बंगाल से लौटते ही ‘पॉवरफुल’ हुए नरोत्तम....

बंगाल से लौटते ही ‘पॉवरफुल’ हुए नरोत्तम....

मीडियावाला.इन।

पश्चिम बंगाल के चुनाव प्रचार अभियान में भाजपा ने प्रदेश के कई नेताओं, मंत्रियों को जवाबदारी सौंपी थी। कैलाश विजयवर्गीय पश्चिम बंगाल के प्रभारी थे ही, प्रदेश मंत्रिमंडल के सदस्य नरोत्तम मिश्रा, विश्वास सारंग तथा अरविंद भदौरिया भी वहां तैनात किया गया था। चर्चा थी कि पश्चिम बंगाल के नतीजे मप्र के कई नेताओं का कद बढ़ा-घटा सकते हैं। सरकार के प्रवक्ता पद के दावेदार नरोत्तम के अलावा विश्वास एवं अरविंद भी थे। विश्वास को इसका प्रबल दावेदार माना जा रहा था। वे मंत्रिमंडल के निर्णयों की जानकारी मीडिया को देते थे और कई अवसरों पर सरकार का पक्ष भी रखते थे। लेकिन पश्चिम बंगाल के नतीजे आने से पहले ही नरोत्तम मिश्रा को इनाम मिल गया। एक दिन पहले ही सरकार ने आदेश जारी कर नरोत्तम को सरकार का प्रवक्ता बना दिया। नरोत्तम बाजी मार ले गए और विश्वास, अरविंद पीछे रह गए। नरोत्तम पहले भी यह दायित्व निभा चुके हैं। प्रवक्ता की जवाबदारी मिलना नरोत्तम का और पॉवरफुल होना ही माना जा रहा है। इससे पता चलता है कि नरोत्तम केंद्रीय नेतृत्व की पसंद बने हुए हैं। कोरोना जैसी महामारी के बावजूद नरोत्तम पश्चिम बंगाल में सबसे ज्यादा रहे और सबसे बाद में मप्र वापस लौटे। यह बात अलग है कि भाजपा का पश्चिम बंगाल की सत्ता में आने का सपना टूट गया। पार्टी 2019 के लोकसभा चुनाव जैसा प्रदर्शन भी नहीं कर पाई। अब कैलाश विजयवर्गीय की नई भूमिका पर सबकी नजर है।

*कॉश!‘कोरोना’ के लिए ‘मॉडल’ बन पाता भोपाल....*
- राजधानी भोपाल में या तो कोरोना पीड़ितों को सिफारिश के बगैर अस्पतालों में जगह नहीं मिल रही, जगह मिल गई तो उनके साथ जमकर लूट-खसोट हो रही है। कोरोना पीड़ितों के इलाज एवं गाइडलाइन का पालन कराने के मामले में इंदौर जिला प्रशासन जितना मुस्तैद है, भोपाल का उतना ही फिसड्डी व लचर। इंदौर की तरह भोपाल में भी एम्बुलेंस का किराया तथा इलाज के लिए दरें तय हैं। इंदौर में इस पर काफी हद तक अमल हो रहा है। मनमानी कमाई करने वालों के खिलाफ कार्रवाई हो रही है। भोपाल में सब राम भरोसे है। भोपाल में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान एवं चिकित्सा शिक्षा मंत्री विश्वास सारंग व्यवस्था की कमान खुद अपने हाथ में लिए हैं। दोनों की कोशिश है कि हर कोरोना पीड़ित को समुचित और सस्ता इलाज मिले, लेकिन जिला प्रशासन निर्देशों पर अमल करा पाने में नाकाम है। मरीजों को अस्पतालों में जगह, बेड, वेंटीलेटर एवं आक्सीजन नहीं मिल पा रही। हालात ये हैं कि शुक्रवार को अरेरा ट्रामा सेंटर से एमपी नगर स्थिति सिटी अस्पताल ले जाने के लिए ही एक मरीज से एम्बुलेंस का किराया 6 हजार रुपए ले लिया गया। यही स्थिति अस्पतालों में वसूली की है। कॉश! भोपाल कोरोना से निबटने के मामले में दूसरे जिलों के लिए ‘मॉडल’ बन पाता।

