Rebels Flopped : चुनाव में बागियों ने दम नहीं दिखाया, कई ने अपनी पार्टी को हरवाया जरूर!   

जानिए, किस पार्टी के बागी ने क्या गुल खिलाया!  

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Rebels Flopped : चुनाव में बागियों ने दम नहीं दिखाया, कई ने अपनी पार्टी को हरवाया जरूर!   

Bhopal : प्रदेश के विधानसभा चुनाव में 230 सीटों के लिए 2533 उम्मीदवारों की किस्मत दांव पर थी। असल मुकाबला भाजपा और कांग्रेस के बीच था। इस बार लग रहा था कि बगावत करने वाले कोई कमाल दिखाएंगे, पर मतदाताओं ने उन्हें नकार दिया। कांग्रेस और भाजपा दोनों ही पार्टियों के बागियों के सारे दावे खाली गए। बागी खुद नहीं जीते, पर उन्होंने कई सीटों पर अपनी पार्टी के उम्मीदवारों का नुकसान जरूर किया।     चुनाव से पहले दोनों ही पार्टियों को बागी नेताओं का सामना करना पड़ा। जिन्हें अपनी पार्टी में टिकट नहीं मिला, वो या तो दूसरी पार्टियों में गए या निर्दलीय मैदान में आ गए। लेकिन, चुनाव में बागियों का प्रदर्शन बेहद खराब रहा। 230 में से मात्र एक निर्दलीय कमलेश डोडियार विधायक बने, पर वे किसी पार्टी के बागी नहीं थे।

बीजेपी के बागियों की हालत

■ बदनावर : भंवर सिंह शेखावत

धार जिले की इस सीट पर भाजपा के बागी पूर्व विधायक भंवर सिंह शेखावत ने कांग्रेस के टिकट पर भाजपा उम्मीदवार और प्रदेश के उद्योग मंत्री  राजवर्धन सिंह दत्तीगांव को पटखनी दे दी। इस सीट से 2018 में शेखावत चुनाव हार गए थे, उन्हें राजवर्धन सिंह ने कांग्रेस उम्मीदवार के रूप में हराया था। लेकिन, सिंधिया के साथ वे भाजपा में आ गए और इस बार उन्हें टिकट मिलना ही था। इस वजह से शेखावत ने बगावत की और कांग्रेस से चुनाव लड़े और शिवराज सरकार के मंत्री को हरा दिया।     ■ भिंड : संजीव सिंह

भाजपा ने विधायक संजीव सिंह का टिकट काटकर नरेंद्र सिंह कुशवाह को मैदान में उतारा। टिकट कटने के बाद वे बीएसपी में लौट गए। उन्होंने बीएसपी के साथ ही अपना करियर शुरू किया था। संजीव सिंह को हार का सामना करना पड़ा और जीत नरेंद्र सिंह कुशवाह के हाथ लगी। दरअसल, पटवारी (राजस्व अधिकारी) परीक्षा में 10 में से 7 टॉपर्स संजीव सिंह के स्वामित्व वाले परीक्षा केंद्र से निकले थे, इसके बाद से कांग्रेस उनके खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप लगाते हुए आक्रामक प्रचार कर रही थी।

■ सतना : रत्नाकर चतुर्वेदी 

भाजपा के पूर्व जिला उपाध्यक्ष रत्नाकर चतुर्वेदी टिकट न मिलने से BSP में शामिल हो गए थे और उसी से टिकट लेकर चुनाव लड़े। उनका मुकाबला भाजपा के चार बार के लोकसभा सांसद गणेश सिंह से था। गणेश सिंह और रत्नाकर चतुर्वेदी दोनों को हार का समाना करना पड़ा और जीत कांग्रेस उम्मीदवार की हुई।

■ राजनगर (जिला छतरपुर) : घासीराम पटेल

खजुराहो विकास प्राधिकरण के पूर्व अध्यक्ष घासीराम पटेल टिकट कटने के बाद भाजपा छोड़कर बीएसपी में शामिल हुए। कांग्रेस ने मौजूदा राजनगर विधायक नाती राजा पर दांव लगाया, जो 2018 में सिर्फ 732 वोटों से जीते थे। इस सीट पर भाजपा नेता अरविंद पटेरिया की 5,867 वोटों से जीत हुई है।

