“लिफ्ट में मिली सीख”

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एक कहानी

“लिफ्ट में मिली सीख”

एक छोटी-सी घटना, जो बहुत बड़ा सवाल छोड़ गई …

आज ही की बात है।
मैं हॉस्पिटल से लौट रही थी। शरीर थका हुआ था और मन बस जल्दी से घर पहुँच जाना चाहता था। मैं और मेरे पतिदेव अपनी बिल्डिंग की लिफ्ट में चढ़े ही थे कि पीछे से दौड़ते हुए तीन बच्चे भी लिफ्ट में आ गए। और फटाफट क्रमश तीन बटन दबा दिए जो 5th 3rd के थे और हमे 6th पर जाना था

उनमें एक बच्चा लगभग दस साल का रहा होगा और बाकी दो करीब चौदह वर्ष के। उनके हाथों और कपड़ों से साफ़ लग रहा था कि नीचे क्रिकेट खेल रहे थे।लिफ्ट अभी चलना शुरू ही हुई थी कि अचानक बड़े बच्चे को याद आया कि-
“अरे! मेरा स्टम्प तो नीचे ही रह गया!”

इतना सुनते ही एक बड़े बच्चे ने झटके से लिफ्ट रोकने वाला बटन दबा दिया। लिफ्ट तेज़ झटके से रुक गई।शुक्र था की तब तक फस्ट फ्लोर आ चुका था ।मेरे पति ने बहुत शांत स्वर में कहा -“बेटा, ऐसे अचानक बटन मत दबाया करो। लिफ्ट अटक भी सकती है।”लेकिन उस बच्चे के चेहरे पर न समझ थी, न संकोच।
बड़े बच्चे के उतरते ही छोटा वाला बच्चा भी तपाक से बोला चल मैं भी चलता तेरे साथ हूँ…”दोनों तुरंत फर्स्ट फ्लोर पर उतर गए ।

अब लिफ्ट में हम दोनों और एक बड़ा बच्चा रह गए। दूसरा बड़ा बच्चा लिफ्ट में हमारे साथ ही था और लिफ्ट उपरी मंजिल पर आगे बढ़ रही थी वह हमें देखकर मुस्कुरा रहा था… ऐसी मुस्कान जिसमें मासूमियत कम और चुनौती ज़्यादा थी।

फिर उसने जानबूझकर दूसरे बटनों की तरफ हाथ बढ़ाकर दबाने की एक्टिंग करनी शुरू कर दी, जैसे हमें चिढ़ा रहा हो

“लो, अब बोलो… रोक लो हमें…”

हम दोनों चुप रहे।वह पाँचवीं मंज़िल पर उतर गया।लिफ्ट फिर चल पड़ी, लेकिन मन कहीं रुक गया था।मैं सोचती रही
क्या आज के बच्चों को सचमुच किसी बात का डर नहीं रहा?क्या उन्हें यह भी नहीं सिखाया जा रहा कि किसी बड़े से कैसे बात करनी चाहिए? या बिहेवियर कैसा हो ।या फिर अब बच्चों को “समझाना” पुराना तरीका मान लिया गया है?

शायद माँ-बाप भी क्या करें…हो सकता है बच्चे उनकी भी न सुनते हों।हो सकता है घरों में अब दादा-दादी की कहानियाँ, बड़ों का अनुशासन और संस्कारों वाली बातें कम हो गई हों।आज बच्चे मोबाइल से सब सीख रहे हैं,लेकिन “व्यवहार” कोई स्क्रीन नहीं सिखा सकती।

अच्छे स्कूल, महंगे कपड़े और इंग्लिश बोलना बच्चों को आधुनिक बना सकते हैं,लेकिन विनम्रता…सम्मान…और दूसरों की असुविधा समझनाये सिर्फ घर के संस्कार सिखाते हैं।

बच्चे मिट्टी की तरह होते हैं।जिस आकार में उन्हें ढाला जाए, वही बनते जाते हैं।अगर बचपन में उन्हें यह अहसास ही न कराया जाए कि“गलत काम पर टोकना डाँट नहीं, सीख होती है”तो आगे चलकर वही बच्चे समाज के नियमों को भी मज़ाक समझने लगते हैं।उस बच्चे की हरकत शायद बहुत छोटी थी,लेकिन उसने एक बड़ा सच दिखा दिया.आज बच्चों को सुविधाएँ तो मिल रही हैं,पर सीमाएँ नहीं।

और जिस पीढ़ी को सीमाओं का सम्मान नहीं सिखाया जाता,वह आगे चलकर रिश्तों, समाज और संवेदनाओं – सबकी मर्यादा भूल जाते है।हर माता-पिता से बस एक विनम्र निवेदन है ।अपने बच्चों को सिर्फ सफल मत बनाइए,उन्हें संस्कारी भी बनाइए।

क्योंकि
“ऊँची पढ़ाई इंसान को बड़ा बना सकती है,
लेकिन अच्छे संस्कार ही उसे अच्छा इंसान बनाते हैं।”

 

~ कीर्ति कापसे~