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कानून और न्याय: महिला आरक्षण बिल के प्रावधानों पर चर्चा जरूरी!

कानून और न्याय: महिला आरक्षण बिल के प्रावधानों पर चर्चा जरूरी!

लोकसभा के दोनों सदनों में विशेष सत्र के दौरान महिला आरक्षण विधेयक पेश किया गया। दोनों ही सदनों ने इसे मंजूरी दे दी। अब राष्ट्रपति ने भी इस पर स्वीकृति की मुहर लगाकर महिलाओं के हित में एक बड़ा बदलाव कर दिया। लोकसभा, राज्य विधानसभाओं और दिल्ली विधानसभा में महिलाओं के लिए सभी सीटों में से एक तिहाई सीटें आरक्षित करने का प्रस्ताव पारित कर दिया। अब राष्ट्रपति ने भी इस संविधान संशोधन बिल पर दस्तखत करके मंजूरी दे दी। इस मसले का एक लंबा इतिहास रहा है। नरसिंह राव एवं अटल बिहारी वाजपेई के जमाने से इसे पारित कराने के प्रयास चल रहे थे। दोनों ही प्रधानमंत्रियों ने अपने-अपने स्तर पर इसे पारित कराने के भरसक प्रयास किए। राजीव गांधी का भी इस बिल को पास कराना सपना था। सभी दल इस बिल के लिए क्रेडिट लेना चाह रहे हैं।

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लेकिन, यह दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति यह है कि इस बिल में क्या प्रावधान है, इस पर चर्चा नहीं कर रहा है। सभी इस बिल को तुरंत लागू करने की मांग कर रहे हैं। जबकि, मांग करने वाले भी यह जानते हैं कि संविधान संशोधन की एक निश्चित प्रक्रिया है और उसके बगैर इसे लागू नहीं किया जा सकता है। भारत में संविधान संशोधन संसद के विशेष बहुमत और राज्यों की सहमति से ही संभव है। इसके लिये 50 प्रतिशत से अधिक राज्यों का गठन करने वाला बहुमत माना जाता है। संविधान के ऐसे प्रावधान के लिए संसद के प्रत्येक सदन द्वारा उस सदन की कुल सदस्यों के बहुमत से और उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के कम से कम 2/3 बहुमत से एक संशोधन विधेयक पारित किया जा सकता है। यह प्रक्रिया तो हो चुकी है। दोनों सदनों में यह संविधान संशोधन लगभग सर्वसम्मति से पारित हो चुका है। लेकिन, साथ ही संशोधन को कम से कम आधे राज्यों के राज्य विधानमंडल द्वारा साधारण बहुमत से अनुमोदित किया जाना आवश्यक है। यह प्रक्रिया अभी होना है तथा इसमें काफी समय लगेगा।

पिछली बार संसद के निचले सदन, राज्य विधानसभाओं और दिल्ली विधानसभा में महिलाओं के लिए सीटें आरक्षित करने का विधेयक एक दशक पहले पेश किया गया था, जब संविधान (108वां संशोधन) विधेयक, 2008 राज्यसभा में पारित किया गया था। हालांकि, यह विधेयक 15वीं लोकसभा (2009-14) के विघटन के बाद समाप्त हो गया था। 2008 के विधेयक में तीन संवैधानिक प्रावधानों में संशोधन का प्रस्ताव किया गया था। अनुच्छेद 239 एए (दिल्ली के संबंध में विशेष प्रावधान), अनुच्छेद 331 (लोगों के सदन में एंग्लो-इंडियन समुदाय का प्रतिनिधित्व), और अनुच्छेद 333 (एंग्लो-इंडियन समुदाय का प्रतिनिधित्व) राज्यों की विधान सभाओं में। इसके अतिरिक्त, इसने तीन नए अनुच्छेद पेश किए, अर्थात अनुच्छेद 330 ए, 332 ए और 334ए।

