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आओ, आज ‘मुद्रा राक्षस’ की बात करते हैं…

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आओ, आज ‘मुद्रा राक्षस’ की बात करते हैं…

कौशल किशोर चतुर्वेदी

‘मुद्राराक्षस’ महाकवि विशाखदत्त द्वारा रचित एक प्रसिद्ध संस्कृत राजनीतिक नाटक है। इसकी मुख्य कथा चाणक्य की कूटनीति पर आधारित है, जिसका उद्देश्य नंद वंश के वफादार मंत्री ‘राक्षस’ को अपनी ओर मिलाकर चंद्रगुप्त मौर्य की सत्ता को स्थिर करना था। अन्य संस्कृत नाटकों की तरह इसमें कोई प्रेम कहानी या हास्य नहीं है, बल्कि यह विशुद्ध रूप से कूटनीति, राजनीति और बुद्धि के प्रयोग पर केंद्रित है। वैसे इस तरह के राजनीतिक नाटक की रचना वर्तमान राजनीतिक संदर्भ में भी की जा सकती है।

खैर हम आज इस राजनीतिक नाटक की बात नहीं कर रहे हैं। हम आज ‘मुद्राराक्षस’ नाम से लोकप्रिय साहित्यकार सुभाष चन्द्र गुप्ता की बात कर रहे हैं। पहले यह समझते हैं कि इनका नाम मुद्राराक्षस कैसे पड़ा। सुभाष चन्द्र गुप्ता से हिंदी साहित्यकार ‘मुद्राराक्षस’ बनने की कहानी बेहद दिलचस्प है। एक आलोचनात्मक लेख को प्रकाशित करने से बचने के लिए, उनके संपादक ने उनका नाम बदलकर ‘मुद्राराक्षस’ कर दिया था। युवा दिनों में सुभाष चन्द्र गुप्ता ने प्रसिद्ध साहित्यकार अज्ञेय के ‘तार सप्तक’ पर एक तीखा आलोचनात्मक लेख लिखा था। इसमें यह सिद्ध किया गया था कि अज्ञेय की रचनाएं विदेशी लेखकों (जैसे टी.एस. इलियट) से प्रेरित थीं। ‘युगचेतना’ पत्रिका के संपादक डॉ. देवराज लेख के तथ्यों से सहमत तो थे, लेकिन वे अपने युवा लेखक को अज्ञेय जैसे बड़े रचनाकार के रोष से बचाना चाहते थे। डॉ. देवराज ने कहा कि यह लेख सुभाष के नाम से नहीं बल्कि ‘मुद्राराक्षस’ नाम से छापा जाएगा। उन्होंने तर्क दिया कि विशाखदत्त का संस्कृत नाटक ‘मुद्राराक्षस’ राजनीतिक कूटनीति और चालाकियों पर आधारित था। चूँकि सुभाष का यह लेख भी साहित्यिक जगत में ऐसा ही धमाका करने वाला था, इसलिए यह नाम उनके लिए बिल्कुल उपयुक्त था। जब यह लेख छपा तो हिंदी जगत में भारी हंगामा मच गया। इसके बाद वह नाम इतना प्रसिद्ध हुआ कि सुभाष चन्द्र गुप्ता हमेशा के लिए ‘मुद्राराक्षस’ के रूप में ही जाने जाने लगे।

