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नेता और पुलिस के बीच बढ़ते विवाद, सरकार की हो रही किरकिरी!

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नेता और पुलिस के बीच बढ़ते विवाद, सरकार की हो रही किरकिरी!

भोपाल: मध्य प्रदेश में इन दिनों नेता और पुलिस के बीच विवाद तेजी से बढ़ रहे हैं। विवादों के चलते पुलिस और सरकार की लगातार किरकिरी भी हो रही है। साथ ही इसका असर प्रदेश की कानून व्यवस्था पर भी पड़ रहा है। इसके बाद भी नेता और पुलिस के विवाद का स्थाई समाधान खोजने के प्रयास फिलहाल नजर नहीं आ रहे हैं। तेजी से बढ़ रहे विवादों को सुलझाने के लिए अधिकतर पुलिस अफसरों और जवानों पर गाज गिरा दी जाती है।

दरअसल इन दिनों पुलिस के अफसर, विधायक सहित अन्य नेताओं को महत्व कम दे रहे हैं। नेताओं और विधायकों को जनता के बीच में रहना होता है, उनके पास तमाम तरह की सिफारिशें आती है, कुछ इसमें से जनहित की ही होती है, जबकि कुछ स्वार्थ पूर्ण होती है। पुलिस इन दोनों तरह के शिकायतों और सिफारिशों को मानना ही नहीं चाहती है। वह अपने नफा-नुकसान के अनुसार कार्यवाही करती है या कार्यवाही को अटका देती है। इसके चलते लगातार विवाद बड़ रहे हैं। बाद में तूल पकड़ने पर सरकार को पुलिस अफसरों का तबादला करना पड़ता है। हरदा की घटना भी इसकी एक बानगी है। जहां पर पुलिस को लाठीचार्ज करना भारी पड़ गया। अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक, एसडीओपी सहित दो थाना प्रभारियों को हटाया गया।

*केस वन* 

मऊगंज के विधायक प्रदीप पटेल का अप्रैल में यहां के एक थाना प्रभारी से विवाद हो गया था। इस विवाद के बाद वे थाने गिरफ्तारी देने पहुंच गए थे। यहां पर थाना प्रभारी जगदीश सिंह ठाकुर और विधायक प्रदीप पटेल के बीच लंबे समय से विवाद चल रहा था। इस विवाद ने अप्रैल में बड़ा रूप ले लिया और पटेल थाने में गिरफ्तारी देने के लिए धरने पर बैठ गए। करीब 6 घंटे तक वे यहां पर बैठे रहे। इसके बाद जैसे-तैसे मामला शांत हुआ बाद में पटेल ने मुख्यमंत्री सहित भाजपा संगठन के तमाम पदाधिकारियों से बातचीत की, तब जाकर मामला शांत हुआ।

 *केस टू*

पूर्व मंत्री एवं विधायक सुरेंद्र पटवा भी अपने क्षेत्र के एसडीओपी के खिलाफ सड़क पर धरना देकर बैठ गए थे। इस मामले में भी यह कहा जाता है कि पुलिस अफसर विधायक की नहीं सुन रहे हैं। हालांकि उनके विधानसभा क्षेत्र के थानों के सभी प्रभारी उनकी पंसद के ही पदस्थ हैं, लेकिन उच्च अफसरों से उनकी ट्यूनिंग नहीं जम पा रही है। इसके चलते उन्होंने एसडीओपी को हटाने की मांग रखी, जब उनकी बात नहीं सुनी गई तो वे सड़क पर उतर आए।

*केस थ्री*

हाल ही में भाजपा के पूर्व विधायक केपी त्रिपाठी और महिला CSP के बीच एक थाने में हुआ विवाद बहुत चर्चा में आया है। त्रिपाठी अपने समर्थकों के साथ चुरहटा थाने पहुंचे थे। वे एक मामले में त्वरित कार्रवाई की मांग कर रहे थे। इस दौरान सीएसपी रितु उपाध्याय से उनकी कहासुनी हो गई। त्रिपाठी ने सीएसपी को “असंवेदनशील औरत” कह दिया। इस पर सीएसपी रितु उपाध्याय ने भी उनसे कहा कि आज तमीज से बात करिए। दोनों के बीच हुई इस बहस से माहौल और ज्यादा गरमा गया। गुस्साए समर्थकों ने पुलिस के खिलाफ नारेबाजी शुरू कर दी।

*और भी हैं मामले* 

ये दो मामले उदाहरण के लिए हैं, जबकि प्रदेश में ऐसे कई केस सामने आ चुके हैं। जिसमें पुलिस की हठधर्मी के कारण नेता और जनप्रतिनिधियों के बीच विवाद हो रहा है। इस तरह के विवाद न हो इसे लेकर हल निकाले का प्रयास भी किया गया था, लेकिन थाना प्रभारी और उच्च रैंक के अफसर इतने पॉवरफुल हैं कि उनके स्थानातंरण में भी सिस्टम को पसीना आ रहा है।

*यह निकला था हल, लेकिन नतीजा सिफर* 

डीजीपी कैलाश मकवाना ने यह तय किया था कि जो सीएसपी, डीएसपी, एसडीओपी सहित निरीक्षक, उपनिरीक्षक एक ही जिले में बार-बार अलग-अलग पदों पर पदस्थ रहते हुए लंबे समय से एक ही जिले में जमे हुए हैं , उन्हें जिले से बाहर किया जाए, लेकिन डीजीपी का यह आदेश अमल में नहीं आ सका। भोपाल सहित कई कई शहरों में सीएसपी, निरीक्षक ऐसे हैं जो लंबे समय से अलग-अलग पदों पर रहें हैं, पदोन्नत होने या तीन-चार साल पूरे करने पर कुछ समय के लिए जिले के बाहर चले जाते हैं और फिर वापस अपने पंसद के जिले में पदस्थ हो जाते हैं।