
Film Review: थोड़ी हकीकत, ज्यादा फ़साना : ‘गवर्नर.’
प्रकाश हिन्दुस्तानी
‘द केरल स्टोरी’ फेम विपुल शाह की नई फिल्म ‘गवर्नर’ भारतीय रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर एस. वेंकिटरमनन के कार्यकाल और उनके जीवन पर आधारित है। फिल्म को ‘फाइनेंशियल और पॉलिटिकल थ्रिलर’ के रूप में प्रचारित किया गया है।
कहानी दिखाती है कि जब देश के पास महज दो-तीन हफ्तों के आयात के लिए एक बिलियन डॉलर से भी कम का विदेशी मुद्रा भंडार बचा था, तब दिवालिया होने से बचने के लिए भारत को अपना सोना गिरवी रखना पड़ा।
उस दौर की, जब देश के आर्थिक हालात अच्छे नहीं थे और देश का 67 टन सोना भौतिक रूप से विदेश भेजना और गिरवी रखना पड़ा था। कहानी 1990 – 91 के उस दौर की है, जब देश गहरे आर्थिक संकट से जूझ रहा था। उस समय पहले चंद्रशेखर और बाद में पी. वी. नरसिम्हा राव प्रधानमंत्री बने। चंद्रशेखर सरकार में यशवंत सिन्हा वित्त मंत्री थे, तो नरसिम्हा राव सरकार में यह जिम्मेदारी डॉ. मनमोहन सिंह के पास थी। देश का राजकोषीय घाटा 8 .4 प्रतिशत तक पहुंच गया था। खर्च चलाने के लिए सरकार घरेलू और विदेशी कर्जों पर निर्भर थी। भारत का आयात निर्यात के मुकाबले बहुत ज्यादा था, जिससे ‘भुगतान संतुलन’ का गंभीर संकट खड़ा हो गया था।
रही-सही कसर ईरान इराक के खाड़ी युद्ध ने पूरी कर दी थी । कच्चे तेल की कीमतें आसमान छूने लगीं और खाड़ी देशों में काम करने वाले लाखों भारतीयों के वापस लौटने से ‘रेमिटेंस’ (विदेशी मुद्रा का आना ) लगभग बंद हो गया। विदेशी निवेशकों का भरोसा टूट चुका था और वे भारतीय बाजार से अपना पैसा निकाल रहे थे। एक बंद अर्थव्यवस्था के बीच सरकार के पास रोजमर्रा का कामकाज चलाने के लिए भी पैसे नहीं बचे थे।
राजनीतिक तूफान और मीडिया की नजरों से बचाकर, बड़ी चतुराई से 67 टन सोना विदेश भेजा गया। इसमें से 20 टन सोना ‘यूनियन बैंक ऑफ स्विट्जरलैंड’ को री-पर्चेज एग्रीमेंट के तहत और 46.5 टन सोना ‘बैंक ऑफ इंग्लैंड’ व ‘बैंक ऑफ जापान’ के पास गिरवी रखा गया। इस विशाल भंडार को भौतिक रूप से एयरलिफ्ट करना एक बेहद जोखिम भरा काम था। फिल्म का दावा है कि 1991 के ऐतिहासिक आर्थिक सुधारों की नींव इसी फैसले से पड़ी थी। फिल्म का एक मुख्य संवाद है—”इफ आई फेल, इंडिया फेल्स।”
सिनेमाई स्वतंत्रता के नाम पर निर्देशक चिन्मय मांडलेकर ने कहानी को बहुत ज्यादा तोड़ा-मरोड़ा है, जिससे फिल्म में कई गंभीर और हास्यास्पद गलतियां हैं.
एक दृश्य में एक वरिष्ठ आईएएस अधिकारी को ‘सेंचुरियन बैंक’ जाकर अपने लॉकर में सोना रखते हुए दिखाया गया है। यह बेहद हास्यास्पद है, क्योंकि सेंचुरियन बैंक की स्थापना 30 जून 1994 को हुई थी, जबकि फिल्म की टाइमलाइन 1990-91 की है। (ज्ञात हो कि सेंचुरियन बैंक का बाद में बैंक ऑफ पंजाब और अंततः एचडीएफसी बैंक में विलय हो गया था)।
आरबीआई गवर्नर जैसे गरिमामयी और शक्तिशाली पद को एक ‘छोटे बाबू’ की तरह लाचार दिखाया गया है। वह दिल्ली का टिकट कटवाने के लिए खुद ऑफिस सुपरीटेंडेंट के चक्कर काट रहे हैं। क्या देश के केंद्रीय बैंक के गवर्नर के पास अपना पर्सनल स्टाफ, पीए या सेक्रेटरी नहीं होते?
फिल्म में आत्मदाह के दृश्य और जबरदस्ती ठूंसी गई आर्थिक शब्दावली कहानी की रफ्तार को रोकती है। साथ ही, पत्रकार के रूप में अदा शर्मा का किरदार बेहद अस्वाभाविक और गैर-जरूरी लगता है।
एस. वेंकिटरमनन को भारतीय अर्थव्यवस्था का ‘साइलेंट सेविअर’ (मूक रक्षक) कहा जाता है, जिन्होंने बिना किसी शोर-शराबे के देश को डिफ़ॉल्टर होने से बचाया। लेकिन फिल्म मेकर्स ने इस गंभीर विषय को जरूरत से ज्यादा लाउड और अति-नाटकीय बना दिया है। दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में जो वास्तविक और दिलचस्प घटनाक्रम घट रहा था, उसे दिखाने के बजाय फिल्म सतही और काल्पनिक ड्रामे में उलझ कर रह गई है।
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