मुद्राराक्षस (जन्म ; 21 जून 1933 – 13 जून 2016) एक भारतीय लेखक, पत्रकार, कार्यकर्ता और आलोचक थे। लखनऊ में रहने वाले , वे हिंदी साहित्य और समकालीन विचार में एक प्रमुख व्यक्ति थे, जिन्हें दलितों और हाशिए पर पड़े समुदायों के लिए उनकी वकालत के लिए पहचाना जाता था। मुद्राराक्षस भारतीय कलाओं में बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे, विशेष रूप से अवधी लोक कला रूपों जैसे नौटंकी, भांड, स्वांग और भर्तरी पर उनका विशेष ध्यान था। छह दशकों के अपने करियर में उन्होंने 60 से अधिक पुस्तकें लिखीं और लगभग 30 नाट्य प्रस्तुतियों का निर्देशन किया। उनके साहित्यिक कार्यों में अक्सर सामाजिक न्याय, आलोचनात्मक सिद्धांत और अल्पसंख्यकों के अधिकारों जैसे विषय शामिल होते थे। उन्होंने हिंदी पत्रिका अनुवार्ता के संपादक के रूप में भी कार्य किया। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में आलोचना सम्बन्धी नियमित लेखन करते रहे। ‘ज्ञानोदय’ नाम की पत्रिका का इन्होंने सम्पादन भी किया। लंबी बीमारी के बाद 83 वर्ष की उम्र में 13 जून 2016 को लखनऊ में निधन हुआ।

देखा जाए तो मुद्राराक्षस शूद्रों के चित्रकार थे। वे ताजिंदगी बदहाल, फटेहाल, तंगोतबाह शूद्रों के चित्र बनाते रहे। शूद्रों के चित्र कभी पूरे नहीं हुए। जिंदगी पूरी हो गई। मुद्राराक्षस के लिए शूद्र वैसे ही थे, जैसे तुलसीदास के लिए राम। तुलसी ने रामकथा को न जाने कितने रूपों में, कितनी विधाओं में, कितने तरीकों से लिखा है! कभी कवित्त में, कभी सवैया में, कभी बरवै में और कभी दोहा-चौपाई में अनेक। मुद्राराक्षस ने भी शूद्रों की कथा को न जाने कितने रूपों में, कितनी विधाओं में, कितने तरीकों से लिखा है ! कभी नाटकों में, कभी उपन्यासों में, कभी संस्मरणों में, कभी कहानियों में – अनेक। कई-कई कोणों से शूद्रों के कई-कई चित्र बनाए हैं मुद्राराक्षस ने।

आप मुद्राराक्षस का उपन्यास ” नारकीय ” पढ़ लीजिए। लेखकीय यात्रा के अनुभव का दस्तावेज है ” नारकीय। यशपाल के घर सभी लेखकों को चाय मिलती है, शूद्र लेखक मुद्राराक्षस को नहीं। मुद्राराक्षस के कालातीत में भी असाधारण और सबसे अलग संस्मरण दर्ज हैं। कैसे कोई द्विज इतिहास में दाखिल होता है और कैसे किसी शूद्र को इतिहास में दाखिल होने से रोका जाता है?

आप मुद्राराक्षस की ‘नई सदी की पहचान – दलित कहानियाँ’ पढ़ लीजिए। शूद्र-जीवन केंद्र में है। भूमिका में मुद्राराक्षस ने शूद्रों का जो संक्षिप्त इतिहास लिखा है, वह मनोमस्तिष्क को झकझोर देनेवाला है। आप मुद्राराक्षस के अनेक निबंध पढ़ लीजिए, मिसाल के तौर पर शास्त्र – कुपाठ और स्त्री, अशोक के राष्ट्रीय चिन्हों पर सवाल, बौद्धों की अयोध्या का प्रश्न, ज्ञान – विज्ञान और सवर्ण, भारत और पेरियार, बुद्ध के पुनर्पाठ का समय आदि। ये सभी निबंध सबूत हैं कि मुद्राराक्षस शूद्राचार्य थे। मुद्राराक्षस की एक पुस्तक है – “धर्म-ग्रंथों का पुनर्पाठ”। वेदों से लेकर शंकराचार्य तक के ग्रंथों का तेज- तर्रार विवेचन-विश्लेषण, तर्काश्रित मुहावरे और तथ्यों के प्रति बेबाक दृष्टिकोण!

