Life Is Live In Village: गांव का स्वर्ग,शहर के स्वर्ग से बेहतर है

8

Life Is Live In Village: गांव का स्वर्ग,शहर के स्वर्ग से बेहतर है

रमण रावल

इन दिनों मैं महू से तीन कि.मी. दूर आशापुरा गांव में हूं। गांव याने गांव भी शहर भी। इंदौर से 40 कि.मी. दूर। महू-मंडलेश्वर-जाम गेट मार्ग पर । किसी गांव में आना याने अपने पैतृक गांव कुक्षी(धार) की यादों पर ओस की बूंदों का टपकना । कलेजे को वो ठंडक मिलती है, जो कोई शिकंजी, कोई शीतल पेय नहीं दे सकता। गांव का ठेठ देहातीपन भी और शहर समान सारी सुविधायें भी। चूंकि हम इक्कीसवीं सदी में हैं तो बीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध के गांव की कल्पना केवल किताबी ही कहलायेगी। गांव याने सुबह 5 बजे सूरज की लालिमा के छा जाने और भांति-भांति के पक्षियों के कलरव से जाग जाना। फिर एक हजार अश्व शक्ति समान चलने वाली ठंडी हवा में भी यदि आप बिस्तर ही पकड़े रहें तो समझ लीजिये कि आपके नसीब में ये सुहानी सुबह,वो आनंददायी पल, वो प्रकृति का अनुपम सौंदर्य निहारना है ही नहीं, जिसके लिये लोग हजारों रुपये खर्च कर किसी पर्यटन स्थल,पहाड़ी बसाहट पर पहुंचते हैं। वह भी कुछ ही दिनों के लिये । फिर वही 40-45 डिग्री की हडि्डयों तक को तपा देने वाली आग बरसाती गर्मी,वाहनों का धुंआ,साइलेंसर से एसी की निकलती लावे जैसी गरम हवा,हॉर्न का कुत्तों की तह भोंकने वाला शोर । बहरहाल।

IMG 20260616 WA0013

आजीविका,बच्चों की शिक्षा,कारोबारी व अन्यान्य तकाजों के चलते सभी न गांवों में रह सकते हैं, न शहर में। फिर भी जब जिसे अवसर मिले,आसपास के देहातों में झांक आना चाहिये। जिस तरह से हम सुबह उठकर कुल्ला-मंजन करने से पहले मोबाइल चार्जिंग पर लगाना नहीं भूलते,वैसे ही स्वयं को भी चार्ज करने गांव-खेड़े में चल देना चाहिये।

IMG 20260616 WA0012

आशापुरा,बड़गोंदा,बसी पिपरी,मलेंडी,मेंड,कोदरिया,कैलोद(जहां का दूध-मावा प्रसिद्ध है) जैसे गांव प्रकृति के दत्त्क पुत्र जैसे ठाठ वाले गांव हैं। यहां गरीबी भी है,बेरोजगारी भी है,संताप भी है, बीमारियां भी हैं,फिर भी संतोष पर्याप्त होगा,ऐसा मेरा मानना है। यह संतोष इन ग्रामीणों के चेहरे पर झलकता है। महू तहसील के इस इलाके में कुदरत ने झोली भरकर अनुपम उपहार दे डाले हैं। कुछ खास क्षेत्र तो ऐसे हैं, जहां साल भर इतनी तेज और ठंडी हवा चलती है कि मेरे जैसा डेढ़ पसली वाला यदि संभलकर न चले तो यकीनन 5-10 फीट तक बिना कदम बढ़ाये आगे चला जाये। गार्डन चेयर कब पड़ोसी के यहां चली जाये, पता भी न चले। शब-ए-मालवा,शाम-ए-अवध,सुबह-ए-बनारस की कहावत को मैं तो नये ढंग से कहना चाहूंगा। शाम-ए-,शब-ए, सुबह-ए सब कुछ महू के ये गांव। एक बार तो कभी आइये इन गांवों में। हम में से ज्यादातर अवध,बनारस न जा पायें, लेकिन महू के आसपास तो घूम ही सकते हैं। गांव याने केवल इनकी भौगोलिक सीमा तक नहीं । इनके आसपास हैं-पालात पानी,कुशलगढ़ किला,चोरल डेम,नखेरी डेम,बेरछा तालाब,वहां स्थित हजारों शाखाओं वाला सैकड़ों बरस पुराना बरगद,जाम गेट,खोदरा महादेव(जिसे छोटा अमरनाथ भी कहते हैं) और वे घने जंगल, जहां अक्सर तेंदुए,बाघ की हलचल की खबरें सुर्खियों में आती रहती हैं। वह इसी आशापुरा-बड़गोंदा के आसपास का इलाका है। जानापाव भी थोड़े ही फासले पर है।

IMG 20260616 WA0011

आशापुरा-बड़गोंदा के इलाके में हवा-पानी कुछ ज्यादा ही मेहरबान है। यहां यदि आप छत या बाल्कनी में सो रहे हैं तो पंखे,एसी को भूल जाइये। कई बार रात 3-4 बजे भुनसारे(जब हल्का अंधेरा,हल्का उजाला रहे)उठकर अंदर आना पड़ता है,इतनी तेज हवा होती है। दिन में भी पंखे के आसरे काम चल जाता है। ऐसा न भी हो तो सुबह साढ़े 4 से 5 बजे के बीच नींद खुलना तय है। तब शहर से विलुप्त हो रही गोरैया,तोते,टिटहरी समेत अनेक पक्षियों का झुंड आकाश में गोते लगाता मंडराने लगता है। नींद एकमुश्त आने से जल्दी जाग जाने में आलस नहीं आता, क्योंकि यहां रात में न तो मच्छर काटते हैं न कुत्ते भोंकते हैं। मच्छर तो हैं,लेकिन हवा के आगे बेबस हैं। कुत्ते कम हैं और शायद तेंदुए,बाघ के डर से चुप्पी साधे रहते हैं।

 

इस पूरे इलाके में कमोबेश सड़कें अच्छी हालत में हैं और ठेठ अंदर तक बनी हुई हैं। एक पहाड़ी गांव से आगे कोई रास्ता नहीं जाता, वहां आखिरी झोपड़ी तक सड़क बनी मैंने देखी। यह इलाका आलू की खेती का है, जहां से देश की अनेक नामी चिप्स कंपनियां समूचे खेत खरीद लेती हैं और चिप्स भी खेतों में ही बनाने की मशीनें लगी हैं। महू-मानपुर रोड पर जामली में बड़े पैमाने पर ड्रेगन फ्रूट और एनाकोडा की खेती हो रही है। जहां अन्य किसानों के लिये कार्यशाला भी लगती रहती है। केसर पर्वत भी इस गांव से पहले ही हैं, जहां बंजर पहाड़ी पर करीब 40 हजार पौधे लगाकर 95 प्रतिशत जीवित रहने का कीर्तिमान भी बना है।

इतने अनुपम सौंदर्य और पर्यटन से समृद्ध क्षेत्र की ओर यदि मप्र का पर्यटन विभाग थोड़ा-सा भी ध्यान लगा दे तो प्रादेशिक पर्यटन नक्शे पर आते देर न लगे।