रूप बदलता विषाणु और हडबड़ाते हम

रूप बदलता विषाणु और हडबड़ाते हम

मीडियावाला.इन।

इन दिनों एक बड़ा अच्छा वाक्य पढ़ने में आया था कि “यह समय फोड़े से मवाद निकालने का नहीं है”।

आज का संकट कुछ दिनों पहले तक, कुछ लोगों के लिये शायद कुछ बहुत बुरी खबरों तक ही सीमित रहा हो । मौत के आँकड़े भी उनके लिये महज गिनती ही रहे हों, लेकिन अब, मौत ने भले ही हर घर न देखा हो, पर सबके आस-पड़ौस में, या अपने ही परिजनों के दरवाजे पर मौत की दस्तक सुनी और देख ली गई है। इसलिये अब बराबरी से, यह सबका संकट हो गया है।

इस संकट की आंखों देखी कई बातों, जो भीषण और असहनीय तो हैं ही,लेकिन इस वक्त उन पर बात न कर कुछ और बात कर लें तो वह जरुरी होगा , क्योंकि सवा साल से ज्यादा हो गये, इसे भोगते हुये हर व्यक्ति एक दूसरे से कुछ न कुछ ज्यादा ही जानने लगा है । सम्भव तो यह भी है कि वह दूसरों की तुलना में ज्यादा बड़ा भुक्तभोगी हो।

मानवता ने कई तरह के इससे बड़े-बड़े संकट भी पहले देखे हैं। यह संकट भी उन बहुत कम ऐसे संकटों में, अपनी तरह का अकेला संकट है।

विषाणुओं (वायरस) से फैले इस तरह के संकटों में चिकित्सा अपना काम करती है,सरकारें अपना काम करती हैं, समाज अपना काम करता है और प्रकृति तो अपना काम करती ही है।

ऐसे संकटों में विज्ञान की एक जिम्मेदारी होती है कि वह विषाणुओं की यात्रा पर निगाह रखे। उनके हर एक या अगले अधिक अंतरणों पर विषाणुओं के बदलते स्वरुप और बदलते गुणों पर वह बहुत पैनी निगाह रखे।

उन परिवर्तनों की सूचना के आधार पर ही चिकित्सा विज्ञान और सरकारों सहित सब अपनी रणनीति बनाते या बदलते हैं।

विज्ञान की भाषा में इसे “जीन सीक्वेंसिन्ग” या “जीनोम सीक्वेंसिन्ग” भी कहते हैं। कोविड’19 विषाणु के अपने देश में आने की पुष्टि के साथ ही सारी दुनिया की तरह हमें भी इस काम में लग जाना चाहिये था। हमने इसे अपने देश में जनवरी’2020 में पहली बार औपचारिक रूप से देखा था।

इस बीच कई लोग अपने यहाँ विदेशों से आये या उन्होंने एक प्रदेश से दूसरे प्रदेश की यात्रा भी की, लेकिन हमारा “जीनोम सीक्वेंसिन्ग” का काम सारी दुनिया से पिछड़ता रहा। हमने अपनी बहुत कम जानकारी दुनिया से बाँटी या दुनिया की बहुत कम जानकारियों का अपने यहाँ उपयोग किया।

इस बीच पुणे की नेशनल इन्स्टीट्यूट ऑफ़ वायरोलॉजी ने महाराष्ट्र में लिये गये 361 नमूनों में पहले विषाणु की तुलना में दुगुनी मारक क्षमता वाला विषाणु सितम्बर’2020 में पाया था। अक्टूबर’20 में यह, या इससे मिलता जुलता विषाणु देश के अन्य हिस्सों में भी मिलने लगा था।

तब जाकर हमने भारत में ‘जीनोम सीक्वेंसिन्ग’ को प्राथमिकता पर लिया था। बावजूद इसके जब तक अन्य देश एक लाख के आसपास सीक्वेंसिन्ग का ‘डेटा’ इकट्ठा कर चुके थे हमने कुछ सैकड़े ‘डेटा’ ही इकट्ठे किये व उनका अध्ययन कर चिकित्सा विज्ञान के साथ उसे बांट था। लेकिन, तब तक विषाणु और अधिक मारक बनकर अपना रूप बदल लेता रहा और अधिक मारक बनकर अन्य प्रदेशों में भी फैल गया।

