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लेकिन अब घूंघट और हिजाब जैसी परंपरा का पालन इस्लामी देशों में भी घटता जा रहा है। अब से 50-55 साल पहले जब मैं काबुल विश्वविद्यालय में अनुसंधान कर रहा था तब मैं देखता था कि अफगान छात्राएँ इतने छोटे-छोटे स्कर्ट पहनकर आती थीं कि वैसे स्कर्ट मैंने रूस, यूरोप और अमेरिका में भी नहीं देखे।
ऐसी अश्लील और आपत्तिजनक वेशभूषाओं का कोई समर्थन कैसे कर सकता है लेकिन घूंघट और हिजाब को इस श्रेणी में नहीं रखा जा सकता है। घूंघट और हिजाब का प्रावधान किसी भी धर्मग्रंथ में नहीं है। कुरान शरीफ के अध्याय (सिपारा) 33 की आयत 59 में सिर्फ यही कहा गया है कि अपने घर की महिलाओं से कहिए कि जब वे बाहर निकलें तो अपने अंगों को ढककर रखें ताकि लोग उन्हें तंग न करें। वे बाहरी लोगों के सामने अपनी नज़रें नीची रखें। (सिपारा 24, आयत31). कुरान में यह जो कहा गया, वह बिल्कुल उचित था, क्योंकि उस वक्त के अरब देशों में मर्द अपनी मर्यादा का उल्लंघन करने में ज्यादा संकोच नहीं करते थे। वेशभूषा में परिवार की स्त्रियों को विशेष सावधानी बरतने के लिए इसलिए भी कहा जाता था कि उस जमाने में स्वेच्छाचारी स्त्रियाँ अल्पभूषा से ही अपना काम-धंधा चलाती थीं।
भारत में पर्दा-प्रथा कहां थी? यह भी कुछ सदियों पहले ही चली। खास तौर से विदेशी आक्रमणकारियों के काल से! कई संत कवियों और महर्षि दयानंद ने पर्दा-प्रथा का डटकर विरोध किया। यहां यह सवाल भी उठ सकता है कि जब हम स्त्री-पुरुष समानता की बात करते हैं तो सिर्फ स्त्रियों पर इस तरह के अतिरंजित बंधन क्यों थोपना चाहते हैं? वे अपने अंगों की प्रदर्शनी न सजाएँ, यह तो ठीक है लेकिन वे अपनी पहचान भी क्यों छिपाएँ? बुर्का, घूंघट, पर्दा, हिजाब और नक़ाब तो उनके चेहरे को भी ढक लेते हैं। बुर्के का इस्तेमाल करते हुए बहुत-से चोर, ठग और अन्य अपराधी भी कई बार इस्लामी देशों में पकड़े गए हैं। पाकिस्तान की लाल मस्जिद पर जब फौज ने छापा मारा था तो उसके इमाम बुर्के में खुद को छिपाकर भाग निकले थे।
यदि कोई कुछ नहीं पहनकर बाहर निकले तो वह आपत्तिजनक जरुर है (दिगंबर जैन संतों के अलावा) लेकिन कोई किसी भी रंग का, शैली का, आकार का, कीमत का कपड़ा पहने तो उसमें आपत्ति का कोई कारण नहीं बनता। यदि मुसलमान स्त्रियां बुर्का पहनें, हिंदू स्त्रियां घूंघट काढ़ें और माथे पर सिंदूर लगाएं, सिख पुरुष पगड़ी और केश रखें, हिंदू पुरुष चोटी-जनेऊ पहनें तो किसी को भी कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। भारत में धोती, पाजामा, लुंगी, पेंट, चादर, अंगोछा आदि अधोवस्त्रों के कई रुप प्रचलित हैं। लेकिन शिक्षा-संस्थाओं को ऐसे दिखावटी प्रकट-चिन्हों से मुक्त रखा जा सके तो अच्छा ही है, जो जाति, पंथ या मजहब की डोंडी पीटते हैं। इसीलिए भारतीय गुरुकुलों में समस्त ब्रह्मचारियों की वेशभूषा एक-जैसी ही होती थी। यूनान के दार्शनिक प्लेटो की ‘एकेडमी’ और अरस्तू की ‘लीसीएम’ में छात्रों की वेशभूषा भी एक जैसी ही होती थी, चाहे वे किसी राजपरिवार के ही क्यों न हों। सांदीपनि आश्रम में क्या कृष्ण और सुदामा अलग-अलग वेषभूषा में रहते थे?
