एक रिटायर्ड IPS ने कुछ ऐसे महसूस किया देश के कामगारों का दर्द, पढ़ें मार्मिक कविता

एक रिटायर्ड IPS ने कुछ ऐसे महसूस किया देश के कामगारों का दर्द, पढ़ें मार्मिक कविता

मीडियावाला.इन।

रिटायर्ड IPS आरके चतुर्वेदी की कविता

हाँ मैं भारत का मज़दूर हूँ

कोरोना वायरस के कारण लागू लॉकडाउन में प्रवासी मजदूर जिस तरह से पैदल ही अपने घर जा रहे थे, वह बहुत ही हैरान कर देने वाली तस्वीर थी। प्रवासी मजदूरों की कई दर्द भरी तस्वीरें भी सामने आई थी, जिसपर बहुत से लोगों ने कविता और गजलें लिखी। ऐसी ही एक कविता रिटायर्ड IPS आरके चतुर्वेदी ने भी लिखी है जो इस तरह है....

मैं भारत का मज़दूर हूँ

रिश्ते नाते मेरे भी थे ,अपना घर था परिवार था ।
चूल्हा ,चौका,देहरी ,आँगन पूरा ही घरबार था ।।
हवा जमाने की जो बदली , नये नये कुछ सपने देखे । गाँव गिराँव लगे बेगाने , शहरों में सब अपने देखे ।।
आज उन्हीं सपनों की ख़ातिर मैं अपनों से दूर हूँ ,
हाँ ,मैं भारत का मज़दूर हूँ ।।

छोड़ा गाँव शहर में आकर ,अपना इक संसार बनाया ,
हाड़ तोड़ मेहनत मज़दूरी कर कर सारा शहर बसाया।
उसी शहर के एक कोने में ,रहने को एक कुटिया भी थी,
घर गिरहस्ती और घरैतिन,प्यारी सी एक बिटिया भी थी।
माँ बेटी की सुन सुन बातें ख़ुशियों से भरपूर हूँ ,
हाँ ,मैं भारत का मज़दूर हूँ ।।

नज़र लग गई मेरे सुख को ,काल कोरोना बन कर आया ।
भूख ,बेबसी ,रोग बीमारी ,गई नौकरी खबर सुनाया ।
बहुत भरोसा था उन सब पर , हमनें जिनके सपने सींचे,
पर कुदरत से मिली मार पर सबनें अपने दामन खींचे।
बहुत कोशिशें की टिकने की पर अब थक कर मैं चूर हूँ
हाँ मैं भारत का मज़दूर हूँ ।।

निष्ठुर , निर्मम शहर तुम्हारा,चकाचौंध नें मन भरमाया,
गाँव गिराँव याद फिर करके ,लौट चलूँ ये मन में आया।
घर आने की कोशिश में मैं ,चहुंदिश भटका मारा मारा ,
हर दरवाज़े मत्था टेका ,पर सबनें तो किया किनारा ।।
खुद की ढाली तपती सड़कों पर पैदल चलने को मजबूर हूँ।।
हाँ मैं भारत का मज़दूर हूँ ।।

जलती सड़कें ,पड़ते छाले ,हलकों को ना मिले निवाले।
पैदल,साइकिल,जीते मरते ,पहुँचे घर तो क़िस्मत वाले।
टी वी खबरों चैनल में हम ,सत्ता और विपक्ष का दम हम ।
बहसों में हम गये घसीटे , रोज़ सड़क पर जाते पीटे ।।
कल तक जग में अनजाना था अब दुनिया भर में मशहूर हूँ ,
हाँ मैं भारत का मज़दूर हूँ ।।

Dailyhunt

0 comments      

Add Comment