पहले दो नए प्रस्तावित लेखों में लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए आरक्षण शुरू करने की मांग की गई थी, जबकि अंतिम बिल के ड्राफ्ट में इस सकारात्मक नीति को 15 साल की अवधि के बाद चरणबद्ध तरीके से समाप्त करने के लिए एक सूर्यास्त खंड भी शामिल है। 2023 का विधेयक संवैधानिक प्रावधान में संशोधन का प्रस्ताव करता है। अनुच्छेद 239 एए (दिल्ली के संबंध में प्रावधान) और तीन नए अनुच्छेद अर्थात अनुच्छेद 330 ए, 332 ए और 334ए को सम्मिलित करना। पहले सदनों यानी लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में 33 प्रतिशत पेश करने की बात करते हैं।

पहले के बिल और अब पेश किए गए संवैधानिक संशोधन बिल के बीच महत्वपूर्ण अंतर यह है कि इसे बिल के अधिनियमन के बाद पहली जनगणना के बाद परिसीमन की कवायद के बाद लागू करने का प्रस्ताव है। हालांकि सूर्यास्त खंड बरकरार रखा गया है। पिछले विधेयक के विपरीत एंग्लो-इंडियन समुदाय के लिए आरक्षण से संबंधित प्रावधानों को भी अपरिवर्तित छोड़ दिया गया है। इसमें अनुच्छेद 331 और 333 में संषोधन करने की मांग की गई।

कांग्रेस ने संसद में दीर्घ अवधि से लंबित महिला आरक्षण विधेयक को मानसून सत्र से पहले संसद में लाने की मांग की थी। लेकिन सरकार ने एक विशेष सत्र बुलाकर इसे पारित किया। पुराने विधेयक को पहली बार मई 2008 में राज्यसभा में पेश किया गया था और एक स्थायी समिति के पास भेजा गया था। इसे वर्ष 2010 में सदन में पारित किया गया। अंत में लोकसभा को प्रेषित किया गया।

हालांकि यह बिल 15वीं लोकसभा के साथ लैप्स हो गया। इस बिल का मूल विचार एक संवैधानिक संशोधन से उत्पन्न हुआ था। इसे वर्ष 1993 में पारित किया गया था। इस संविधान संशोधन द्वारा प्रावधान किया गया था कि ग्राम पंचायत के सरपंचों की एक-तिहाई संख्या महिलाओं के लिये आरक्षित होनी चाहिये। इस प्रकार के महिला आरक्षण को लोकसभा और राज्य विधानसभाओं तक विस्तारित करने के लिये महिला आरक्षण विधेयक को दीर्घकालिक योजना के रूप में देखा गया था। यह विधेयक लोकसभा और सभी राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत सीटें आरक्षित करता है। आरक्षित सीटों को राज्य या केंद्र शासित प्रदेश के विभिन्न निर्वाचन क्षेत्रों में चक्रीय आधार पर आवंटित किया जा सकता है। इस संशोधन अधिनियम के लागू होने के बाद 15 वर्ष बाद महिलाओं के लिये सीटों का आरक्षण समाप्त हो जाएगा।

ग्लोबल जेंडर गैप रिपोर्ट 2021 के अनुसार, राजनीतिक सशक्तिकरण सूचकांक में भारत के प्रदर्शन में गिरावट आई है। साथ ही महिला मंत्रियों की संख्या वर्ष 2019 के 23.1 प्रतिशत से घटकर वर्ष 2021 में 9.1 प्रतिशत तक पहुंच गई है। सरकार के आर्थिक सर्वेक्षणों में भी यह माना जाता है कि लोकसभा और विधानसभाओं में महिला प्रतिनिधियों की संख्या बहुत कम है। विभिन्न सर्वेक्षणों से संकेत मिलता है कि पंचायती राज संस्थानों में महिला प्रतिनिधियों ने गाॅंवों में समाज के विकास और समग्र कल्याण में सराहनीय कार्य किया है। इनमें से कई निश्चित रूप से बड़े पैमाने पर काम करना चाहेंगी। हालांकि उन्हें भारत में प्रचलित राजनीतिक संरचना में विभिन्न चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। इन चुनौतियों में उचित राजनीतिक षिक्षा की कमी, समाज में महिलाओं की कम वित्तीय शक्ति, यौन हिंसा, असुरक्षित पितृसत्ता की अभिव्यक्ति, पुरूषों और महिलाओं के बीच घरेलू कार्य का असमान वितरण आदि शामिल है। कई ग्रामीण इलाकों में ‘पंचायत पति’ की अवधारणा यानी पंचायती राज संस्थाओं में महिलाओं को प्राॅक्सी के रूप में प्रयोग करना भी काफी प्रचलित है। इस संबंध में सख्त कानून भी शीघ्र ही लाना होगा।

