
Somvati Amavasya: पानी भरी बाल्टी में चार बूंद गंगाजल की…!
🔺कीर्ति राणा

‘मानो तो गंगाजल हूं, ना मानो तो बहता पानी’।
बीस रुपये में पवित्र गंगाजल की छोटी सी बोतल की कुछ बूंदे पानी की बाल्टी में डाल कर हमने तो
सोमवती अमावस्या जैसे बड़े स्नान पर्व पर हर की पौढ़ी पर स्नान समान अनुभूति कर ली। वैसे तो उज्जैन में क्षिप्रा नदी भी है। लेकिन वहां जाने का मन नहीं हुआ, कारण क्षिप्रा की दशा सिंहस्थ आने तक बेहतर होने की उम्मीद है लेकिन अभी की क्षिप्रा पर कुछ लिखना आ बैल मुझे मार जैसी ही बात होगी। इतने में ही जान सकते हैं कि सोम तीर्थ में टैंकरों से पानी डाला गया था ताकि श्रद्धालु फव्वारा स्नान कर सकें। शनैश्चरी अमावस्या पर त्रिवेणी पर भी फव्वारा स्नान की व्यवस्था कर रखी थी।
खैर, बात हो रही थी गंगा जल वाली उस छोटी सी बॉटल की। पूजन सामग्री वाली दुकानों पर आजकल दस-बीस रु में जब गंगाजल आसानी से उपलब्ध है तब इस बोतल की चार बूंदे बाल्टी में डालने के दौरान मुझे मेरी नानी की याद आ गई। हमारी नानी और बई उस जमाने में पंचक्रोशी यात्रा से लेकर हरिद्वार आदि तीर्थों की यात्रा पर जाती थी। घर से आटा-दाल आदि सामग्री वाली पोटली और बत्ती वाला केरोसीन से जलने वाला स्टोव सिर पर रहता था।

धार्मिक यात्रा से जब सकुशल वापस लौटती तो गंगाजल वाली उस केन से चार-चार बूंद हथेली पर टपकाती, उसे गटकने के साथ आंखों-सिर पर गीली हथेली फेर कर हम भी नानी-बई की उस कष्टदायक यात्रा से मिले पुण्य का लाभ ले लेते थे। पूजा घर के एक कोने रखी गंगाजल की केन और गंगाजली वाले लोटों की हर दिन पूजा होती थी। शादी ब्याह में गंगा पूजन की यात्रा वाले दृश्य हम भाई बहनों को आज भी रोमांचित करते हैं कि उन मटकियों में दो दो बूंद गंगाजल का ऐसा प्रभाव कैसे हो जाता है कि पूरे यात्रा मार्ग पर सतत नारियल बदारते चलने के बाद भी गंगा माता के प्रभाव वाली उन महिलाओं को संभालना चुनौती से कम नहीं होता।![]()
सालवी बाखल वाले हमारे मोहल्ले में किसी परिवार का कोई बीमार सदस्य अंतिम घड़ियां गिन रहा हो तो उस परिवार का कोई सदस्य आधी रात में दरवाजा खटखटाता, कौसल्याबाई दरवाजा खोलती तो हाथ में पकड़ी कटोरी आगे बढ़ा कर गिड़गिड़ाता कौसल्या बई थोड़ा सा गंगा जल दे दो। मराठी स्कूल वाले मदरसे में कोई मरणासन्न गाय दर्द से रंभाती तो उसकी बड़ी-बड़ी आंखें, चेहरे पर दर्द की लकीरें देख कर नानी बिना किसी से कुछ कहे चुपचाप पूजा घर से स्टील की छोटी सी कटोरी में कुछ बूंद गंगाजल की और उसमें पानी मिलाकर मदरसे में वापस लौटती, गाय के मुंह में गंगाजल डालती, उसकी आत्मा की शांति के लिये भगवान से ग्यारस छोड़ने की प्रार्थना करने के साथ ही हमें आदेश सुनाती मुन्ना इसे गीताजी सुना दे।
चंदन और सूख चुके फूलों लाल कपडे को खोल कर हम भाई-बहन उस मरणासन्न गाय को मोक्ष की कामना के साथ गीता सुना कर वापस आ कर सो जाते। सुबह उठते ही सीथे स्कूल वाले मैदान में पहुंच जाते थे। तब बड़ा संतोष मिलता जब बेजान गाय की खुली आंखों और मुंह के आसपास मक्खियां भिनभिनाती नजर आती। गंगाजल और गीता का यह महत्व तब से अच्छी तरह समझ आने लगा था।
तब कई बार मैं तो खीझ भरे स्वर में कहता था नानी गंगाजल देने में इतनी कंजूसी मत करो, कटोरी में थोड़ा और तो डालो…। वो डपट देती, चिल्लाते हुए कहती थी बेटा, कितनी मुश्किल से लाए हैं गंगाजल, तुम क्या जानों। चार बूंद भी बहुत है, इसमें पानी मिल जाएगा तो पूरी कटोरी भर हो जाएगा गंगाजल। आज जब सोमवती अमावस्या पर बाल्टी में बीस रु की उस बोतल से चार बूंद गंगाजल डाल कर स्नान किया तो आंखों में बचपन के वो सारे दृश्य घूम रहे थे और कानों में गूंज रहा था वो गीत ‘मानो तो गंगाजल हूं, ना मानो तो बहता पानी’।
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