जनवरी’21 में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने दुनिया के 124 देशों के 1750 वैज्ञानिकों से चर्चा की और जानकारी ली थी, तब तक हम अपने यहाँ प्राप्त नमूनों के कुल एक प्रतिशत नमूनों की ही “सीक्वेंसिन्ग” कर पाये थे। यानी विषाणु के भेस बदलने संबंधी हमारी जानकारी बहुत बहुत कम रही।

यही नहीं हम तो कहते रहे कि बस “टीका” आते ही सब ठीक हो जायेगा। इसी निश्चिंतता के दौरान स्थितियाँ हाथ से निकलती दिखीं ।

दिसम्बर के एकदम आखिर में “जीनोम सीक्वेंसिन्ग” पर हमारे यहाँ गम्भीरता से बात हुई और भारत सरकार के बायो-टेक्नोलॉजी विभाग सहित सेंटर फ़ॉर सेल्युलर ऐण्ड मोलेक्युलर बायॉलॉजी, इन्स्टीट्यूट ऑफ़ जेनोमिक्स एण्ड इन्टीग्रेटेड बायॉलॉजी, इंडियन कौन्सिल ऑफ़ मेडिकल रिसर्च, कौन्सिल ऑफ़ साईंटिफिक एण्ड इन्डस्ट्रीयल रिसर्च और कुल मिलाकर 12 विशेषज्ञ वैज्ञानिक संस्थाओं का एक ‘कन्सोर्शियम’ बनाया गया। इन्हें कोविड’19 के विषाणु का “जीनोम सीक्वेंसिन्ग” कर देश में हर रोज और हर जगह रुप बदलने के कारण और उससे निपटने की रणनीति बताने का दायित्व दिया गया था।

अप्रेल के तीसरे हफ्ते में जब भारत सरकार के स्वास्थ्य सचिव श्री राजेश भूषण से इसकी तीन महीने की प्रगति पूछी गई तो उन्होंने बात नीति आयोग के सदस्य ( स्वास्थ्य) श्री विनोद पाल के पाले में डाल दी। पाल साहब ने इस पूरी प्रक्रिया में कई दिक्कतों, जिनमें देश के बड़े होने या नमूनों की प्राप्ति में आ रही दिक्कत की बात कहकर गोलमोल जवाब दे दिया।

भारतीय विज्ञान एवं औद्योगिक शोध संस्थान के महानिदेशक श्री एस सी मान्दे ने भी जिम्मेदारी आगे सरका दी । इस बीच एक और शोध संस्थान के सबसे बड़े ‘साहब’ ने तो यह भी कह दिया कि आप मेरे बोलने के लिये भारत सरकार के साइन्स एण्ड टेक्नोलॉजी विभाग से स्वीकृति ले आइये।

हाँ,सेंटर फॉर सेल्युलर एण्ड मोलेक्युलर बायॉलॉजी के महानिदेशक श्री राकेश मिश्रा ने अपनी दिक्कतें बताते हुये कहा कि हम गम्भीर आर्थिक संकटों से गुजर रहे हैं। जांच के लिये प्राप्त नमूनों को विशेष मशीनों में रखने के लिये एक विशेष प्लास्टिक के पात्र लगते हैं। ये पात्र आयात ही करने पडते हैं। इस आयात की स्वीकृति का प्रस्ताव सम्बन्धित मंत्रालय में महिनों से लम्बित है,क्योंकि विभाग का आग्रह है कि ‘मेड इन इंडिया’ की भारत सरकार की नीति के तहत भारत में ही विकल्प खोजे जायें। जबकि सिवाय आयातित पात्रों के इनका कोई विकल्प नहीं है।

श्री मिश्रा ने दबी जबान से यह भी बताया कि आर्थिक संकट के चलते प्रयोगों के लिये पर्याप्त ‘रिएजेंट्स’ भी नहीं हैं, और सितम्बर से यह संस्थान बन्द सा पड़ा है।

