
चढ़ावा : मंदिर में जा रहे हैं, तो सुलझा हुआ मन लेकर जाइए
डाॅ. मुरलीधर चाँदनीवाला
हजारों वर्ष पहले जगद्गुरु शंकराचार्य जी ने यह जान लिया था कि एक न एक युग ऐसा जरूर आयेगा, जब मंदिरों में चढ़ावे को लेकर बंदरबाँट मचेगी। वे जान गये थे कि पंडे-पुजारी, मंदिर के व्यवस्थापक-प्रबंधक मंदिर के चढ़ावे को अपनी सम्पत्ति मानने लगेंगे। शायद इसीलिए उन्होंने हमें मानस-पूजा का मौलिक विचार दिया। आज जब अयोध्या के राममंदिर के चढ़ावे की महाचोरी के किस्से यहाँ-वहाँ सुनाई दे रहे हैं, तब शंकराचार्य रचित ‘शिवमानसपूजा’ की याद आ रही है। यह एक ऐसा भावनात्मक स्तोत्र है, जो भगवान् के सामने रखे हुए किसी महंगे से महंगे चढ़ावे से भी ज्यादा मूल्यवान् चढ़ावा है। खास बात यह कि यह केवल भगवान् और भक्त के बीच है, अदृश्य भी है। कोई इसमें सेंध नहीं मार सकता।
इस स्तोत्र में भक्त भगवान् के लिये अपने मन में रत्नजडित सिंहासन बनाता है, मन ही मन में भगवान् को नाना प्रकार के आभूषणों से सजाता है। मन ही मन में रत्नखंडों से रचित स्वर्णपात्र में पाँच प्रकार के व्यंजनों का भोग लगाता है, मन ही मन में पुष्पांजलि, मन ही मन में धूप-दीप, ताम्बूल चढ़ाते हुए निवेदन करता है कि हे प्रभो! ये सब मैंने अपने हृदय से बनाये हैं, आप इन्हें ग्रहण कर लीजिए।
‘रत्नैः कल्पितमासनं हिमजलैः स्नानं च दिव्याम्बरं
नानारत्नविभूषितं मृगमदामोदाङ्कितं चन्दनम्।
जातीचम्पकबिल्बपत्ररचितं पुष्पं च धूपं तथा
दीपं देव दयानिधे पशुपते हृत्कल्पितं गृह्यताम्।।’
केवल पाँच श्लोकों वाले इस स्तोत्र में भगवान् के लिये मन से रचे हुए छत्र हैं, दो चँवर हैं, निर्मल दर्पण है, वीणा-भेरी-मृदंग-दुन्दुभी के वाद्य-गान-नृत्य-साष्टांग प्रणाम- नानाविध स्तुति है। भक्त कहता है कि हे भगवान्! मेरा शरीर आपका मंदिर है, सब विषय-भोग की रचना आपकी पूजा है, मेरी निद्रा आपकी समाधि है,मेरा चलना-फिरना आपकी परिक्रमा है, मेरे उचारे हुए सभी शब्द आपके स्तोत्र हैं, मेरे सब के सब कर्म आपकी आराधना हैं। ये सब मैं आपको समर्पित करता हूँ।

यह है- सबसे मूल्यवान् चढ़ावा। यह किसी बड़े से बड़े बाजार मे नहीं मिलता। इसकी कोई चोरी नहीं कर सकता। इसे कोई कहीं ले जाकर छिपा नहीं सकता। भगवान् को एक यही चढ़ावा पसंद है, और स्वीकार भी। बाकी सब तो ऐसा दिखावा है, लेन-देन है, छल-प्रपंच है, जिसे देखते ही भगवान् कुपित होते होंगे।
भगवान् को जो-जो चढ़ाया जाता है,वह सब चढ़ावा कहलाता है। फूल की पंखुडियाँ भी चढ़ाई जाती हैं,श्रीफल भी चढ़ाया जाता है। इसमें शक नहीं कि जैसी हैसियत होती है, भगवान् को उससे बढ़कर ही चढ़ाया जाता है। भगवान् को तरह-तरह के भोग भी चढ़ाये जाने का रिवाज है। अमीरों ने भगवान् को अपनी तरह का अमीर मान लिया है। उनके चढ़ाये हुए भोग को भगवान् ने कभी चखकर भी नहीं देखा होगा। चार धाम की कठिन यात्रा कर जब श्रद्धालु अपने घर लौटता है, तो उसकी झोली में जो प्रसाद होता है, वह कितना साधारण होता है। देखियेगा कभी। वह कितना मूल्यवान् होता है, प्रेम से बंटता है।
भगवान् को सोने-चाँदी की ईंटों सें क्या मतलब? ये फालतू की चीजें क्यों चढ़ाते हैं लोग? किसी भी ग्रंथ में नहीं लिखा है कि भगवान् सोने-चाँदी के आभूषण और नगदी रूपया चढ़ाने से प्रसन्न होते हैं। भगवान् को भक्त का सुधरा हुआ मन-मुकुर ही प्रिय है। वे उसी में अपना प्रसन्न वदन देखना स्वीकार करते हैं।
हममें से किसी की मत मानिए, आदिगुरु शंकराचार्य की तो मान ही लीजिए। मंदिर में जा रहे हैं, तो सुलझा हुआ मन लेकर जाइए। साथ में कुछ धन-दौलत मत ले जाइए। वह भगवान् के किसी भी काम नहीं आयेगी। वे नहीं रखेंगे उसे। वह बाजार की चीज है, बाजार में लौट जायेगी।
भगवान् बहुत भोले हैं, आपका मन जरूर रख लेंगे।




