
कहाँ खो गई इंसानियत : चौरस्ते पर बिखरा दर्द..
संजय लाहोटी
चौरस्ते पर बिखरा दर्द..
राह चलते एक आम इंसान की साइकिल पर टंगी प्लास्टिक की थैली अचानक क्या फटी, मानो उसकी उम्मीदों का थैला ही फट गया। गाड़ियों की रफ्तार के बीच, हॉर्न के शोर में, वह बेबस होकर अपने बिखरे हुए आलू-प्याज समेटने की जद्दोजहद करता रहा। उस समय चौरस्ते पर गाड़ियां तो बहुत थीं, लेकिन उस गरीब की बेबसी को देखने वाली आँखें और रुकने वाले हाथ नदारद थे । जब फटी थैली में सामान रोकना मुमकिन न रहा, तो वह सामने की दुकान पर एक नई थैली की उम्मीद में भागा। लेकिन जब तक वह लौटकर आया, तब तक रफ्तार के भूखे समाज ने अपना रंग दिखा दिया था। चमचमाती गाड़ियों के बेरहम पहियों ने आधे से ज्यादा आलू-प्याज को कुचल दिया था। वह गरीब चुपचाप अपनी कुचली हुई मेहनत को देखता रह गया। उन पहियों ने सिर्फ आलू-प्याज को नहीं, बल्कि उस इंसान के स्वाभिमान और उसके बच्चों के निवाले को कुचला था।

कहाँ खो गई इंसानियत ?
क्या हमारी गाड़ियों की रफ्तार इतनी जरूरी हो गई है कि हमें सड़क पर बिखरा किसी का दर्द / परेशानी दिखाई ही नहीं देती ?
अगर चंद गाड़ियां दो मिनट के लिए रुक जातीं, या कुछ राहगीर अपनी गाड़ियों से उतरकर उसकी मदद कर देते, तो शायद उसका यह नुकसान न होता।
संवेदना की कमी: हम पत्थरों के शहर में रहते-रहते शायद खुद भी भीतर से पत्थर होते जा रहे हैं ।
एक अपील: इंसान बनिए, इंसानियत बचाइए
यह घटना हम सभी के लिए एक आईना है। अगली बार जब सड़क पर किसी मजबूर का सामान बिखरे, या कोई बेबस दिखे, तो अपनी गाड़ी की रफ्तार को धीमा कीजिए। अपनी गाड़ियों के शीशे नीचे उतारिए और मदद के लिए हाथ आगे बढ़ाइए।
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