
Indore: शादी का कार्ड आया है… जाम में फंसने की तैयारी कर लो!
अभिषेक मिश्रा की विशेष रिपोर्ट
इंदौर: इंदौर में शादी का कार्ड अब खुशी की सूचना नहीं रहा, वह एक चेतावनी बन चुका है। कार्ड हाथ में आते ही पहला ख्याल यह नहीं आता कि “कौन-सा कपड़ा पहनें”, बल्कि यह आता है कि कितने घंटे पहले निकलना पड़ेगा?।
शहर में वैवाहिक मुहूर्त शुरू होते ही ट्रैफिक ऐसी हालत में पहुंच जाता है कि लोगों को शादी में शामिल होने से ज़्यादा, वहां पहुंचने की चिंता सताने लगती है। बायपास इसका सबसे बड़ा और सबसे स्पष्ट उदाहरण है। यहां दर्जनों मैरिज गार्डन हैं, लेकिन ट्रैफिक और पार्किंग की कोई ठोस व्यवस्था नहीं। नतीजा यह कि सड़क ही पार्किंग बन जाती है।
अन्य क्षेत्रों में भी देखें तो गार्डन के मेहमान सड़क के एक तरफ, दूसरे गार्डन के मेहमान दूसरी तरफ और बीच में फंसी आम जनता..जो न शादी में जा रही है, न किसी जश्न का हिस्सा है, बस घर से दफ्तर या अन्य जरूरी काम के लिए निकली है।
जब बारात निकलती है, तो पूरा इलाका रुक जाता है। कोई वैकल्पिक मार्ग नहीं, कोई ट्रैफिक प्लान नहीं,सिर्फ खड़े रहिए और इंतज़ार कीजिए। यह स्थिति लोगों को गुस्सा दिलाती है, लेकिन उससे अधिक बेबस भी करती है। लोग कार में बैठे-बैठे घड़ी देखते हैं, मोबाइल में रास्ता खोजते हैं और आखिर में एक-दूसरे से यही कहते हैं “क्या ही करें”..बस यही वाक्य शहर की सबसे बड़ी हार है। क्योंकि जब अव्यवस्था को सामान्य मान लिया जाए, तब सुधार की उम्मीद भी दम तोड़ देती है।
शहर के बाकी हिस्सों का हाल भी अलग नहीं। विजय नगर, पलासिया, भंवरकुआं, राजवाड़ा..हर जगह रोजाना ट्रैफिक दम तोड़ देता है। ऑटो और ई-रिक्शा जहां मन किया रुक जाते हैं, निजी वाहन आधी सड़क घेर लेते हैं और ट्रैफिक पुलिस सीमित संसाधनों के साथ भीड़ के सामने असहाय नज़र आती है। एंबुलेंस का सायरन सुनकर लोग रास्ता बनाना चाहते हैं, लेकिन गाड़ियां हिलने की जगह में ही नहीं होतीं।
आम नागरिक के मन में साफ सवाल है कि क्या शहर के जवाबदारों को यह पता नहीं होता कि शादी का सीजन आ रहा है? क्या जिम्मेदारों को यह मालूम नहीं कि बायपास पर कहां-कहां गार्डन हैं? अगर सब पता है, तो फिर हर साल वही जाम, वही अव्यवस्था और वही मजबूरी क्यों? सड़कें सार्वजनिक हैं, लेकिन उन्हें निजी आयोजनों के भरोसे छोड़ दिया गया है।
वैसे तो इंदौर स्मार्ट सिटी कहलाता है, लेकिन जब नागरिक की सबसे बुनियादी जरूरत यानी समय पर और सुरक्षित पहुंचना ही पूरी न हो, तो स्मार्टनेस के दावे खोखले लगते हैं। शहर का विकास सिर्फ इमारतों से नहीं मापा जाता, वह इस बात से मापा जाता है कि आम आदमी को रोज़मर्रा की जिंदगी में कितनी राहत मिलती है।
इंदौर में ट्रैफिक अब किसी एक मौसम, एक सड़क या एक शादी की समस्या नहीं रहा। यह शहर की रोज़मर्रा की हकीकत बन चुका है। जाम अब अपवाद नहीं, आदत है. जिसे हर नागरिक चुपचाप स्वीकार करता जा रहा है। सड़क पर निकलते ही समय हाथ से फिसल जाता है, धैर्य टूटता है और भरोसा भी। सवाल सिर्फ शादियों का नहीं, शहर की उस व्यवस्था का है जो भीड़ को तो पहचानती है, लेकिन समाधान से हमेशा एक कदम पीछे रह जाती है।
अगर इंदौर को सचमुच रहने लायक शहर बनाना है, तो ट्रैफिक को ‘मैनेज’ नहीं, ‘समझना’ होगा। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि जब किसी शहर में खुशी और जरूरत तक पहुंचने के रास्ते तंग हो जाएं, तो समझ लीजिए ट्रैफिक नहीं रुका है,बल्कि व्यवस्थाएं ही ठहर गई है।_
( प्रतीकात्मक छायाचित्र)





