Silver Screen: सिनेमा में अब बिकाऊ नहीं रही मोहब्बत की प्रेम कथाएं!

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Silver Screen: सिनेमा में अब बिकाऊ नहीं रही मोहब्बत की प्रेम कथाएं!

हिंदी फिल्मों की कहानियों में प्रेम एक तरह से स्थाई भाव रहा है! फिल्मों की शुरुआत वाले ब्लैक एंड व्हाइट के दौर से रंगीन फिल्मों तक में जो बात हर दौर में समान रही, वो है प्रेम कहानियां! फिल्मों की कहानी का आधार चाहे एक्शन हो, सामाजिक हो, कॉमेडी या फिर हॉरर! हर कहानी में कोई न कोई लव स्टोरी जरूर होती रही। बल्कि, प्रेम के बहाने ही फिल्म के कथानक को आगे बढ़ाया जाता रहा! आजादी के संघर्ष वाली फिल्मों में भी नायक की कहीं न कहीं आंख लड़ती ही थी! लेकिन, अब लगता है जैसे हिंदी फिल्मों की कहानियों में मोहब्बत हाशिए पर आ गई! कुछ सालों में आई ज्यादातर हिट फिल्मों के कथानकों में प्रेम नदारद था! यदि किसी फिल्म में प्रेम प्रसंग था भी, तो महज कहानी को आगे बढ़ाने के लिए थे! फिल्म के मूल कथानक में मोहब्बत के लिए सब कुछ दांव पर लगाने जैसी कोई बात नहीं थी।

Silver Screen: सिनेमा में अब बिकाऊ नहीं रही मोहब्बत की प्रेम कथाएं!

कई दशकों तक प्रेम फिल्मों के लिए सबसे मुफीद विषय रहा। ये जीवन का ऐसा कोमल अहसास हैं, जिसे कहीं से भी मोड़कर उसे कथानक का रूप दिया जा सकता है। गिनती की जाए तो अभी तक जितनी भी फ़िल्में बनी, उनमें सबसे ज्यादा फिल्मों के विषय मोहब्बत के आसपास ही घूमते रहे। फिल्मों के शुरूआती समय में धार्मिक और पौराणिक कथाओं पर फ़िल्में बनी, फिर आजादी के बाद संघर्ष को विषय बनाकर कहानियां गढ़ी गई। लेकिन, उसके बाद 60 के दशक से लम्बे समय तक अधिकांश फिल्मों का कथानक मोहब्बत ही रहा! सफल और असफल दोनों तरह की प्रेम कहानियों पर खूब फ़िल्में बनी और पसंद की गई। राजाओं, महाराजाओं की मोहब्बत के किस्से भी दर्शकों को चाशनी चढ़ाकर परोसे गए! दरअसल, सिनेमा में मोहब्बत ऐसा जीवंत और जज्बाती विषय है, जिसकी सफलता की गारंटी ज्यादा होती है। प्रेम कहानियों पर बनी फ़िल्में परदे पर नए चेहरों को परोसने का भी सुरक्षित और मजबूत आधार रहा है। सिनेमा का इतिहास बताता है कि परदे पर जब भी में नए कलाकारों को उतारने का मौका आया, सबसे अच्छा विषय प्रेम से सराबोर कहानियों को ही समझा गया।

Silver Screen: सिनेमा में अब बिकाऊ नहीं रही मोहब्बत की प्रेम कथाएं!

अब लगता है वो दिन ढल रहे हैं, जब फिल्म का पूरा कथानक हीरो-हीरोइन और खलनायक पर ही रच दिया जाता था। सामाजिक फ़िल्में बनाने के लिए पहचाने जाने वाले ‘राजश्री’ ने भी ग्रामीण परिवेश में कच्चे और सच्चे प्रेम को ही सबसे ज्यादा भुनाया! लेकिन, अब ज्यादातर फ़िल्में दर्शकों के बदलते नजरिए का संकेत है। जिस तरह हॉलीवुड में स्टोरी और कैरेक्टर को ध्यान में रखकर फ़िल्में बनती है, वही चलन अब हिंदी फिल्मों में भी आने लगा! क्योंकि, नई पीढ़ी के जो दर्शक हॉलीवुड की फिल्मों को पसंद करते हैं, वे हिंदी फिल्मों में भी वही देखना चाहते हैं। यही कारण है कि राजेश खन्ना के बाद रोमांटिक फिल्मों के सबसे चहेते नायक रहे शाहरुख़ खान ने भी पठान, जवान, फैन, डियर जिंदगी और रईस जैसी फिल्मों में काम करने का साहस किया। अब आने वाली शाहरूख़ की अधिकांश फिल्मों से मोहब्बत नदारद होने लगी।

