समीक्षा – कविता संग्रह*:मुकम्मल जहां

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समीक्षा – कविता संग्रह*:मुकम्मल जहां

कवि लेखक – डॉ नीलेश नगायच ” नील “

 

*(डॉ घनश्याम बटवाल मंदसौर)*

 

 

समन्दर की अपार जलराशि ओर तट पर वर्जिश कहें या अनंत आकाश को नमन करते हुए चित्र के साथ

” मुकम्मल जहां ” कविता संग्रह हाथों में आई । अच्छा लगा मुखपृष्ठ जो संदेश देता लगा नए स्वर और रचनाओं के आगाज़ का ।

 

यूं संग्रह में कुल जमा 21 कविताओं का समावेश है जो संकेत देता प्रतीत हुआ इक्कीसवीं सदी का , भिन्न – भिन्न सुरों में – तेवर में और कलेवर में

 

रचनाकार कवि डॉ नीलेश नगायच ने जीवन – समाज – रिश्तों – प्रकृति – शिक्षा – शादी – परवरिश – सैनिक – कहानी और कविता पर कविता को प्रस्तुत किया है वहीं हमारे आसपास से जुड़े सवाल पर भी सवाल उठाए हैं जो कवि के मन – मस्तिष्क में चल रहे मंथन को प्रतिबिम्बित करते हैं ।

“क्या सबके पास होता है, घर ” सच्ची भक्ति और आडंबर, मेरे जैसा कोई नहीं , फर्जीवाड़ा जैसी कविताओं के साथ भगवान से भी प्रश्न किए हैं जो कवि के मनोभावों को दर्शाते हैं।

लेखक कवि चिकित्सा शिक्षा से जुड़े हैं तो इस पर केन्द्रित कविता बीमारी , डॉक्टर और समाज , के माध्यम से भी भाव प्रगट हुए हैं।

वहीं अपने माता पिता के साथ बेटे अभिराम पर भी रचना शामिल है

यह सब है और सफलताओं से बड़ी असफलताएं कविता कवि की गहराई से रूबरू कराती है और एक विशिष्ट रचना ध्यान खींचती है सहज मार्ग हार्टफुलनेस जो संकेत देती है दैनंदिन जिन्दगी और व्यवहार का , आचार – विचार का ।

 

कवि ने कलम से समाज में खुशियां और सुधार की कामना की है तो भगवान से शिकवा – शिकायत कर , प्रश्न – प्रतिप्रश्न कर संवाद किया है , सैनिक की आज़ादी में कथा – व्यथा को यथार्थ प्रस्तुत किया, महान व्यक्तित्वों की असफलताओं को रेखांकित करते हुए सफलता की राह बताई।

कविता संग्रह में लिखी पंक्ति बहुत मौजू है किसी की व्यावसायिक दुनिया दिखावे और स्वार्थ से ही चलती है , पर मेरी कविता हमेशा निस्वार्थ रोशनी देने के लिए ही जलती है । फिर लिखते हैं – कविता तो वहां है जहां प्रेम , करुणा और भावनाओं की सरिता बहती है ।

 

एक कविता में आजकल की जटिलताओं, व्यस्तताओं आपाधापी के बीच घर का चित्रण है –

बहुत सारे प्रश्नों के पलंग पर लेट कर, सोता भी है तो तनाव की चादर ओढ़ कर। और सपनों की तकिया सिरहाने रखकर , अपने घर में भी बेघर हो जाता है ।

 

भक्ति और आडंबर का बोलबाला है चहुंओर जहां धर्म पीछे और धार्मिकता हावी हो रही है यह कविता में भी सामने आया जब कवि लिखते हैं – तुम्हें पाना है तो मिलेंगे तुम्हें तुम्हारे सच्चे कर्मों में , पुरुषार्थ के यथार्थ में , प्रेम भरे शबरी के जूठे बेरों में , मीरा जैसी आस्था की पराकाष्ठा में, ध्रुव – प्रहलाद के भोलेपन में , जरूरतमंद की मुस्कान में , ओर दीन दुःखी के सम्मान में।