मुद्राराक्षस समझौता परस्त नहीं थे। गिरिजाकुमार माथुर से भिड़ गए , दिनकर की उर्वशी की खाल उतार ली, भगवतीचरण शर्मा को जनसंघी कहा, प्रेमचंद को दलितविरोधी का तमगा दिया, लोहिया को फासिस्ट और अमृतलाल नागर को बेकार उपन्यासकार बताया। मुद्राराक्षस चौतरफा मोर्चा खोले थे। सामाजिक क्षेत्र में जो काम फुले ने किया, राजनीतिक क्षेत्र में जो काम आंबेडकर ने किया, वही काम साहित्य के क्षेत्र में मुद्राराक्षस ने किया।

वह संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार और संगीत नाटक अकादमी रत्न सदस्यता के प्राप्तकर्ता थे। अन्य सम्मानों में साहित्य भूषण, कैफ़ी आज़मी पुरस्कार और सर्वोदय साहित्य पुरस्कार से वह सम्मानित हुए।सामाजिक और सांस्कृतिक क्षेत्र में उनके योगदान को मान्यता देते हुए उन्हें दलित रत्न, शूद्राचार्य और लोक नाट्य शिरोमणि जैसी उपाधियाँ प्रदान की गईं।

मुद्राराक्षस एक विपुल लेखक थे, जिन्होंने नाटक, उपन्यास, लघु कथाएँ, व्यंग्य, साहित्यिक आलोचना और बाल साहित्य सहित विभिन्न साहित्यिक विधाओं में योगदान दिया। उनकी रचनाएँ सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों के प्रति उनके गहन चिंतन को दर्शाती हैं।

तो मुद्राराक्षस को पढ़कर वर्तमान राजनीति का चेहरा भी पढ़ा जा सकता है। किस तरह अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिए राजनैतिक विभीषणों की तलाश कर सफलता का इतिहास रचा जाता है,यह वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में भी बड़ा दिलचस्प पहलू है। हालांकि इसकी व्याख्या अलग-अलग पहलुओं से भी देखने को मिल सकती है। वैसे देखा जाए तो मुद्राराक्षस की जरूरत कल भी थी, आज भी है और कल भी रहेगी… जिनका लेखन हम सभी को वंचित वर्ग के करीब ले जाता है। यह अवसर ही है कि 21 जून उनका जन्मदिन है, तो सभी की तरफ से जन्म जयंती पर हम सुभाष चन्द्र गुप्ता यानि मुद्राराक्षस का स्मरण करते हैं…।

 

 

 

लेखक के बारे में –

कौशल किशोर चतुर्वेदी मध्यप्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार हैं। प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में पिछले ढ़ाई दशक से सक्रिय हैं। पांच पुस्तकों व्यंग्य संग्रह “मोटे पतरे सबई तो बिकाऊ हैं”, पुस्तक “द बिगेस्ट अचीवर शिवराज”, ” सबका कमल” और काव्य संग्रह “जीवन राग” के लेखक हैं। वहीं काव्य संग्रह “अष्टछाप के अर्वाचीन कवि” में एक कवि के रूप में शामिल हैं। इन्होंने स्तंभकार के बतौर अपनी विशेष पहचान बनाई है।

वर्तमान में भोपाल और इंदौर से प्रकाशित दैनिक समाचार पत्र “एलएन स्टार” में कार्यकारी संपादक हैं। इससे पहले इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में एसीएन भारत न्यूज चैनल में स्टेट हेड, स्वराज एक्सप्रेस नेशनल न्यूज चैनल में मध्यप्रदेश‌ संवाददाता, ईटीवी मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ में संवाददाता रह चुके हैं। प्रिंट मीडिया में दैनिक समाचार पत्र राजस्थान पत्रिका में राजनैतिक एवं प्रशासनिक संवाददाता, भास्कर में प्रशासनिक संवाददाता, दैनिक जागरण में संवाददाता, लोकमत समाचार में इंदौर ब्यूरो चीफ दायित्वों का निर्वहन कर चुके हैं। नई दुनिया, नवभारत, चौथा संसार सहित अन्य अखबारों के लिए स्वतंत्र पत्रकार के तौर पर कार्य कर चुके हैं।