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प्रेम कहानियों वाली फिल्मों में प्रेमियों का मिलन का तरीका कई बार इतना जोरदार होता है, कि युवा दर्शक अपने प्रेम को भी उसी रूप में महसूस करके समाज और परिवार से विद्रोह तक कर देते हैं। इसके विपरीत जब फिल्मों में मोहब्बत की दुखांत कहानियां जन्म लेती हैं और देवदास, एक दूजे के लिए, क़यामत से कयामत तक और ‘सैराट’ जैसी फ़िल्में बनती है, तो यही दर्शक ख़ुदकुशी तक कर लेते हैं। क्योंकि, प्यार ऐसा जज्बात है, जिसकी तलाश हर किसी को जीवनभर रहती है। उसका स्वरूप चाहे जैसा भी हो, किंतु सच्ची मोहब्बत प्यार हर किसी की चाहत होती है। वैसे तो सामान्य जिंदगी में भी प्रेम कथाओं की कमी नहीं होती, पर दर्शक फिल्मों के जरिए अपनी मोहब्बत के अधूरे सपनों को जीता है। मुगले आजम, देवदास, सोहनी महिवाल से लगाकर ‘धड़क’ तक ने प्रेम के जज्बात को दर्शकों के दिलों में बसाया और जगाया! प्रेम के बिना भारतीय सिनेमा ब्लैक एंड व्हाइट के युग से अधूरा है! इसका सबसे सशक्त उदाहरण है कि साहित्यकार शरद चंद्र की कालजयी रचना ‘देवदास’ जिस पर सबसे ज्यादा फ़िल्में बनीं और हमेशा ही पसंद भी की गई! न सिर्फ हिंदी में बल्कि बांग्ला, तमिल, तेलुगु, असमिया और भोजपुरी समेत कई भाषाओं में दस से ज्यादा बार इस फिल्म के रीमेक बनें। इसमें पहली बार बनी मूक फिल्म भी शामिल है। ऐसा इसलिए कि शरद चंद्र ने प्रेम का ऐसा त्रिकोण रचा, जिसमें दर्शक हर बार उलझता रहा!

Silver Screen: सिनेमा में अब बिकाऊ नहीं रही मोहब्बत की प्रेम कथाएं!

हाल के सालों में आने वाली फिल्मों के कथानकों का तो कलेवर ही बदल गया। कुछ साल पहले कि बात की जाए तो बजरंगी भाईजान, सुल्तान, दंगल, रुस्तम, नीरजा, पिंक, कहानी-2, एयरलिफ्ट, नील बटे सन्नाटा, उड़ता पंजाब, एमएस धोनी से लगाकर ‘काबिल’ और ‘जॉली एलएलबी-2’ तक में हीरोइन उपयोगिता नाम मात्र की ही रही। करण जौहर की फ़िल्म ‘ऐ दिल है मुश्किल’ में तो ब्रेकअप को सेलिब्रेट किया गया। आलिया भट्ट ने भी ‘डियर ज़िंदगी’ में ब्रेकअप के बाद जिंदगी को कहा जस्ट गो टू हेल! सलमान खान की ‘बजरंगी भाईजान’ और ‘सुल्तान’ दोनों ही फिल्मों में हीरोइन कहीं भी कहानी पर बोझ नहीं लगती! अक्षय कुमार की ‘रुस्तम’ वास्तव में एक प्रेम कहानी है, लेकिन उसकी कहानी का आधार कोर्ट केस ही रहता है। सोनम कपूर की फिल्म ‘नीरजा’ तो पूरी तरह एक एयर होस्टेस के कर्तव्य कहानी है। वास्तव में प्रेम कहानी को हाशिए पर रखने का ये ट्रेंड धीरे-धीरे आया और सफल भी हुआ! इसलिए अब समझा जा सकता है कि आगे आने वाली फिल्मों का कथानक बदलाव नजर आएगा। हीरो, हीरोइन फिल्म में होंगे तो, पर वे रोमांस करें ये जरूरी नहीं है।

Silver Screen: सिनेमा में अब बिकाऊ नहीं रही मोहब्बत की प्रेम कथाएं!