महिला राजनीतिक सशक्तिकरण तीन मूलभूत सिद्धांतों पर आधारित है। महिलाओं और पुरूषों के बीच समानता। महिलाओं को उनकी क्षमता के पूर्ण विकास का अधिकार। महिलाओं के आत्म प्रतिनिधित्व और आत्मनिर्णय का अधिकार। राजनीतिक निर्णयन प्रक्रिया में लैंगिकता संबंधी एक महत्वपूर्ण अंतर विद्यमान है। ऐसे में किशोर लड़कियों को राष्ट्र निर्माण में योगदान करने के लिये प्रेरित करने हेतु महिला नेताओं को आगे आने की आवश्यकता है।

इस कानून के संबंध में यह तर्क दिया गया है कि यह महिलाओं की असमान स्थिति को कायम रखेगा। क्योंकि, उन्हें योग्यता के आधार पर प्रतिस्पर्धी नहीं माना जाएगा। यह भी तर्क दिया जाता है कि यह नीति चुनावी सुधार के बड़े मुद्दों जैसे राजनीति के अपराधीकरण और आंतरिक पार्टी लोकतंत्र से ध्यान भटकाती है। यह महिला उम्मीदवारों के लिये मतदाताओं की पसंद को भी प्रतिबंधित करता है। प्रत्येक चुनाव में आरक्षित निर्वाचन क्षेत्रों के रोटेशन से एक सांसद का अपने निर्वाचन क्षेत्र के लिये काम करने के लिए प्रोत्साहन कम हो सकता है। क्योंकि, वह उस निर्वाचन क्षेत्र से फिर से चुनाव लड़ने के लिए अपात्र हो सकता है। कुछ विषेशज्ञों ने वैकल्पिक तरीकों को अपनाने/बढ़ावा देने का सुझाव दिया है। जैसे राजनीतिक दलों और दोहरे सदस्य निर्वाचन क्षेत्रों में आरक्षण।

पंचायती राज संस्थाओं ने महिला प्रतिनिधियों को जमीनी स्तर पर व्यवस्था में शामिल करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। कई राज्यों ने चुनाव में महिला उम्मीदवारों के लिये 50 प्रतिशत आरक्षण दिया है। पार्टी स्तर पर मौलिक सुधार एक आवश्यक और रणनीतिक पूरक के रूप में काम करेंगे, लेकिन राजनीति में महिलाओं के प्रवेश के लिए राजनीतिक दलों को अपने आंतरिक ढांचे को और अधिक अनुकूल बनाना चाहिए। यहाँ ‘कोटा’ शब्द के भारतीय दृष्टिकोण से रेखांकित करना और अलग करना महत्वपूर्ण है। पश्चिम के विपरीत जहाँ ‘कोटा’ एक बुरा शब्द माना जाता है। भारतीय प्रतिमान में ऐसे कोटा शब्द को सामाजिक लाभ के लिए अमूल्य उपकरण के रूप में देखा गया है। जो सदियों से जारी उत्पीड़न को रोकने के लिए कानून एक उपकरण है। यहाॅं तक कि जब महिलाएं राजनीति में पुरूषों के समान पदों पर होती हैं, तो उन्हें उल्लेखित चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। भारत की जनता के बीच संस्थागत, सामाजिक और व्यवहारिक परिवर्तन लाने की आवश्यकता है। लैंगिक समानता सतत विकास लक्ष्यों का भी एक हिस्सा है। निश्चित ही यह संविधान संशोधन एक क्रांतिकारी परिवर्तन है। यह आशा की जानी चाहिए कि यह संसद में महिला शक्तियों को मजबूत करने में अपना महत्वपूर्ण योगदान देगा तथा ‘मील का पत्थर’ साबित होगा।