भारत सरकार के एक पूर्व सचिव श्री ई ए एस सर्मा ने मौजूदा वित्तमंत्री श्रीमती निर्मला सीतारमन को इसी महीने (अप्रेल) की 22 तारीख को एक बड़ा ही मार्मिक पत्र लिखा है।यह पत्र अब सार्वजनिक भी हो चुका है।

इस पत्र में ऊपर लिखी बहुत सी बातें तो हैं ही, उन संस्थानों,जिन्हें “जीनोम सीक्वेंसिन्ग’ के समूह में शामिल किया गया है, की बदहाली का हवाला भी दिया गया है। उनके लिये पर्याप्त वित्तीय संसाधनों का निवेदन इस पत्र में किया गया है।

सारे अनुमान लगाकर इन संस्थाओं के लिए मांगी गई राशि उतनी ही है जितनी महाराष्ट्र के एक मंत्री ने रिश्वत में मांग ली थी।

हम एक बार फिर समझ लें कि रोज और लगभग हर भौगोलिक परिस्थिति में अपना रुप,आकार और मारक क्षमता बदल रहे कोविड’19 के वायरस से हमें लड़ना है, तो इसकी “सीक्वेंसिन्ग” या इसके व्यवहार को हमें समझना ही पड़ेगा।

अन्यथा हम अपने कितने ही संसाधन लगाते रहेंगे,यह विषाणु अपना रूप बदलता रहेगा और हम इससे मात खाते ही रहेंगे। यह हमारा साल भर का कटु अनुभव है।

यही नहीं दिल्ली हाईकोर्ट की एक बेंच ने आईआईटी दिल्ली के उस एक अध्ययन, जिसमें लिखा था कि जिस तरह से यह विषाणु व्यवहार कर रहा है,उससे तो लगता है कि मई महीने के मध्य तक एक सुनामी का रूप ले सकता है,का हवाला देते हुये सरकार से पूछा था कि बावजूद इसके हमारी चिकित्सकीय और भौतिक तैयारियां क्यों पिछड़ गई है।

अपने प्रधानमंत्रीजी जब आए ही आये थे, तब उन्होंने कहा था कि वे बजाय औपचारिक अफसरशाही के “विषयों के विशेषज्ञों” से भी समय समय पर जरूर राय लेंगे।

लेकिन, इस महत्वपूर्ण मुद्दे पर हमें सारे तथ्य निराशाजनक ही दिखाई पड़ते हैं। हमें क्यों नहीं विश्वास कर लेना चाहिए कि वाकई अभी जो भी दिख रहा है, वह तो “हैडलाइन मैनेजमेंट” ही है।

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कमलेश पारे

साठ और सत्तर के दशकों में अविभाजित मध्यप्रदेश के इंदौर और रायपुर शहरों में पत्रकारिता में सक्रिय रहे कमलेश पारे ने अगले दो दशक विभिन्न शासकीय उपक्रमों में जनसम्पर्क और प्रबंध के वरिष्ठ पदों पर काम किया.अगले लगभग पांच वर्ष वे समाचार पत्र प्रबंधन में शीर्ष पदों पर रहे.मध्यप्रदेश मूल के दो समाचार पत्र समूहों के राजस्थान और मुंबई संस्करणों में महाप्रबंधक व राज्य-प्रमुख की हैसियत से काम किया.

इंदौर नगर पालिक निगम में नवाचारी परियोजनाओं सहित विभिन वैश्विक संगठनों की सहायता से नगरीय प्रबंध में लगे लोगों व जनप्रतिनिधियों के क्षमता-विकास और जन-सहयोग से विकास सुनिश्चित करने हेतु विशेष कर्तव्यस्थ अधिकारी के रूप में भी कमलेश पारे ने अपनी सेवाएं दी हैं.इसी दौरान नगरीय विकास और प्रबंध  पर केंद्रित मासिक पत्रिका 'नागरिक'का संपादन किया.सम्प्रति स्वतंत्र लेखन ...