
मिनी इंडिया मॉरीशस में भारतीय मूल के ‘ऑलराउंडर’ पुजारी जला रहे सनातन परंपराओं की मशाल, बड़वानी के नागेंद्र शर्मा बने आस्था की कड़ी
बड़वानी : मध्यप्रदेश के बड़वानी जिले के सेंधवा में पले-बढ़े 58 वर्षीय नागेंद्र शर्मा और करीब 30 कथावाचक आचार्य आज मिनी इंडिया कहे जाने वाले मॉरीशस में भारतीय सनातन परंपराओं के सशक्त वाहक के रूप में पहचान बना चुके हैं।
सन् 1834 के बाद गिरमिटिया श्रमिकों के रूप में लगभग चार लाख भारतीयों को मॉरीशस ले जाया गया था। वे अपने साथ भाषा, रीति-रिवाज, धार्मिक ग्रंथ और परंपराएं भी लेकर गए। आज मॉरीशस की 70 प्रतिशत से अधिक आबादी भारतीय मूल की है, जिनमें लगभग 52 प्रतिशत हिंदू हैं। यही कारण है कि यह अफ्रीका का सबसे सुरक्षित और स्वच्छ द्वीप देश भारतीय संस्कृति की मजबूत छाप लिए हुए है।

मॉरीशस में कई प्रमुख हिंदू संतों और गुरुओं ने भी समय-समय पर अपनी उपस्थिति दर्ज करायी है। परमहंस श्री स्वामी विश्वानंद ने ‘भक्ति मार्ग’ की स्थापना कर वैश्विक स्तर पर आध्यात्मिक चेतना को बढ़ाया। शिवाया सुब्रमण्यम स्वामी ने वहां हिंदू धर्म के पुनर्जागरण में योगदान दिया, जबकि स्वामी वेंकटशानंद ने ‘डिवाइन लाइफ सोसाइटी’ की स्थापना की। इसके अलावा मां आनंदमयी और स्वामी चिन्मयानंद जैसे संतों ने भी मॉरीशस में आध्यात्मिक प्रभाव छोड़ा।

मॉरीशस के रोज बेल में रहने वाले नागेंद्र शर्मा उन लगभग 30 भारतीय मूल के ‘ऑलराउंडर’ कथा वाचकों में शामिल हैं, जिन्होंने मॉरीशस में सम्मानित आध्यात्मिक मार्गदर्शक के रूप में अपनी पहचान स्थापित की है। मॉरीशस को अक्सर ‘मिनी इंडिया’ कहा जाता है, जहां भारतीय मूल की बड़ी आबादी निवास करती है। यहां हिंदू परंपराओं, संस्कारों और त्योहारों की जीवंतता में इन पुजारियों और गुरुओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। नागेंद्र शर्मा बताते हैं कि शीतल पेय कंपनी के टारगेट ना पूरा कर जाने के चलते उन्हें उस व्यवसाय को त्याग दिया था। नर्मदा तट व अन्य कई आध्यात्मिक स्थानों पर साधना करने के बाद वह मुंबई के एक व्यक्ति के निवेदन पर वे 2007 में गणेश मंदिर की स्थापना के लिए मॉरीशस पहुंचे और अनुकूल माहौल मिलने के चलते यही के हो गए। उन्होंने बताया कि वह कई यूरोपियन देशों का भ्रमण कर भागवत कथा का वाचन कर चुके हैं।

आज वे और उनके जैसे कई भारतीय वहां कथा वाचन, कर्मकांड और धार्मिक अनुष्ठानों के माध्यम से भारतीय संस्कृति को नई पीढ़ी तक पहुंचा रहे हैं। इन कथावाचक की कथाएं सुनने वहां के प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति भी आते हैं।
नागेंद्र शर्मा बताते हैं कि वहां के श्रद्धालु त्योहारों के दौरान विशेष अनुशासन का पालन करते हैं और कई लोग मांसाहार त्याग देते हैं। उनके अनुसार, कई युवा उनके मार्गदर्शन में परिवार के साथ रहना और पारंपरिक मूल्यों को अपनाना पसंद कर रहे हैं। नागेंद्र शर्मा ने बड़वानी जिले के सेंधवा में मां बगलामुखी का मंदिर क्षेत्र भी स्थापित किया है, और वह प्रतिवर्ष यहां आते हैं।

मॉरीशस के प्रमुख तीर्थ गंगा तलाव के पूर्व आचार्य शंभू नाथ पांडे मॉरीशस में 1998 में आए थे । उन्हें उनके गुरु व बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी के पूर्व डीन श्री राम जन्म मिश्रा यहां लेकर आए थे ।उन्होंने बताया कि मॉरीशस के हिंदू समाज में पुजारियों को ‘ऑलराउंडर’ माना जाता है। उनसे अपेक्षा की जाती है कि वे कर्मकांड, अनुष्ठान, कथा वाचन, ज्योतिष परामर्श और पारिवारिक मार्गदर्शन—सभी भूमिकाएं निभाएं। उन्होंने बताया कि आचार्य विपिन बिहारी मिश्रा और बलदाऊ मिश्रा भी महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं।
वे बताते हैं कि उत्तर भारत के साथ-साथ दक्षिण भारतीय पुजारी भी बेहद स्वच्छ व सुरक्षित मॉरीशस की धार्मिक गतिविधियों में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। भोजपुरी, तमिल, तेलुगु, मराठी और आर्य समाज समुदाय मिलकर सभी भारतीय पर्व-त्योहार धूमधाम से मनाते हैं।
एक अन्य आचार्य राजेंद्र राय मिश्रा जो उत्तर प्रदेश के गाजीपुर से मॉरीशस आकर बस चुके हैं , ने बताया कि स्वर्गीय पंडित राजेंद्र अरुण जिन्हें ‘आधुनिक तुलसीदास’ कहा जाता है, ने मारीशस में ‘रामचरितमानस’ को रेडियो और टेलीविजन के माध्यम से लोकप्रिय बनाया। उन्होंने कई पुस्तक लिखी और उनकी पत्नी डॉ. विनोद बाला अरुण के साथ मिलकर नई पीढ़ी को रामायण से जोड़ा। मॉरीशस में लगभग 350 मंदिर मॉरीशस सनातन धर्म मंदिर परिषद के अंतर्गत संचालित होते हैं। उन्होंने बताया कि कथा वाचक आचार्यों ने कई धार्मिक पुस्तकें भी लिखी है।
उन्होंने बताया कि उत्तरांचल के मूल निवासी मनोज प्रसाद सकलानी मॉरीशस के पोर्ट लुइस में रहते हैं, और रामेश्वर शर्मा जो हिमाचल प्रदेश के हैं मॉरीशस के वकोआ में रहते हैं। वह दोनों भी काफी प्रसिद्ध आचार्य हैं।
राजेंद्र राय मिश्रा हाल ही में मॉरीशस के प्रधानमंत्री नवीन चंद्र राम गूलाम की भारत यात्रा में उनके शिष्टमंडल के साथ आए थे। उनकी यात्रा में अयोध्या राम मंदिर के दर्शन और वाराणसी भ्रमण शामिल था, ने दोनों देशों के सांस्कृतिक और आध्यात्मिक संबंधों को फिर रेखांकित किया है।
गंगा तलाव से लेकर रामायण सेंटर तक, और नागेंद्र शर्मा जैसे कथा वाचकों से लेकर अंतरराष्ट्रीय गुरुओं तक—मॉरीशस और भारत के बीच आस्था की यह डोर आज भी अटूट है। यह संबंध केवल इतिहास नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य की सांस्कृतिक निरंतरता का प्रतीक है।





