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Ram Mandir: ट्रस्ट और सरकार दोनों ने आम आदमी की आस्था को चोट पहुंचाई

Ram Mandir: ट्रस्ट और सरकार दोनों ने आम आदमी की आस्था को चोट पहुंचाई

रंजन श्रीवास्तव

करोड़ों लोगों की आस्था के केंद्र राम मंदिर में दान चोरी नहीं हुआ बल्कि सुनियोजित तरीके से एक ऑर्गनाइज्ड गैंग ने ऑर्गनाइज्ड तरीके से दान पर डकैती डाली. राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के निर्माण प्रमुख तथा प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के पूर्व प्रमुख सचिव नृपेंद्र मिश्रा ने स्वयं इसे डकैती करार दिया है.

विचारधारा से परे हटकर बड़ी संख्या में लोगों का मानना है कि इस डकैती से करोड़ों लोग जिनकी आस्था राम मंदिर से जुड़ी हुई है, आहत हुई है तथा ऐसे गंभीर प्रयासों की जरूरत है जिससे ना सिर्फ दोषियों को सजा मिले बल्कि लोगों की राम मंदिर में आस्था को भी पुनर्स्थापित किया जा सके.

पर यह सोचना या कहना जितना आसान है उसको क्रियान्वित करना उतना ही कठिन है. इसलिए नहीं कि यह असंभव कार्य है बल्कि इसलिए कि दोषियों को चिन्हित करने, उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई करने तथा राम मंदिर की प्रबंधन व्यवस्था को फिर से ठीक करने में ना ही केंद्र सरकार, ना ही राज्य सरकार और ना ही ट्रस्ट गंभीर रूप से प्रयासरत दिखी.

वस्तुतः दान से संबंधित पूरे घोटाले पर शुरू से ही लीपापोती करने के प्रयासों के कारण भी लोगों के मन में यह शंका उत्पन्न हुई कि इस घोटाले में बड़े लोगों का हाथ होने से ही ट्रस्ट या राज्य सरकार या केंद्र सरकार दोषियों को चिह्नित करने और उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई करने में उदासीन दिख रही है.

शुरुआत ट्रस्ट से ही करते हैं.

यह संभव नहीं है कि ट्रस्ट के जिम्मेदार पदों पर बैठे लोगों को इतनी बड़ी ऑर्गनाइज्ड डकैती के बारे में भनक नहीं लगी हो. ऐसे कुछ व्यक्ति सामने आए हैं कि जब उन्होंने ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय से दान से संबंधित गड़बड़ियों के बारे में कुछ खास व्यक्तियों की तरफ़ इंगित किया तो उन व्यक्तियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई करने की बजाय शिकायतकर्ता को ही व्यवस्था से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया. दान की राशि के प्रबंधन में चंपत राय के पसंदीदा व्यक्तियों का ही दख़ल था.

राम मंदिर के लिए आंदोलन से लेकर राम मंदिर के निर्माण में चंपत राय जो कि संघ के प्रचारक भी हैं, एक प्रमुख केंद्र बिंदु की तरह थे जिन पर संघ, विश्व हिन्दू परिषद तथा भाजपा का अटूट विश्वास था. यही कारण था कि राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट में सर्वाधिक प्रमुख जिम्मेदारी उन्हीं को दी गई. और यही कारण था कि राम मंदिर के प्रबन्धन में जो नियुक्तियां होती थीं उन नियुक्तियों के लिए चंपत राय का आशीर्वाद जरूरी था.

अगर हम मान भी लें कि चंपत राय का दान की डकैती में परोक्ष या अपरोक्ष कोई भी भूमिका नहीं थी तो दान की चोरी का पता चलने पर उनको आगे बढ़कर स्वयं पुलिस थाने में प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करवानी चाहिए थी और तत्काल ही संदिग्ध व्यक्तियों के खिलाफ ट्रस्ट के स्तर पर कार्रवाई करना चाहिए था. चंपत राय का क़द और बढ़ जाता अगर घटना की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए वे महाघोटाले के सामने आने के बाद अपने पद से त्यागपत्र दे देते.

पर चंपत राय ने कुछ भी ऐसा नहीं किया बल्कि वे पद पर चिपके रहने में ही उतारू दिखाई दिए जिससे ना सिर्फ़ आम आदमी के मन में उनके प्रति शंका में बढ़ोत्तरी हुई बल्कि उनकी प्रतिष्ठा को भी धक्का पहुँचा.

भाजपा की राज्य सरकार ने चोरी की सूचना मिलने पर त्वरित और कठोर कार्रवाई करने के बजाय जो हीलाहवाली दिखाई उससे रामभक्तों के मन में फिर से संदेह पैदा हुआ कि अगर कोई ट्रस्ट का प्रमुख पदाधिकारी चोरी या डकैती में शामिल नहीं है तो बिना एफ आई आर के इस मामले की जांच के लिए स्पेशल इन्वेस्टीगेशन टीम गठित करने के पीछे कारण क्या था?

और फिर एस आई टी के रिपोर्ट के बाद सिर्फ़ निचले स्तर के कर्मचारियों के विरुद्ध एफ आई आर दर्ज करने के पीछे कारण क्या था?

बड़े नामों को एफ आई आर से बाहर रखने में यही संदेश बाहर गया कि सरकार ने उन्हें बचाने के लिए जांच की परिधि से ही बाहर कर दिया है. चूँकि संबंधित पदाधिकारी भाजपा के पितृ संगठन संघ और विश्व हिन्दू परिषद से जुड़े हुए हैं अतः यह संदेह होना स्वाभाविक है कि सरकार उन्हें बचाने की कोशिश कर रही है.

अगर इन पदाधिकारियों का नाम एफआईआर में होता या कोई अधिकारी प्रेस कांफ्रेंस करके विस्तृत रूप से यह बताता कि क्यों कोई भी बड़ा पदाधिकारी दान चोरी में शामिल क्यों नहीं है तो जाहिर है लोगों के मन में शंका कम होती.

रहा केंद्र सरकार की बात तो केंद्र सरकार का रूख इस मामले में शुरू से ही बहुत निराशाजनक रहा है.

चूँकि पूरा ट्रस्ट केंद्र सरकार और संघ के मनमुताबिक बना और अब यह स्पष्ट हो गया है कि मंदिर की व्यवस्था में शुरू से ही पारदर्शिता का अभाव था बल्कि पूरी व्यवस्था बहुत ही कैजुअल तरीके से चलाई जा रही थी जिससे घोटालेबाजों को घोटाला करने में आसानी हुई। अतः केंद्र सरकार से यह अपेक्षित था कि वह एक त्वरित एवं कड़ी कार्रवाई सुनिश्चित करती. इससे ना सिर्फ राम भक्तों के मन में निष्पक्ष कार्रवाई के प्रति आशा एवं विश्वास का संचार होता बल्कि भाजपा को भी अपनी साख बचाने में मदद मिलती.

राजनीतिक रूप से देखा जाए तो इस पूरे प्रकरण में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की इमेज को नहीं बल्कि प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के इमेज को नुक़सान पहुँचा क्योंकि मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा स्वयं प्रधान मंत्री ने संघ प्रमुख मोहन भागवत की मौजूदगी में किया और व्यावहारिक रूप से ट्रस्ट का गठन केंद्र सरकार ने किया जिसमें प्रधान मंत्री के पूर्व प्रमुख सचिव भी ट्रस्टी हैं.