■ निवाड़ी  : नंदराम कुशवाहा 

बीएसपी के टिकट पर पृथ्वीपुर सीट से 2018 का विधानसभा चुनाव लड़ने वाले नंदराम कुशवाहा 2021 विधानसभा उपचुनाव के दौरान भाजपा में शामिल हुए थे। नंदराम इस चुनाव में निवाड़ी विधानसभा से भाजपा से टिकट की दावेदारी कर रहे थे, लेकिन पार्टी ने दो बार के विधायक अनिल जैन को अपना उम्मीदवार बनाया। इसके बाद नंदराम कुशवाहा ने इसी सीट से निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ा और हार गए। इस सीट पर भाजपा के अनिल जैन की 17,157 वोटों से जीत हुई। ■ टीकमगढ़ : केके श्रीवास्तव

टीकमगढ़ विधानसभा में भाजपा ने राकेश गिरी को प्रत्याशी बनाया, लेकिन टिकट की मांग पूर्व विधायक केके श्रीवास्तव भी कर रहे थे। टिकट न मिलने के बाद श्रीवास्तव निर्दलीय ही चुनावी मैदान में कूद गए। चुनाव में श्रीवास्तव और राकेश गिरी दोनों को हार का सामना करना पड़ा। जीत कांग्रेस उम्मीदवार की हुई है। ■ बुरहानपुर : हर्षवर्धन सिंह

भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष और पांच बार के सांसद नंद कुमार चौहान के बेटे हर्षवर्धन सिंह बुरहानपुर सीट से निर्दलीय चुनाव लड़े। हर्षवर्धन ने 2019 में खंडवा लोकसभा सीट से भी टिकट मांगा था। लेकिन, उन्हें नहीं मिला। इस बार के विधानसभा चुनावों में वे बुरहानपुर से टिकट की कोशिश कर रहे थे। लेकिन पार्टी ने अर्चना चिटनिस पर भरोसा दिखाया। चिटनीस पिछला चुनाव 5,120 वोटों के मामूली अंतर से हार गई थीं। हर्षवर्धन को लग रहा था कि अर्चना को दोबारा मैदान में नहीं उतारा जाएगा, लेकिन पार्टी ने फिर उन्हीं पर भरोसा दिखाया। अर्चना ने इस भरोसे को जीत में बदल दिया और बागी हर्षवर्धन सिंह की हार हुई।

■ सीधी सीट : केदारनाथ शुक्ला

इस सीट से चार बार चुनाव जीतने वाले विधायक केदारनाथ शुक्ला का टिकट इस बार भाजपा ने काट दिया था। उनकी जगह सांसद रीति पाठक को मैदान में उतारा गया। दरअसल, शुक्ला के करीबी एक व्यक्ति पर एक आदिवासी पर पेशाब करने का वीडियो जमकर वायरल हुआ था। इसके बाद पार्टी ने उनका टिकट काट दिया। इस पर उन्होंने निर्दलीय चुनाव लड़ने का फैसला किया। लेकिन, केदारनाथ शुक्ला को हार का सामना करना पड़ा।

■ मुरैना : राकेश सिंह 

पूर्व मंत्री रुस्तम सिंह के बेटे राकेश सिंह बीएसपी उम्मीदवार के रूप में मुरैना सीट से चुनाव लड़ा। मुरैना से रघुराज कंसाना को उम्मीदवार बनाए जाने के बाद पिता-पुत्र दोनों ने भाजपा से इस्तीफा दे दिया था। इस सीट पर कांग्रेस के दिनेश गुर्जर ने 19871 वोटों से जीत हासिल की।

कांग्रेस के बागियों की हालत

■ त्योंथर (जिला रीवा) : सिद्धार्थ तिवारी 

कांग्रेस के बड़े नेता रहे स्व श्रीनिवास तिवारी के पोते सिद्धार्थ तिवारी भाजपा में शामिल हो गए और उन्हें भाजपा ने मैदान में उतारा। उन्होंने 2018 का चुनाव कांग्रेस के टिकट पर लड़ा था और 5,343 वोटों से हार गए थे। कांग्रेस ने इस सीट से रमाशंकर सिंह को चुनाव मैदान में उतारा। इस सीट पर भाजपा के सिद्धार्थ तिवारी की 4746 वोटों से जीत हुई।

■ सुमावली (जिला मुरैना) : एदल सिंह कुशवाहा 

इस सीट से कांग्रेस ने पहले एदल सिंह कुशवाहा का टिकट काटकर कुलदीप सिकरवार को मैदान में उतारा। फिर जब कुशवाहा नाराज होकर बीएसपी में चले गए तो पार्टी ने कांग्रेस ने उन्हें वापस बुलाकर इसी सीट से टिकट दे दिया। इसके बाद सिरकवार नाराज हो गए और वे बीएसपी में चले गए। 2018 में भाजपा उम्मीदवार अजब सिंह कुशवाह 13,313 वोटों से हार गए थे. BSP को 31,331 वोट मिले थे। इस बार इस सीट पर भाजपा के ऐदल सिंह कंसाना ने 16,008 वोटों से जीत हासिल की।

