लोक परम्परा – वैशाख में जल दान

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लोक परम्परा – वैशाख में जल दान

डॉ. सुमन चौरे
चइत मास की रवानगी के दिन जैसे-जैसे नज़दीक आते हैं , कुम्हारेण मावसी की  गली  की ओर लोगों के कदम  बढ़ने  लगते हैं।  है ना दान पुण्य का रिश्ता वैशाख से।  वैशाख मास की पड़वा लगे उसके  पहले ही  लोगों की आस्था रहती है भगवान् भोले भण्डारी के ऊपर जलधारा का प्रवाह शुरु   होने लगे।कोई तो रात को ही  गळती की  तैयारी कर लेता, तो कोई भोर भुनसारे   कुम्हार काका को खाट पर उठाकर कहता, "भाई, तू मुड़ो पोछऽ धोवजे, पैलऽ मखऽ शिव-शंकर  पर जळ डाळनऽ खऽ गळती दऽ।वैशाख की पड़वा लगी गइज।” शिवलिंग के ऊपर जलधार के लिए ‘गळती’ बनाई जाती है। ऐसा कुम्भ जिसके पेंदे में बारीक छेद रहता है। इसमें से नाड़ा (सूत का पवित्र डोरा) अंदर से बाहर की ओरलटकाया जाता है। इससे गळती का जल धीरे-धीरे नीचे जाता है। दुग्ध अभिषेक के समय दूर्वा कागुच्छ या फिर बेल पत्ती की डाँड भी गळती में लगाई जाती है।

लोक परम्पराऐं हमारे समाजिक जीवन का  व्यवहारिक आधार हैं। लोकमान्यता है कि हमारे  हमारे नित्य आचार-विचार व्यवहार में जो भी कमी बेशी होती है तो वैशाख मास में  भोले भंडारी का  मिट्टीके कुम्भ के शीतलजल से   अभिषेक करें और मिट्टी का कुम्भ जल भर कर दान करें।  लोक इस मास को शिव मास भी कहता है। निर्मल मन से शिव शंकर पर  जल चढ़ाओ तो भोला भंडारी तुरन्तप्रसन्न हो जाते है। कुछ लोग अक्षय तृतीया से शंकरजी पर गळती से जल धार शुरु करते हैं। अक्षयतृतीया पर जल भरे कुम्भ का दान करने को बड़ा पुण्यदायी माना जाता है।जल कुम्भ दान से संबंधी एक लोक कथा भी है। लोक कथाएँ  एक रोचक माध्यम है किसी भी गूड़ सेगूड़  विषय को समझाने का।

एक राजा थो। थो तो बड़ो ज्ञानी-मानी। पण सात राणी का रह्यत, एक भी  औलाद नी। राजा फिकर मेंरहता था, संतान के  बिना  कौन राज-पाठ  सम्हालेगा?   एक दिन एक  साधु आया उसने राजा से कहा -;राजन् एक तो जल संचय के लिए  लोगों के पीने के लिए  अपने राजमहल में  तालाब  खुदवाओ और जनता को महल के तालाब से जल भरने दो। और मार्ग के  दोनों ओर फलदार-छायादार  वृक्ष लगाओ,एक नहीं सातों रानी की गोद में संतान  खेलेगी।साधू ने आगे निर्देश दिए, ;एक और बात सुन राजा नित्य प्रतिदिन  गाँव की निचली बस्ती में  एक-एक दिन  एक-एक  झोपड़ी में  शुद्ध जल का घड़ा उनके  द्वार पर रखकर आना। पर  उन्हें पता न चले कि राजा स्वयं आ कर रखते हैं।  राजा को तो संतान की कामना थी। जल भरा घड़ा रखने का कामकोई कठिन भी नहीं था।    मुझाकळे (सुबह से पहले ही) ही राजा  शुद्ध-शीतल जल का मटका गरीब बस्ती के हरेख घर के द्वार पर में रोज धरता।   बस्ती में चर्चा होती कि ऐसा कौन दानी  है दिखाई तो नहीं देता पर अमरित जा जळ धर जाता है।  चलो भाई जो भी होय  भगवान ओकी एल (बेल) आगे बढ़ाये।  सब ऐसा ही कहते।

