पुस्तक चर्चा : व्यंगकार पयोज जोशी का व्यंग्य संग्रह -‘सफाई की चतुर कलाएँ’ छोटे-बड़े कई विषयों को लेकर लिखे गए व्यंग

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पुस्तक चर्चा : व्यंगकार पयोज जोशी का व्यंग्य संग्रह -सफाई की चतुर कलाएँ, छोटे- बड़े कई विषयों को लेकर लिखे गए व्यंग

व्यंगकार पयोज जोशी का यह दूसरा व्यंग्य संग्रह मेरे हाथों में है। “समाज के रंग व्यंग्य के संग” इनका पहला संग्रह था।

अपने पिता (डॉक्टर मूलाराम जोशी) को समर्पित यह संग्रह उनकी समृद्ध व्यंग्य परंपरा को आगे बढ़ाता प्रतीत होता है। डॉक्टर मूलाराम जोशी अपने समय के मूर्धन्य साहित्यकार, प्रसिद्ध शिक्षाविद् एवं विचारक रहे हैं। वे निरंतर सृजन शील रहे। उनके पैने व्यंग्य- संग्रहों की लंबी फेहरिस्त रही है।

इस व्यंग्य संग्रह पर वरैण्य साहित्यकार डॉक्टर रामवल्लभ आचार्य जी की टिप्पणी मानीखेज है। वे कहते हैं-“व्यंग्य व्यंजनात्मक शैली में मारक प्रभाव छोड़ता है और पयोज  जोशी  के व्यंग्यों में काफी हद तक यह प्रभाव दिखाइई देता है।”

इस संग्रह में पयोज जी ने अपने निजी जीवन के छोटे- बड़े अनुभवों को व्यंग्यों में कुशलता से ढाला है। इन व्यंग्यों में भाषा की सहजता है.. विचारों की धार है.. ये मुस्कुराने पर मजबूर करते हैं..। हँसते- हँसाते कब चोट कर जाते हैं पता ही नहीं चलता। यह चोट थोड़ी देर के लिए तिलमिला भी देती है लेकिन अगले ही पल सोचने पर मजबूर करती है।

मुझे व्यंग्य विधा का कोई इल्म नहीं है लेकिन एक पाठक के तौर पर मैंने इस व्यंग्य संग्रह में इन सब बातों को बड़ी शिद्दत से महसूस किया है।व्यंग्य के बारे में जो कहावत प्रसिद्ध है.. “देखन में छोटे लगें, घाव करे गंभीर..” यह कहावत इन व्यंग्यो पर सटीक बैठती है।

पहला व्यंग्य है शीर्षक व्यंग्य.. “सफाई की चतुर कलाएँ”.. इस व्यंग में रोचकता है, कटाक्ष हैं। सबसे बढ़िया बात यह है कि यह छोटे- बड़े कई विषयों को उठाता है जो समाज के विभिन्न वर्गों का प्रतिनिधित्व करते हैं। इसे पढ़ते हुए बहुत मजा आया और विभिन्न विद्या के प्रति रुचि जागृत हुई। मैं आगे पढ़ती गई।

व्यंग्य “गजराज” में कही गई यह बात कितने बड़े सच को सामने लाती है और मन को करुणा से भर देती है-“जिस देश में आम आदमी जानवर की जिंदगी जीता हो वहाँ, जानवर की हालत क्या होगी..?””अतिक्रमण” एक रोचक व्यंग्य है। इसमें विभिन्न प्रकार के अतिक्रमणों जैसे वैचारिक अतिक्रमण, राजनीतिक अतिक्रमण, धार्मिक अतिक्रमण आदि पर रोचक और मारक बात की गई है।”गरीब का पेट” शासन की लाभकारी योजनाओं की वास्तविकता को सामने लाता है।”यम आउटलेट” “घुसपैठिये” “चोर” “मूषक उवॉच” “हम नहीं सुधरेंगे” इस संग्रह के प्रमुख व्यंग हैं।

पयोज जोशी  व्यक्तिगत तौर पर कई सामाजिक संस्थाओं से जुड़े हैं और अपने दायित्व को बखूबी निभाते हैं। एक व्यंग्यकार के रूप में भी उन्होंने अपना सामाजिक दायित्व पूरी कुशलता से निभाया है। इनके व्यंग्यों में समाज, राजनीति, व्यक्ति, व्यवस्था, पत्रकारिता, विकृत लोक- धर्म, आदि की विद्रूपता झलकती है। करुणा अपनी जगह बनाती है। ये व्यंग्य इन सब विषयों पर करारी चोट करते नज़र आते हैं।बढ़िया छपाई और फोंट की बड़ी साइज़ तथा विषय वस्तु की पठनीयता, इसे आसानी से पढ़वा ले जाती है।

इस संग्रह के लिए पयोज जोशी को हार्दिक बधाई.. खूब सारी शुभकामनाएँ..!!

मीनाक्षी दुबे

सफाई की चतुर कलाएंँ/ व्यंग्य संग्रह/ पयोज जोशी/ भव्या प्रकाशन/ मूल्य ₹200