लोग अपने घर और बाजार में जैसी वेशभूषा पहनना चाहें, पहनें। उन्हें कौन रोक सकता है? लेकिन शिक्षा-संस्थाओं में सबकी वेशभूषा एक-जैसी हो तो उसके कई लाभ हैं। बचपन से हमारे लोगों में समता और सादगी का भाव पनपेगा। अमीरी की उच्चता ग्रंथि और गरीबी की हीनता ग्रंथि का भाव बच्चों में दूरियां पैदा नहीं करेगा। जो लड़कियां हिजाब पहनेंगी, वे अपने मुसलमान होने का डंका पीटती चलेंगी। तो फिर भगवा दुपट्टा और नीला गुलूबंद भी दिखाई पड़ेगा। यह अलगाववाद चाहे मजहबी हो, जातीय हो या आर्थिक हो, कम से कम शिक्षा-संस्थाओं में तो नहीं होना चाहिए। यदि मुस्लिम लड़कियां हिजाब नहीं पहनेंगी तो क्या उनके इस्लामी होने में कुछ कमी आ जाएगी? कतई नहीं। मैं जब इंदौर के क्रिश्चियन काॅलेज में पढ़ता था तो ब्रह्मचारी के नाते खड़ाऊ पहना करता था। जब प्राचार्य सी. डब्ल्यू. डेविड ने उसकी खट-खट पर आपत्ति की तो मैं उसे उतारकर नंगे पांव ही कालेज में प्रवेश करता था। तब क्या मेरा ब्रह्मचर्य भंग हो गया था?
हम छात्रों की वेशभूषा एक-जैसी कर लें, जब भी अलगाव की समस्या तो बनी रहेगी। उसे घटाने के लिए यह भी किया जा सकता है कि सारे भारतीय अपने खान-पान और नामकरण में भी मोटी-मोटी एकरुपता लाने की कोशिश करें। इसका अर्थ यह नहीं कि सभी लोग धोती-कुर्त्ता पहनें, सभी लोग दाल-रोटी खाएं और सभी लोग अपने नाम संस्कृत या हिंदी में रखें। हर क्षेत्र में विविधता कायम रहे लेकिन मुसलमानों के नाम सिर्फ अरबी में, ईसाइयों के नाम सिर्फ इंगलिश में और यहूदियों के नाम सिर्फ हिब्रू में क्यों रहें? वे अरबों, अंग्रेजों और इस्राइलियों की नकल क्यों करें? वे अपने नाम अपनी मातृभाषाओं में क्यों नहीं रखें? सबके नाम ऐसे हों, जो कि जाति या मजहब की डोंडी न पीटते हों। यदि ऐसा होगा तो देश में अन्तरजातीय और अन्तरधार्मिक विवाहों की संख्या करोड़ों में पहुंचेगी और भारत की एकता इस्पाती बनेगी। मैंने इंडोनेशियाई मुसलमानों के नाम संस्कृत में देखे हैं। उसके राष्ट्रपति का नाम सुकर्ण था और उनकी बेटी का नाम मेघावती है।
इसी प्रकार यदि हमारे मुसलमान ईसाई और सिख भाई मांसाहार छोड़ दें तो करोड़ों मांसाहारी हिंदुओं के लिए वे प्रेरणा-स्त्रोत बन सकते हैं। बाइबिल और कुरान में एक भी पंक्ति ऐसी नहीं है, जो कहती हो कि जो मांस नहीं खाएगा, वह घटिया ईसाई या घटिया मुसलमान बन जाएगा। स्वनामी और शाकाहारी होकर भी स्वधर्मी ही रहेंगे, साथ ही बेहतर इंसान और बेहतर भारतीय भी बन जाएंगे।