिला ‘पिता मेरे’। ये पहली बार है जब 70 से ज़्यादा हस्तियों ने अपने वालिद की अज़मत बयां की। लिहाज़ा ‘पिता मेरे’ किताब के एक साथ दो खंड शाया हो रहे हैं। ‘पिता मेरे’ सिर्फ़ वालिदों की तारीफ़ नहीं, बल्कि उस दौर की तस्वीर है जब कम साधनों में भी वालिद अपनी औलाद के बेहतर कल के लिए पूरी ज़िंदगी लगा देते थे। अब यही यादों का ख़ज़ाना दो जिल्दों की किताब बनकर सामने आ रहा है। पुस्तकनामा प्रकाशन ने इसे शाया किया है और जल्द ही इंदौर में इसका शानदार इजरा (विमोचन) होने जा रहा है।

इस किताब में कई बड़ी हस्तियों ने अपने वालिद को याद किया है। मसलन पद्मविभूषण पंडित सूर्यनारायण व्यास पर उनके बेटे वरिष्ठ पत्रकार राजशेखर व्यास ने लिखा है। मशहूर कवि चंद्रकांत देवताले को उनकी बेटी ने अपनी यादों में उतारा है। डॉ. शरद पगारे पर भी उनके परिवार की तरफ़ से उनके बेटे सुशीम पगारे का दिल को छू लेने वाला संस्मरण शामिल है। इसी तरह कथाकार मन्नू भंडारी की यादों को उनकी करीबी दोस्त सुधा अरोड़ा ने सामने रखा है। समकालीन कथा-लेखन में एक विशिष्ट और अलग पहचान रखनेवाली आधुनिक उपन्यासकार और कहानीकार सूर्यबाला,सुधा अरोरा, मधु कांकरिया, सुषमा मुनीन्द्र, संतोष श्रीवास्तव, व्यंग्यकार हरी जोशी, वैदिक अध्येता मुरलीधर चांदनीवाला, विकास दवे, दिव्या माथुर, अनिल प्रभा, पत्रकार राजशेखर व्यास,वरिष्ठ अधिवक्ता श्री विनय झेलावत , चिकित्सा जगत से डॉ. अपूर्व पौराणिक और डॉ. उल्हास महाजन, सेवा निवृत जिला एवं सत्र न्यायाधीश शशिकांत कुलकर्णी,पूर्व आईएएस राजीव शर्मा, पर्यावरण विशेषज्ञ महेश बंसल ,वरिष्ठ पत्रकार क्रांति चतुर्वेदी ,प्रवीण दुबे, हंस के सम्पादक राजेंद्र यादव पर उनकी बेटी मशहूर कथक नृत्यांगना और कोरियोग्राफर रचना यादव जैसे कई नामों ने इस सिलसिले को अपनी कलम से रोशन किया है। इस किताब में साहित्यकार संतोष चौबे, पत्रकार प्रतीक श्रीवास्तव और इस नाचीज़ यानी आरिफ़ मिर्ज़ा ने भी अपने वालिद की यादों को अल्फ़ाज़ दिए हैं। अमेरिका ,और यूरोप से लेकर झाबुआ के थांदला तक स्वाति तिवारी की ये कोशिश दरअसल वालिदों की यादों की एक ऐसी तीर्थ यात्रा है, जहां हर पढ़ने वाला अपने घर के उस शख्स को महसूस करता है जिसने बिना किसी शिकवे के अपनी औलाद के लिए उम्र गुज़ार दी.