*भार्गव को मिला शिवराज-भूपेंद्र का साथ....*
- गढ़ाकोटा के वृद्धाश्रम में सर्व सुविधायुक्त कोविड केयर सेंटर बनाकर प्रदेश के कद्दावर मंत्री गोपाल भार्गव पहले से चर्चा में थे। इसके बाद उन्होंने एमबीबीएस डाक्टर के लिए अपनी ओर से विज्ञापन निकाल कर कहा कि वे अपनी जेब से सेवा देने वाले डाक्टर को प्रति माह दो लाख रुपए देंगे। खबर यहां तक आ गई कि भार्गव को कोविड सेंटर के लिए दवाएं भी ब्लेक में खरीदनी पड़ीं। एक तरह से भार्गव ने ऐसा कर सरकार की व्यवस्थाओं को आइना दिखाया था, बावजूद इसके मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने जब सागर जिले की कोरोना व्यवस्थाओं की समीक्षा की तो उन्होंने भार्गव की तारीफ की। भार्गव का समर्थन उनके प्रतिद्वंद्वी रहे नगरीय प्रशासन मंत्री भूपेंद्र सिंह ने भी किया। दरअसल, समीक्षा के दौरान भार्गव क्षेत्रीय विधायकों द्वारा कोविड केयर सेंटर संचालित कराकर मरीजों की मदद की जानकारी दे रहे थे। वर्चुअल कान्फ्रेंस में केंद्रीय मंत्री प्रहलाद पटेल भी जुड़े थे। उन्होंने भार्गव की बात काटते हुए कहा कि जमीनी स्तर पर ऐसा कुछ नहीं हो रहा। लेकिन प्रहलाद को न मुख्यमंत्री का समर्थन न मिला, न ही किसी अन्य विधायक का। सभी ने भार्गव द्वारा की गई शुरुआत की तारीफ की, जिसका अनुसरण कई अन्य विधायक अपने क्षेत्रों में कर रहे हैं।

*कोरोना पर अपने ही दिखा रहे तीखे तेवर....*
- मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान एक तरफ कोरोना संकट से निबटने में लगे हैं, दूसरी तरफ कोरोना से निबटने में असफलता के लिए भाजपा के अपने नेता ही तीखे तेवर अपना रहे हैं। वरिष्ठ विधायक एवं पूर्व मंत्री अजय विश्नोई पहले से सरकार पर हमलावर हैं। अब नारायण त्रिपाठी ने कहा है कि मुख्मयंत्री को वर्चुअल मीटिंग का तमाशा बंद कर अस्पताल में बेड, इंजेंक्शन और आक्सीजन की व्यवस्था में ध्यान केंद्रित करना चाहिए। इंदौर की एक महिला नेत्री ने तो कोरोना पर सरकार को घेरते हुए नेतृत्व परिवर्तन की ही मांग कर डाली। हालांकि बाद में भाजपा ने बयान जारी कर कहा कि यह महिला अब भाजपा में नहीं है। इस तरह सरकार खासकर मुख्यमंत्री को विपक्ष और मरीजों के साथ अपनों के विरोध का सामना भी करना पड़ रहा है। खास बात यह है कि पार्टी में उपकृत नेता भी उपेक्षितों की भाषा बोलने लगे हैं। जैसे प्रहलाद पटेल केंद्र में मंत्री हैं और भाई जालम सिंह पटेल विधायक, फिर भी प्रहलाद के भतीजे और जालम के बेटे मोनू पटेल ने सोशल मीडिया पर सरकार को जमकर घेरा। उन्होंने आरोप लगाया कि कोरोना से निबटने में सरकार असफल है और लोग परेशान। जब प्रहलाद पटेल के परिवार से ही बगावती स्वर उभर रहे हैं तो सवाल स्वाभाविक है कि भाजपा के अंदर कोई अलग खिचड़ी तो नहीं पक रही? दमोह में भाजपा की हार के बाद इसमें और तेजी आ सकती है।

*कमलनाथ की शैली से कहीं नफा-कहीं नुकसान....*
- प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ के काम की अपनी शैली है। इस शैली की वजह से वे अपनी सरकार गंवा चुके हैं और कई बार पार्टी विधायक टूट कर भाजपा में जा चुके हैं। पर कमलनाथ ने काम की अपनी शैली नहीं बदली। दरअसल, कमलनाथ लोकसभा चुनाव जरूर जीतते रहे लेकिन वे मैदानी नेता कभी नहीं रहे। संघर्ष कर पार्टी को खड़ा करना उनके बूते की बात नहीं। इसलिए जिस तरह वे पार्टी और सरकार चला रहे थे, उसी तर्ज पर कोरोना को लेकर सरकार को घेर रहे हैं। इसके लिए उनका मुख्य हथियार है ‘पत्र और ट्वीट’। इनके जरिए वे सरकार पर हमला करते हैं, सुझाव भी देते हैं। विडंबना यह है कि कमलनाथ छिंदवाड़ा से बाहर कहीं भी कोरोना पीड़ितों की मदद करते दिखाई नहीं पड़ते, जिस तरह इंदौर में कैलाश विजयवर्गीय, जबलपुर में विवेक तन्खा एवं सागर में गोपाल भार्गव, गोविंद सिंह राजपूत जैसे कई नेता सक्रिय हैं। हालांकि पत्रों के जरिए कमलनाथ कोरोना को कांग्रेस के पक्ष में भुनाने की कोशिश में हैं। अभी उन्होंने पत्रकारों को कोरोना वायर्स घोषित करने मुख्यमंत्री को पत्र लिख डाला है। इसमें उन्हें भाजपा के कई नेताओं का भी समर्थन मिल रहा है। साफ है कमलनाथ की यह शैली कांग्रेस को कहीं नुकसान पहुंचाती है तो कहीं फायदा भी। दमोह में जीत का फायदा भी नाथ को मिल सकता है।

0 comments      

Add Comment


दिनेश निगम त्यागी

श्री दिनेश निगम 'त्यागी' भोपाल के वरिष्ठ पत्रकार हैं .