रविवारीय गपशप:काशी की महत्ता और चाची की प्रसिद्ध कचोरी का स्वाद!

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रविवारीय गपशप:काशी की महत्ता और चाची की प्रसिद्ध कचोरी का स्वाद!

चाहे कोई कितना भी बड़ा कलाकार या क्या कितना ही बड़ा विद्वान क्यों ना हो , जब तक भगवान शिव की प्रिय नगरी काशी में आकर अपनी विद्वता ना साबित कर दे , उसे अखिल भारत के स्तर का पांडित्य प्राप्त नहीं होता है । काशी भगवान शिव के त्रिशूल के ऊपर बसी है , जहाँ गंगा भी चंद्राकार आकृति में बहती हैं , मानो शिव के भाल पर चन्द्र । देश दुनिया के अनेक विद्वानों के अलावा आदि शंकराचार्य भी चारों दिशाओं में धर्म ध्वज फहरा कर बनारस ही पधारे थे , जहाँ 42 दिनों तक चले शास्त्रार्थ के बाद मण्डन मिश्र को उन्होंने पराजित कर अपना वर्चस्व बनाया था ।

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बनारस मेरा पहली बार तब जाना हुआ , जब एयरफ़ोर्स के ग्राउण्ड ड्यूटी अफ़सर की नौकरी के लिये बुलावा आया । एक सप्ताह बनारस रहे , गंगा नहाई और पैर में मोच आ जाने से बिना फ़िज़िकल टेस्ट दिये वापसी का टिकट कट गया । इसके बाद बनारस जाने का अवसर तब आया , जब उज्जैन में मैं श्री महाकालेश्वर मंदिर का प्रशासक था । उस समय उज्जैन के कमिश्नर श्री मोहन गुप्त ने प्रेरणा दी कि ज्योतिर्लिंग में पूजा व्यवहार और प्रक्रियाओं का परस्पर अध्ययन होना चाहिए , और इस सिलसिले मैं उज्जैन मंदिर के पुजारी श्री घनश्याम और आशीष के साथ बनारस गया । तब विश्वनाथ मंदिर में पहली बार सुबह की मंगला आरती के बाद हम पति पत्नी ने भगवान विश्वनाथ का दुग्धाभिषेक पूजन किया था और मंदिर प्रशासन के प्रदत्त प्रतीकात्मक उपहारों के साथ उज्जैन वापस आये थे ।

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इसके बाद बनारस दो-चार बार जाना हुआ पर वो सरकारी दौरे थे जिसमें भ्रमण और दर्शन की औपचारिकताएँ ही थीं । काशी विश्वनाथ मंदिर परिसर में निर्मित कारिडोर के प्रधान मंत्री जी द्वारा लोकार्पण के बाद काशी दर्शन की उत्सुकता बनी रही और उसकी पूर्ति हुई हमारे मित्र प्रमोद गुप्ता जी के सुझाव से हुई कि इंदौर से सप्ताहांत की फ्लाइट लेकर दो दिन में ही वाराणसी भ्रमण का कार्यक्रम बन सकता है । बस फिर क्या था हम दोनों मित्र सपरिवार बनारस के लिये रवाना हो गये । काशी के अधिपति भगवान विश्वनाथ के दर्शनों के बाद जब हम बाहर निकले तो देखा एक चाट की दुकान के सामने भारी भीड़ खड़ी है , मानो सब मुफ़्त में मिल रहा हो । पता किया तो “काशी चाट” के नाम से प्रसिद्ध इस चाट की दुकान की तारीफ़ में हमारे साथ चल रहे सज्जन ने क़सीदे पढ़ते हुए बताया कि ये दुकान सौ साल से भी ज़्यादा पुरानी है और नीता अम्बानी अपने बेटे की शादी के पहले जब मंदिर में माथा टेकने आयीं थीं तो उन्होंने इस चाट की दुकान में चाट खायी थी और उन्हें इतनी पसंद आई कि इसे विशेष तौर पर अनन्त अंबानी की शादी में बुलवाया था , जहाँ काशी चाट का स्टाल एक सप्ताह तक मेहमानों के लिए लगा रहा । फिर क्या था , चाट का भोग लगाना लाज़मी था । दूसरे दिन हम जब हम संकटमोचन के दर्शनों के लिए जा रहे थे तो रास्ते में हमने एक अजीब नज़ारा देखा सड़क किनारे एक झोपड़ी नुमा दुकान के सामने टिन के ख़ाली डब्बे लाइन से रखे हुए हैं और उनमें बैठने के लिए अपनी बारी की प्रतीक्षा में लाइनों में लोग खड़े हैं । ड्राइवर स्थानीय था , हमने पूछा पाण्डे जी ये क्या माज़रा है ? पाण्डे जी बोले ये चाची की प्रसिद्ध कचौरी की दुकान है जो नाश्ते के साथ गाली देने के लिए प्रसिद्ध थी । बहरहाल नज़ारा और विवरण दोनों इतने दिलचस्प थे कि यहाँ भी कचौरी का भोग लगाना लाज़मी था ।

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वाराणसी में इस बार साफ़ सफ़ाई उम्दा थी और सभी मन्दिरों में व्यवस्था में अनेक सुधार हैं । एक बात ज़रूर मार्क की कि व्यवस्था में अत्यधिक संख्या में पुलिसकर्मी ड्यूटी पर लगे थे , हमें लगा इतनी महत्वपूर्ण फ़ोर्स को दर्शनार्थियों की भीड़ सम्भालने के बजाए उनके मूल काम में प्रयुक्त होना चाहिए और इनकी जगह एयरपोर्ट की तरह निजी सिक्योरिटी गार्ड्स तैनात किए जाने चाहिए ।

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