परवरिश कविता में समाज, अभिभावकों को बताया है कि क्या कर रहे हैं आप , आकलन करने का संदेश भी है – कवि लिखते हैं – जब आपने बचपन से ही बच्चों को प्रतिस्पर्धी बनाया है , दुर्भावना से पूर्व ग्रसित बनाया है , हमेशा आगे रहने के बोझ तले दबाया है , प्रेम सम्मान करुणा भरे संस्कारों को नहीं सिखाया है , बस , पैसा, म्युचुअल फंड , लग्जरी और दिखावे को अपनाया है तो बच्चों ने भी आखिरी समय पर आपको ऐसे ही निपटाया है , सुना है कि एक पुत्र ने विदेश से ही अपने पिता की चिता को ऑनलाइन जलाया है ?

ओर अंत में हर किसी को मिल जाए उसका मुकम्मल जहां, सारी अपनी शर्तो पर , वैसे किसी को मिला है सब कहां ? पर विकृत विचारों की मरम्मत कर ले , तो पा सकता है दोनों जहां ।

 

कविता संग्रह में अंतिम रचना है , शादी, इसमें लिखते हैं जैसे शादी से बढ़कर कोई राष्ट्रीय मुद्दा नहीं है । यह सही है कि शादी में कितने उतार चढ़ाव, ग्रहों का मिलान , मंगल दोष और फिर फूफा – जीजा – मौसी जैसे रिश्ते शादी के सब स्वाद चखा देते हैं। इस चित्रण के बाद लेखक के जीवन में इसके बाद विराम है चूंकि स्वयं के सुपुत्र ” अभिराम ” हैं । लेखक स्वयं लिखते हैं कि चिकित्सक पत्नी डॉ आकांक्षा त्यागी की प्रेरणा से उनकी रचनाओं को यथार्थ में आकार मिला और बुक फॉर्म में सबके सामने है ।

 

लेखक कवि रचनाकार चूंकि चिकित्सा पेशे से जुड़े हैं और डिग्री धारी है अपने आत्मकथ्य में स्वयं लिखते हैं कि बचपन से ही लिखने – पढ़ने में अभिरुचि रही जो स्पष्ट परिलक्षित होती है । कहीं सापेक्ष भाव से तो कहीं निरपेक्ष भाव से प्रकट होता है । कुछ कविताएं लंबी है तो कुछ छोटी भी पर संदेश सभी देती हैं ।

डॉ नीलेश नगायच की कविताओं में पद्य के अनिवार्य तत्व का समावेश है जो संकेत देता है कि जो घट रहा है ओर हृदय को उद्वेलित कर भाव अभिव्यक्ति को विवश कर रहा है ओर ज़ाहिर है व्यक्त किया है ।

छन्द, तुकबंदी, लय में कहीं जुड़ती है तो बिछूड़ती भी है । कविताओं में बिंबों और प्रतीकों का समावेश है जो कवि के व्यापक दृष्टिकोण को रेखांकित करता है । कविताओं में कहीं विद्रोही स्वर है तो कहीं अपेक्षाएं भी है । रचनाकार कवि का पहला संग्रह है तो भविष्य की आशा बंधाता है कि फ़िर नया सृजन सामने आयेगा

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चलते चलते ध्यान आया कि लेखक ने चिकित्सा शिक्षा की डिग्री के साथ उपनाम ” नील ” जोड़ा है तो लगता है कि ” सागर ” निवासी डॉ नीलेश नगायच विश्व की सबसे बड़ी नदी ” नील “से प्रभावित हैं जो एक प्राचीन संस्कृति और सभ्यता की प्रतीक है । मतलब ” सागर” में समाई नदी और डॉ नीलेश नगायच ” नील” में परिवर्तित हो गई । बधाई ।

कविता संग्रह की छपाई सफ़ाई अच्छी है फ़ॉन्ट बोल्ड हैं जो पढ़ने में आसान है अंतर्राष्ट्रीय प्रकाशक बुकलिफ पब्लिशिंग ने प्रकाशित किया है। आईएसबीएन से पंजीकृत है । एक अच्छा कविता संग्रह जो पढ़ने को प्रोत्साहन देने वाला है जो जीवन से जुड़ा हुआ है ।