Betul Collector’s Bungalow: घर की डेहरी से खूब आशीष मिला,इस डेहरी को नमन.

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Betul Collector’s Bungalow: घर की डेहरी से खूब आशीष मिला,इस डेहरी को नमन.

नीलम सिंह सूर्यवंशी
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हर जगह की अपनी तासीर, अपनी तहज़ीब, पहचान होती हैं।ख़ान पान संस्कृति आबो हवा सब कुछ भिन्न होता है। इंदौर के लोगों को जल्दी किसी और जगह मन लगता नहीं है, लेकिन अगर मन लग जाए तो और फिर छोड़ कर जाना बहुत दुखी करता है। पर सरकारी नौकरी है तो यह सब लगा रहता हैं।
लगभग दो साल चार महीने रहने के बाद यहाँ से जाना बहुत मुश्किल हो रहा है।
इतनें समय में मैंने अनगिनत बार इंदौर से बैतूल आना जाना किया , आते जाते समय कई बार यहाँ के जंगलों को करीब से देखा , उनका हर मौसम में मैंने एक अलग रूप देखा ।कभी ठंडों में शीतलता लिए तो कभी बारिश में अद्वितीय हरियाली लिए हुए, तो बसंत में नई कोपल के साथ तो कभी भीषण गर्मी में बस जीवन से संघर्ष करते हुए देखा है।
उसी तरह अनगिनत बार जंगली जीवन को जंगलों में जाकर देखा है, उनका अपने जीवन को बचाने का अपना अलग संघर्ष है, लेकिन प्रकृति के सब एक दूसरे के पूरक है।
फ़ोटो के बारे में कोई जानकारी नहीं दी गई है.
बैतूल के जिस घर में हम अब तक रहते थे, उसका इतिहास बहुत पुराना है। सन् १८२३ से इसके होने के सबूत मिलते हैं क्योंकि यहाँ पर कलेक्टर का निवास हमेशा से रहा होगा।
बैतूल में Captain. R. Low पहले कमिश्नर रहें थे जिनका कार्यकाल ५ मई १८२३ से शुरू हुआ था , और उसके बाद लगातार ९९ अंग्रेज अफ़सर बने। १०० वें नम्बर से भारतीय कलेक्टर बनने लगे थे , पहले भारतीय कमिश्नर K. M. Dastur थे जो २८ जुलाई १९४५ को बने थे, जिसके बाद हम ( नरेंद्र कुमार सूर्यवंशी ) १५५ वें नंबर पर कलेक्टर रहे हैं। मेरा मानना है कि तब से ही इस घर में कमिश्नर,कलेक्टर रहतें रहें होंगे ।
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यह घर सन्१८२३ से पहले का बना हुआ होगा , पर कब बना होगा इसकी कोई जानकारी नहीं है।
यह हवेली नुमा घर है इसकी बाहरी दीवार लगभग दो फिट चौड़ाई लिए हुई है, और लगभग ३० फ़ीट ऊपर इसकी छत है हर और ऊँचे ऊँचे रौशन दान दिए गए हैं, चारों ओर दरवाज़े है बड़ा सा खुला हुआ दालान है जहाँ बैठकर सामने बगीचे की हरियाली दिखाई देती है। यहाँ चारों और ऊँचे ऊँचे पेड़ हैं ।यह लगभग १७ एकड़ में फैला हुआ है और बीच में बँगला बना है।
फ़ोटो के बारे में कोई जानकारी नहीं दी गई है.
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बंगले के भीतर कैंपस एक छोटा सा तालाब है जिसमें हज़ारों मछलियाँ रहती हैं।यहाँ प्रागण में एक हनुमान जी का मंदिर है जो बहुत सुन्दर और चैतन्य है।एक बहुत प्राचीन कुंवा भी है जिसकी मुँडेर गोलाई लिए हुए बहुत मोटी है ,और दिखनें बहुत आकर्षक हैं।
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इस बंगले के बारे में जब जब मैं सोचती हूँ तो लगता है कि यहाँ पर कितना कुछ हुआ होगा जो आज बहुत कुछ इतिहास बन चुका होगा तो ,कुछ इतिहास के पन्नों में लिखा हुआ होगा। कितनीं ही ऐतिहासिक तारीखों के बारे में यहाँ पर बैठ कर विचार विमर्श किया गया होगा ,और उन तारीखों पर कभी अम्ल किया गया होगा, और कभी नहीं किया होगा । कितनीं ही बार युद्धों की रणनीति तैयार की होगी, जिस आज़ाद भारत में हम रहते है, उसे पाने के लिए कितनीं ही बलिदानों की गाथा इस घर नें सुनी होगी ।
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कितनी प्रेम कहानियों ने इन दीवारों के भीतर जन्म लिया होगा ,कुछ पल्लवित हुई होंगी तो कुछ सिर्फ़ दास्तान बन कर रह गई होंगी।सब कुछ इन दीवारों देखा -सुना और महसूस किया होगा ।
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इस बंगलें में आन्तरिक रूप से यहाँ रहनें वाले अधिकारियों ने समय समय पर अपनी सुविधा के अनुसार बदलाव किए हैं, लेकिन बाहरी और से इसके स्ट्रक्चर में किसी भी तरह की कोई छेड़खानी नहीं हुई है।
जीवन की इस यात्रा में हमें भी कुछ समय यहाँ बिताने का मौक़ा मिला है

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यहाँ दो साल चार महीने रहनें के बाद आज आगे की यात्रा की और चल दिए हैं ।
मैं अपने आप को बहुत भाग्यशाली मानती हूँ कि इस ऐतिहासिक बंगले में रहने का ईश्वर ने एक मौक़ा दिया ।
यहाँ रहते हुए अनगिनत सुंदर पल देखने को मिले हैं। यहीं पर रहतें हुए बिटिया की शादी हो गई है।
अब छोड़कर जाना मुश्किल हो रहा है,हर एक कोने से एक लगाव हो जाता है ।
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मकान को घर बनानें वाला सारा समान गत्ते के डब्बों में बंद हो एक कोने में रखा गया है । अब ना जानें कब उन्हें बाहर निकलने का मौक़ा मिलेगा। मन बहुत भावुक हो रहा है ,इस घर को घर बनाए रखने में मदद करनें वालें सभी दीदी , भैया को बहुत बहुत आभार , सबसे बहुत स्नेह आदर मिला है। घर की डेहरी से खूब आशीष मिला पर अब सब छोड़ कर जा रहे हैं, इस डेहरी को नमन , इस घर में वास करने वालें सभी देवताओं को और पितृ देव को नमन करते हैं।सभी का आशीर्वाद सदैव बना रहे.