पहली बार परदे पर उतरने वाले कलाकारों के लिए भी प्रेम कथाएं सबसे ज्यादा बार सफलता का आधार बनी! जब भी किसी सितारे के बेटे या बेटी को दर्शकों के सामने उतारा गया, ऐसी पटकथा रची गई, जिसका मूल विषय प्रेम रहा! आमिर खान (कयामत से कयामत तक), सलमान खान-भाग्यश्री (मैंने प्यार किया), अजय देवगन (फूल और कांटे), ऋतिक रोशन-अमीषा पटेल (कहो ना प्यार है), राहुल रॉय-अनु अग्रवाल (आशिकी), संजय दत्त (रॉकी), सनी देयोल-अमृता सिंह (बेताब), कमल हासन-रति अग्निहोत्री (एक दूजे के लिए), ऋषि कपूर-डिंपल (बॉबी), ट्विंकल खन्ना-बॉबी देओल (बरसात), कुमार गौरव-विजयता पंडित (लव स्टोरी), शाहिद कपूर-अमृता राव (इश्क विश्क), दीपिका पादुकोण (ओम शांति ओम), इमरान खान (जाने तू या जाने ना), रणवीर सिंह (बैंड बाजा बारात), रणबीर कपूर-सोनम कपूर (सांवरिया), अभय देओल (सोचा न था), आयुष्मान खुराना (विकी डोनर), आलिया भट्ट-सिद्धार्थ-वरुण (स्टूडेंट ऑफ द ईयर) और आयुष शर्मा (लवयात्री) आदि। बाद में इन्होंने रास्ते भी बदले, पर करियर के शुरूआती दौर में रिस्क लेने की हिम्मत नहीं की।

हिंदी सिनेमा में अमर प्रेम कथाओं की फेहरिस्त अंतहीन है। मुगले आजम, आवारा, कागज के फूल, प्यासा, साहिब बीवी और गुलाम, पाकीजा, कश्मीर की कली, आराधना, बॉबी, सिलसिला, देवदास, मैंने प्यार किया, कयामत से कयामत तक, एक दूजे के लिए, दिल है कि मानता नहीं, लव स्टोरी, साजन, दिल, उमराव जान, 1942 ए लव स्टोरी, दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे, कुछ कुछ होता है, रंगीला, कल हो न हो और ‘जब वी मेट’ के बाद बॉलीवुड में नई पीढ़ी के प्रेम को दर्शाने के लिए भी कई प्रेम कहानियां रची गई! जिसमें रहना है तेरे दिल में, बचना ए हसीनों, सलाम नमस्ते, लव आजकल, ये जवानी है दीवानी, वेकअप सिड, अजब प्रेम की गजब कहानी, रॉक स्टार, बर्फी, टू स्टेट्स, आशिकी-टू, कॉकटेल, शुद्ध देसी रोमांस, तनु वेड्स मनु, मसान, तमाशा, ए दिल है मुश्किल, बरेली की बर्फी जैसी अनेकों फिल्में रही! आशय यह कि परदे पर मोहब्बत का ये सिलसिला न कभी रुका है न रुकेगा।

Silver Screen: सिनेमा में अब बिकाऊ नहीं रही मोहब्बत की प्रेम कथाएं!

फिल्मों का कथानक कितना भी नयापन लिए हो, उसका मोहब्बत से दूर-दूर तक वास्ता न हो, फिर भी उसमें एक प्रेम कहानी जन्म जरूर पनपती है। क्योंकि, प्रेम जीवन की वो शाश्वत सच्चाई है, जिसे नकारा नहीं जा सकता! भारतीय दर्शक के जीवन में मोहब्बत के अलग ही मायने हैं और वो इन्हीं भावनाओं को वो हर पल जीता है। उसे ‘मुगले आजम’ की सलीम और अनारकली का इश्क कामयाब न होना उतना ही सालता है जितना ‘सदमा’ में श्रीदेवी और कमल हासन का बिछड़ना! फिल्म बनाने वालों ने भी दर्शकों की इस कमजोरी को अच्छी तरह समझ लिया। फिल्मों के हर कथानक में एक लव स्टोरी इसलिए होती है, कि ये सबसे बिकाऊ तड़का जो होता है। लेकिन, अब धीरे-धीरे ये फार्मूला भी दरकने लगा। क्योंकि, नई पीढ़ी को ऐसी प्रेम कथाएं रास नहीं आती।

Author profile
Hemant pal
हेमंत पाल

चार दशक से हिंदी पत्रकारिता से जुड़े हेमंत पाल ने देश के सभी प्रतिष्ठित अख़बारों और पत्रिकाओं में कई विषयों पर अपनी लेखनी चलाई। लेकिन, राजनीति और फिल्म पर लेखन उनके प्रिय विषय हैं। दो दशक से ज्यादा समय तक 'नईदुनिया' में पत्रकारिता की, लम्बे समय तक 'चुनाव डेस्क' के प्रभारी रहे। वे 'जनसत्ता' (मुंबई) में भी रहे और सभी संस्करणों के लिए फिल्म/टीवी पेज के प्रभारी के रूप में काम किया। फ़िलहाल 'सुबह सवेरे' इंदौर संस्करण के स्थानीय संपादक हैं।

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