
कालजयी कथाकार श्री प्रभु जोशी,एक अंतरंग श्रद्धांजलि
डॉ. तेज प्रकाश व्यास
सेवानिवृत्त प्राचार्य, पीजी कॉलेज, धार, म.प्र
4 मई की तिथि का आना मात्र एक कैलेंडर का पन्ना बदलना नहीं है, बल्कि यह एक ऐसी रिक्तता का बोध है जिसे समय की धारा भी भरने में असमर्थ है। मेरे पिपलरवा देवास के बचपन के अभिन्न सखा, मेरे अभिन्न मित्र, प्रभु जोशी जी का भौतिक शरीर भले ही हमसे दूर हो गया हो, परंतु उनकी चेतना, उनकी कलम और उनकी तूलिका आज भी कालखंडों को चुनौती देती हुई हमारे बीच जीवंत है। वे केवल एक व्यक्ति नहीं थे; वे एक पूरी की पूरी संस्था थे—वे सरस्वती के वे वरद पुत्र थे, जिन्होंने अपनी मेधा और सृजन से हिंदी साहित्य को एक नई दृष्टि दी।
प्रभु जोशी जी की रचनात्मकता बहुआयामी थी। वे एक ऐसे विलक्षण व्यक्तित्व थे, जिनके भीतर एक साथ एक संवेदनशील कवि, एक तीक्ष्ण बुद्धि वाला लेखक, एक गहरा दार्शनिक और एक जलरंगों का जादुई चित्रकार वास करता था। जब वे लिखते थे, तो उनके शब्द कागज़ पर नहीं, सीधे पाठक के अंतर्मन पर उकेरे जाते थे। उनकी लेखनी में वह धार थी जो समाज की कुरीतियों और मानवीय विडंबनाओं को चीर कर सत्य को सामने लाने का सामर्थ्य रखती थी।
‘उखड़ता हुआ बरगद’ जैसी रचना केवल एक कहानी नहीं, वह विस्थापन की उस वेदना का महाकाव्य है, जिसे केवल एक रसिक ही महसूस कर सकता है।

साप्ताहिक धर्मयुग, हिंदुस्तान, कादम्बिनी और नवनीत जैसे कालजयी प्रकाशनों में जब प्रभु जी की रचनाएं छपती थीं, तो ऐसा लगता था मानो साहित्य जगत में एक नया सूर्योदय हुआ हो। वे ग्रामीण परिवेश निपानिया हुर हुर, पिपलरवा भूतेश्वर जैसे अनेक ग्रामीण परिवेश की उस सोंधी मिट्टी की गंध को अपने शब्दों में पिरोकर अंतरराष्ट्रीय फलक तक ले जाने की कला में सिद्धहस्त थे।
नईदुनिया के संपादकीय पृष्ठों को उन्होंने जिस बौद्धिक ऊंचाई और वैचारिक स्पष्टता के साथ संवारा, वह पत्रकारिता के इतिहास में एक स्वर्णिम अध्याय की तरह दर्ज है। वे एक ऐसे ‘ज्ञान के हिमालय’ थे, जिनकी चोटियाँ सदैव सत्य की खोज में अडिग रहीं।
चित्रकार के रूप में उनकी दृष्टि और भी सूक्ष्म थी। उन्होंने रंगों के माध्यम से उन भावनाओं को मूर्त रूप दिया, जिन्हें शब्द शायद कभी न कह पाते। उनकी चित्रकारी में एक अजीब सी शांति और गहराई थी, जो उनके व्यक्तित्व का प्रतिबंब थी।
वे ‘वेबदुनिया’ जैसे डिजिटल मंचों के शुरुआती दिनों से ही अपनी दूरदर्शिता के साथ जुड़े रहे, यह सिद्ध करता है कि वे जड़ता के विरोधी और निरंतर परिवर्तन के समर्थक थे। वे मानते थे कि साहित्य और कला को समय के साथ चलना चाहिए, लेकिन अपनी जड़ों को कभी नहीं छोड़ना चाहिए।
2010 और 2011 में, जब मैं शासकीय महाराजा भोज पीजी कॉलेज धार का प्रिंसिपल था,मैंने उन्हें बड़े ही सम्मानपूर्वक आमंत्रित किया था। वे और श्रीमती अनीता जोशी महाविद्यालय के सबसे सम्मानित अतिथि थे। उन्होंने समाज सुधार पर अपना कालजयी व्याख्यान दिया। यह व्याख्यान भारत के सभी प्रमुख समाचार पत्रों में प्रकाशित हुआ था। प्रभु जोशी और अनीता जोशी दोनों को सम्मानित किया गया। प्रभु जोशी को उनकी उत्कृष्ट उपलब्धियों के लिए भारत के अग्रणी साहित्यकार के रूप में आजीवन उपलब्धि पुरस्कार और शॉल-श्रीफ प्रशस्ति पत्र से सम्मानित किया गया। सभी प्रोफेसरों, छात्रों और उच्च साहित्यकारों ने उनके विश्व स्तरीय भाषण में भाग लिया।
आज जब मैं उन्हें स्मरण करता हूँ, तो मुझे उनका वह सौम्य चेहरा याद आता है, जो सदैव एक नई खोज की जिज्ञासा में रहता था। एक वैज्ञानिक के रूप में, मैं जीवन की नश्वरता को समझता हूँ, परंतु प्रभु जोशी जैसे रचनाधर्मी कभी मरते नहीं। वे अपनी कहानियों के पात्रों में, अपनी पेंटिंग्स के रंगों में और अपने विचारों की उस ऊर्जा में सदैव जीवित रहते हैं, जो उन्होंने आने वाली पीढ़ियों के लिए छोड़ी है।
प्रभु जी, आपका जाना साहित्य जगत के लिए एक ऐसी क्षति है जिसे कभी पूरा नहीं किया जा सकेगा। आपने दिखाया कि जीवन को कैसे एक कला की तरह जिया जाता है। आपकी मेधा, आपकी विनम्रता और आपका वह निश्छल व्यक्तित्व मेरे लिए एक अमूल्य धरोहर है।
माँ सरस्वती के इस सच्चे साधक को, मेरे मित्र प्रभु जोशी को, इस 4 मई 2026 के दिन मेरा शत-शत नमन। आपकी स्मृतियाँ तब तक अक्षुण्ण रहेंगी, जब तक हिंदी भाषा और साहित्य का अस्तित्व रहेगा।
4 मई विशेष: Memories: Prabhu Joshi-“वे सिर्फ मनुष्य नहीं, साहित्य, कला और करुणा की त्रिवेणी थे।”





