मामला कैबिनेट विस्तार का: शिवराज को हो रही अपने- पराए की परख

मामला कैबिनेट विस्तार का: शिवराज को हो रही अपने- पराए की परख

मीडियावाला.इन।

0 शिवराज को हो रही अपने - पराए की परख....

- पुरानी कहावत है, संकट के समय अपने और पराए की पहचान हो जाती है। शिवराज सिंह चौहान प्रदेश सरकार के मुखिया हैं। पहली बार उनके सामने संकट है कि वे अपने सभी लोगों को मंत्रिमंडल में शामिल नहीं कर सकते। इसके लिए उन पर दबाव भी है। उम्मीद थी, जिन्हें बार-बार हारने के बावजूद उन्होंने पार्टी के टिकट दिलाए। मंत्री पद  देकर ताकतवर बनाया। मंत्री नहीं बना पाए और हार गए तब भी दूसरी तरह से उपकृत किया। इन्हें शून्य से शिखर तक पहुंचाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। संकट की इस घड़ी में मंत्री पद के दावेदारों को चाहिए था कि वे अपनी तरफ से कहें, आप मुख्यमंत्री हैं हमारे लिए यही पर्याप्त है। यह कहकर मंत्री पद त्यागने का साहस दिखाते। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। शिवराज के सभी अपने मंत्री बनने के लिए लगातार दबाव बनाकर धर्मसंकट पैदा किए हुए हैं। इतना ही नहीं कमलनाथ सरकार के सवा साल के कार्यकाल में जब शिवराज पर लगातार हमले हो रहे थे तब भी उनके ये अपने साथ नहीं दिखे, चुप रहे।

0 शादी का मुद्दा उठा बने मजाक के पात्र....

- कोरोना संकट से निबटने में जब पूरा देश जुटा है तब कुछ नेता खुद को मजाक का पात्र बनाने में नहीं चूक रहे। जैसे, विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने केंद्र सरकार के निर्णयों पर सवाल उठाए। इसका जवाब तर्कसंगत तरीके से दिया जाना चाहिए था, लेकिन भोपाल में भाजपा के एक नेता ने राहुल गांधी की शादी का मुद्दा उठाकर अपरिपक्वता का परिचय दे डाला। उन्होंने ट्वीट कर सोनिया गांधी से कहा, वे राहुल गांधी की शादी कराएं, हम शादी का खर्च उठाएंगे। एक अन्य नेता ने इसे रि-ट्वीट कर राहुल की शादी के लिए 21 हजार रुपए देने की घोषणा कर डाली। जैसी संभावना थी, विवाद में कांग्रेस कूद पड़ी। कांग्रेस नेताओं ने कहा कि भाजपा के ये नेता पहले अपनी पार्टी के उन नेताओं की शादी करा दें, जिनकी शादी अब तक नहीं हुई। इस पर जो खर्च आएगा, उसे कांग्रेस वहन करेगी। इसके बाद भाजपा नेताओं की बोलती बन्द हो गई। है न बेतुका विवाद और तर्क-कुतर्क। महामारी के समय नेताओं को इस तरह के विवाद पैदा कर हंसी का पात्र नहीं बनना चाहिए। 

0 लो आमने - सामने आ गए राजा - महाराजा....

- जब कांग्रेस में थे तब राजा दिग्विजय सिंह एवं महाराजा ज्योतिरादित्य सिंधिया के बीच कभी पटरी नहीं बैठी। फिर भी एक- दूसरे का लिहाज था। कभी जुबानी जंग नहीं हुई। लेकिन सिंधिया ने जब से कांग्रेस छोड़ भाजपा का दामन थामा तब से ही  दिग्विजय सिंह और वे आमने-सामने हैं। दोनों की तरकश से जहर बुझे तीर निकलने लगे हैं। रिलायंस फाउंडेशन की मदद जब सिंधिया के फोटो के साथ कोरोना पीड़ितों में बंटने लगी तो दिग्विजय ने सवाल उठाया। कहा, सिंधिया के पास संपत्ति की कमी नहीं है। वे संकट के समय रिलायंस फाउंडेशन की मदद में अपना नाम चस्पा कर वाहवाही क्यों लूट रहे हैं। खुद अपनी ओर से मदद के लिए आगे क्यों नहीं आ रहे। इसके बाद उनके विधायक बेटे जयवर्धन ने भी ट्वीट कर सिंधिया पर बिना नाम लिए हमला बोला। उन्होंने लिखा, 1857 के संग्राम में यदि एक महाराजा ने अंग्रेजों का साथ देकर स्वतंत्रता सेनानियों के साथ विश्वासघात न किया होता तो स्वतंत्रता आंदोलन का इतिहास आज कुछ और होता। सिंधिया और उनके खेमे की ओर से दोनों आरोपों का तगड़ा जवाब दिया गया। साफ है, राजा-महाराजा के बीच यह राजनीतिक जंग दिलचस्प दिखने वाली है।

0 उलटा पड़ सकता कांग्रेस का दांव....

- सत्ता गंवाने के बाद प्रतिशोध की ज्वाला में जल रही कांग्रेस उपचुनाव को लेकर बेहद गंभीर है। बेहतर प्रत्याशियों की तलाश के लिए मुख्यमंत्री कमलनाथ संबंधित विधानसभा क्षेत्रों में सर्वे करा रहे हैं। कुछ सीटों पर पिछले चुनाव में भाजपा के हारे हुए उम्मीदवारों को कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ाने की तैयारी है। सबसे बड़ी दुविधा यह है कि बागियों के विश्वासघात के कारण सरकार गिरने को कांग्रेस मुद्दा बना रही है। बागियों को बिकाऊ, दलबदलू और धोखेबाज की उपमाओं से नवाजा जा रहा है। ऐसे में कांग्रेस यदि भाजपा नेताओं को पार्टी में लाकर मैदान में उतारती है तो दांव उल्टा पड़ सकता है। इसलिए कांग्रेस अनिर्णय की स्थिति में है। इस बात का आकलन किया जा रहा है कि भाजपा नेताओं को तोड़कर चुनाव लड़ाना फायदे का सौदा होगा या घाटे का। पिछले दिनों सुरखी विधानसभा क्षेत्र के लिए कांग्रेसियों की बैठक बुलाई गई थी, उसमें इसी मुद्दे की वजह से प्रत्याशी चयन को लेकर विरोधाभास की स्थिति थी।

RB

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दिनेश निगम त्यागी

श्री दिनेश निगम 'त्यागी' भोपाल के वरिष्ठ पत्रकार हैं .