■ पोहरी (जिला शिवपुरी) : प्रधुम्न वर्मा 

पोहरी सीट पर टिकट कटने के बाद प्रद्युम्न वर्मा बीएसपी में शामिल हो गए थे। उनकी जगह कांग्रेस ने कैलाश कुशवाह पार्टी को टिकट दिया। 2018 में इस सीट पर बीएसपी उम्मीदवार दूसरे स्थान पर रहे और उन्हें 52,736 वोट मिले थे। इस सीट पर कांग्रेस के कैलाश कुशवाहा ने 49,481 से जीत हासिल की।

■ जतारा (जिला टीकमगढ़) : आरआर बंसल

2018 का चुनाव आरआर बंसल हार गए थे। स्पष्ट था कि उन्हें कांग्रेस दोबारा मैदान में नहीं उतारेगी। पार्टी ने उनकी जगह किरण अहिरवार को चुना और बंसल समाजवादी पार्टी में शामिल हो गए। भाजपा ने यहां से अपने मौजूदा विधायक हरिशंकर खटीक को मैदान में उतारा और उन्हें जीत भी हसिल हुई।

■ गोटेगांव (जिला नरसिंहपुर) : एनपी प्रजापति

कांग्रेस ने पहले अपने मौजूदा विधायक और पूर्व विधानसभा अध्यक्ष एनपी प्रजापति का टिकट काटकर उनकी जगह शेखर चौधरी को टिकट दिया। प्रजापति के समर्थकों के विरोध के बाद उन्हें फिर टिकट दिया गया। टिकट वापस लेने से शेखर चौधरी ने नाराज होकर निर्दलीय चुनाव लड़ने का फैसला किया। नतीजा ये रहा कि प्रजापति चुनाव हार गए और भाजपा के महेंद्र नागेश की 47,788 वोटों से जीत हुई।

■ सिवनी मालवा : ओम प्रकाश रघुवंशी 

कांग्रेस के पूर्व विधायक ओमप्रकाश रघुवंशी ने टिकट न मिलने के बाद निर्दलीय चुनाव लड़ने का फैसला किया था। सिवनी से कांग्रेस ने अजय पटेल को मैदान में उतारा है। इस सीट पर भाजपा के प्रेमशंकर कुंजीलाल वर्मा ने 36,014 वोटों से जीत हासिल की।  ■ नागौद (जिला सतना) : यादवेंद्र सिंह

इस सीट से पूर्व विधायक यादवेंद्र सिंह ने टिकट न मिलने के बाद कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया था और BSP में शामिल हो गए थे। यादवेंद्र सिंह दूसरे नंबर पर रहे और यहां जीत भाजपा उम्मीदवार नागेंद्र सिंह की हुई।

■ डॉ अम्बेडकर नगर (महू) : अंतर सिंह दरबार 

कांग्रेस के पूर्व विधायक अंतर सिंह दरबार 1998 से यह सीट जीत रहे थे। लेकिन, 2013 में भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय ने उनसे यह सीट नहीं छीन ली थी। अगले चुनाव में वे भाजपा उषा ठाकुर से 7,157 वोटों के अंतर से सीट हार गए थे। इस बार टिकट न मिलने पर दरबार ने निर्दलीय चुनाव लड़ने का फैसला किया। कांग्रेस ने रामकिशोर शुक्ला को इस सीट से उम्मीदवार बनाया, वे भाजपा छोड़कर कांग्रेस में शामिल हुए थे। जीत भाजपा उम्मीदवार उषा ठाकुर की हुई।

■ आलोट (जिला रतलाम) : प्रेमचंद गुड्डू 

उज्जैन सीट से दो बार सांसद और कई सीटों से विधायक का चुनाव लड़े प्रेमचंद गुड्डु ने फिर कांग्रेस से इस्तीफा देकर आलोट से निर्दलीय चुनाव लड़ा। उन्होंने 2018 के चुनावों से पहले कांग्रेस से नाता तोड़ लिया और भाजपा में शामिल हो गए। बाद में वे कांग्रेस में लौट आए और सांवेर से उपचुनाव लड़े। लेकिन, हार हुई। आलोट के मौजूदा कांग्रेस विधायक मनोज चावला 2018 में 5,448 वोटों से जीते थे और उन्हें फिर से मैदान में उतारा गया। लेकिन, भाजपा के डॉ चिंतामणि मालवीय की 68,884 वोटों से जीत हुई।