राजा के मह्यल में तो  लोग जाने में डरते हैं,  उस पर भी पानी भरने जाना। पहले तो डर-संकोचसब  था, अब तो पनघट का हास-विनोद हो तो।  अपने  बच्चों को गोद में तो काँधे पर बैठा कर लाती उनको  लाड़ लड़ाती,  रानियाँ झरोखों  से देखती रहती थीं। धीरे-धीरे वे  उन महिलाओं के बच्चों से   घुल-मिल गई।  उनकी बाल-लीलाओं ने उनके मन में ममता वात्सल्य का बीज बो दिया। महिलाएँ कहतीराजा जी नें अपनी जनता के लिए पानी का दान किया। तालाब खुदवा दिया, राजा की सात  पीढ़ीअम्मर रह्य।   निमाड़ में ऐसी कैणात है कि “लोग   सराप (श्राप) तो मनऽ सी देजऽ पणऽ आसीरवाद
मन सी नी देता" । पर यहाँ  राजा की प्रजा ने आत्मा से आसीरवाद दिया। अगले वैशाख तक सातोंरानियों की गोद  भर गई।  राजा ने  नगर वसियों का आशीर्वाद पाया।   कथा में इस प्रकार जल  दानकी महिमा बताई गई  है।  इसके बाद राजा ने जगह-जगह   शीतल जल के प्याऊ  लगवा दिये।लोक व्यवहार में  अन्न दान और जल दान का बड़ा महत्व है। वैशाख मास में तो स्नान  और दान काबड़ा  पुण्य बताया गया है। इसी मास में आता है सत्तू अम्मोस का पर्व ।  इस दिन भी   सत्तू का दान और  शीतल जल से भरे माटी के कुंभ   घट के दान की बड़ी महिमा है।

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अक्षय तृतीया के दिन  तो अक्षय घट भर जाता है। इस दिन जल के साथ इमली का इमलाना  और खरबूज का भी दान किया जाता है। मंदिर, ब्राह्मण, बहन – भाणेज, गरीबों  सबको  भोजन कराना  और जलघट दान करना लोकपरम्परा का अंग है।हमारे लोक  पर्वों की रीतियाँ शास्त्रोक्त विधियों से भी अधिक विस्तारित मानी जाती हैं। लोकपरम्पराएँ अनुभवों से अर्जित होती हैं और शास्त्रों से अपरिचित लोक अनुभवों पर विश्वास कर आगेबढ़ता है। अक्षय तृतीया  पर हिमालयों के धामों भगवान् बद्रीनाथजी और महादेव केदारनाथजी केमन्दिरों पट  पारम्परिक रीतियों से खुलते हैं। तीर्थ यात्रा पर निकला लोक दर्शन करने के बाद गंगामाई जल अवश्य लाता है।  फिर सागर तट पर भगवान् रामेश्वरम् जी पर चढ़ाता है। बाद में उचित समयके अनुसार गंगापूजन का आयोजन करता है। अधिकतर लोग गंगा पूजन का विशाल स्तर परआयोजन करते हैं। प्राय: गंगा पूजन वैशाख मास  में ही करते हैं। सभी नाते रिश्तेदारों और पूरे गाँवको निमंत्रण दिया जाता है। गंगा माई का जल श्रद्धापूर्वक सभी को प्रसाद स्वरूप वितरित किया  है। ग्रीष्म ऋतु के ताप के बीच लोक वैशाख मास में गहरी आस्था से  दान-पुण करते हैं।

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डॉ. सुमन चौरे, लोक संस्कृतिविद्-लोक साहित्यकार